भारतीय महान् वैज्ञानिक डॉ. आत्माराम

भारत प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों की धरती रहा है| यह ऋषि, देवऋषि, ब्रह्म ऋषि आदि हमारे वैज्ञानिकों की विभिन्न उपाधियाँ ठीक उस प्रकार ही होती थीं जिस प्रकार आज पी एच डी, डी लिट् आदि उपाधियाँ हैं| अत: वैदिक काल में और उसके पश्चात् मुगलों के आगमन तक भारतीय वैज्ञानिकों की तूती पूरे विश्व में बोलती थी| मुगलों ने जब यहाँ आकर हमारे सब ग्रन्थ और पुस्तकालय जला डाले तो हम विज्ञान सहित प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ गए और फिर अंग्रेज ने यहाँ आकर हम से सब कुछ ही छीन लिया तथा हमारे वेदादि वैज्ञानिक ग्रन्थों की उल जलूल व्याख्याएं कर के हमें हमारी सभ्यता, संस्कृति और मूल से भी दूर कर दिया किन्तु तो भी हमारे देश की प्रतिभाओं ने हिम्मत नहीं हारी और निरंतर प्रतिभावान बनने का प्रयास करते रहे | इस प्रकार के प्रतिभावान हमारे लोगों में डा᷃. आत्मा राम जी भी एक थे| देश के अन्य वैज्ञानिकों की ही भाँति आपने भी देश के स्वल्प साधनों में से भी साधन निकाल कर देश का सर गौरव से उंचा कर दिया| आप की प्रतिभा उस समय सब के सामने निखर कर आई जब आप अखिल भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान सम्मलेन वाराणसी के अध्यक्ष बने| आपने अखिल भारतीय स्तर पर वैज्ञानिक कार्यों में व्यस्त रहते हुए भी निरंतर देश में विज्ञान की प्रगति के प्रयास करते रहे|

डॉ. आत्माराम जी का जन्म १२ अक्टूबर १९०८ ईस्वी को उत्तर प्रदेश के जनपद में चांदपुर के निकटवर्ती गाँव पिलाना में हुआ| सौभाग्य से आपके गुरु स्वामी सत्य प्रकाश जी का जन्म भी बिजनौर में ही हुआ| आप एक साधारण से निर्धन परिवार से सम्बन्ध रखते थे किन्तु अपनी मेहनत के बल पर आप इतना विस्तृत कार्य कर पाए की आपको देश के शीर्ष वैज्ञानिकों में स्थान मिला और विज्ञान कांग्रेस आदि अनेक वैज्ञानिक संस्थाओं के प्रधान व अन्य पदों को सुशोभित करते रहे| डॉ. आत्माराम के पिता लाला भगवान् दास गांव के प्रमुख व्यक्तियों में गिने जाते थे और साधारण से पटवारी थे। धनाभाव जे कारण परंतु अपने प्रयत्न व सूझ-बूझ से थोड़ी आमदनी में भी गरीब घर को स्वर्ग बना दिया। इस कार्य में आपकी माता सुशीला देवी का भी सहयोग आपके पिताजी को मिला| थोड़ा साधन होते हुए भी सब परिवार का पालन बड़ी शांति से किया| आपने लूट खसूट के स्थान पर पशुपालन किया जिस से संतानों का पालन हो सका|

डॉ. आत्माराम जी के जीवन पर माता-पिता की सरलता और सादगी की छाप स्पष्ट दिखाई देती थी| धनाढ्य न होने पर भी सरस्वस्ती की परिवार पर कृपा थी| पिता ही नहीं काका जियालाल ने भी इस अवस्था में ही शिक्षा प्राप्त की थी| इस कार्य के लिए परिवार को आर्य समाज और इसके संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जी की प्रेरणा प्राप्त थी| बालपण से ही बालक आत्मा राम को जीव जंतुओं का अध्ययन करने में रूचि थी| ग्रामीण वातावरण ने उन्हें ऋतु परिवर्तन का ज्ञान भी करवा दिया| घर से कई मील चलकर स्कुल जाया करते थे| डाक्टर आफ साइंस तथा डी.एस.सी. उपाधि ग्रहण करने के उपरांत डॉ. आत्माराम ने अपना कार्य-क्षेत्र डॉ. शांति स्वरूप भटनागर के अनुसंधान-विभाग के अंतर्गत प्रारंभ किया। फिर सी.एस.आई. आर. की प्रबंध समिति में आए और ग्लास और सिरेमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट के संचालन का कार्य भार सम्भाला। सन् 1952 में इसके ही महा निदेशक बने। विज्ञान में अत्याध्जिक रूचि के कारण अनेक वैज्ञानिक संस्थाओं के सदस्य बनाए गए| इस कारण देश में ही नहीं विदेशों में भी आपका सम्मान होने लगा| सरकार ने भी कई दशों में इन्हें अपना प्रतिनिधि बना कर भेजा|

बडौदा विश्वविद्यालय में आपको स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया| यह सब सम्मान उनका आत्म सम्मान तो बढा रहे थे किन्तु उनकी नम्रता दिन प्रतिदिन बढती ही चली जा रही थी| वह विदेशों से उच्च वेतन का मोह न रखते हुए देश में रहकर देश के सच्चे सेवक बने रहने की इच्छा रखे हुए थे| अपितु बाहर गए वैज्ञानिकों को भी देश में लाने का प्रयास करते रहते थे|

आप्टीकल ग्लास के निर्माण में आपने भारतीय पद्धति का निर्मान करके संसार को आश्चर्य में डाल दिया| आप को ऋषि दयानद जी से सच्ची लगन होने के कारण आप भारतीय विज्ञान से पूरी भाँति से परिचित थे और इस का निरंतर प्रयोग करते थे| स्वदेशी और सादगी के आप पक्षधर थे| जिस एम एस सी में आपको बड़ी कठिनाई से प्रवेश मिला था उस में आपने सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सफल होने पर सब को आश्चर्य में डाल दिया| उनकी इस प्रतिभा के कारण उन्हें छात्रवृत्ति दी गई| फिर उन्होंने अपने पुरुषार्थ से डाक्टर आफ साइंस की उपाधि प्राप्त की| आप स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती जी के भी विद्यार्थी रहे| आपका विवाह संस्कार भी उन्होंने ही करवाया| स्वामी सत्य प्रकाश जी प्राय: आप की चर्चा किया करते थे|

अब आपने सहायक अनुसंधान के रूप में डा, शान्ति स्वरूप भटनागर जी के नेतृत्व में कार्यशील हुए| द्वितीय विश्वयुद्ध के समय युद्ध में काम आने वाले पदार्थों पर महत्त्वपूर्ण खोज की| आप वैज्ञानिक होने के साथ ही साथ उत्तम प्रबन्धक भी थे| आपकी सूझ का ही परिणाम था कि आपको १९६६ को वैज्ञानिक एवं अनुसंधान परिषद् के महानिदेशक का पद पर आसीन किया गया|

दो वर्ष के अथक परिश्रम से आपने समांगी कांच (Optical Glass) की निर्माण-विधि की खोज की तथा देसी साधनों से इसका निर्माण भी कर दिया,जिस से इसका व्यवसायिक कार्य संभव हो सका| भूतपूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री, भारत सरकार श्री मुहम्मद करीम छागला ने इस उपलब्धि को भारतीय शिल्प की सर्वोत्कृष्ट सफलता बताया। इस कांच से देश की सुरक्षा की आवश्यकताएं भी पूर्ण की जा रही हैं| इसके झागदार कांच तथा ताम्र लाल कांच के भी आपकी खोजों ने सम्मान प्राप्त किया| इन कारणों से ब्रिटेन में भी आपको सम्मानित किया गया| कांच के अतिरिक्त आपने कुछ अन्य खोजें भी कीं| जैसे अभ्रक को पीसने तथा अनुपयोगी अभ्रक से तापावरोधन ईंटों की निर्माण-विधियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कुल मिलाकर इस समय उनके बीस पेटेन्ट हैं| इस कारण आप डॉ. शांति स्वरूप भटनागर पदक प्राप्त करने वाले प्रथम वैज्ञानिक बने तथा अनेक अन्य वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया।

आप देश को उन्नत देशों के समकक्ष लाना चाहते थे, इस कारण आप निरतन्तर प्रयास करते रहे| आप कहा करते थे कि “विशिष्ट उपलब्धि की बात करते समय प्रायः हमारा ध्यान अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अथवा पुरस्कारों पर अधिक रहता है। उनका भी महत्त्व है परंतु केवल दो-चार ऊंचे पर्वतों से ही देश नहीं बनता। उसके लिए आवश्यक है कि विस्तृत और हरे-भरे उर्वर मैदान भी हों। नोबेल पुरस्कार सन् 1901 ई. में प्रारंभ हुआ था और हमारे देश को सन् 1930 में प्राप्त हुआ। जापान को सन् 1948 ई. में उपलब्ध हुआ अर्थात् हम से 18 वर्ष पश्चात् प्राप्त हुआ, परंतु क्या जापान टेक्नोलॉजी में हम से पिछड़ा हुआ है? इंग्लैंड में तो 50-55 नोबल पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। विज्ञान का स्तर इस प्रकार नहीं नापा जाता कि अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक उभरकर आए या नहीं बल्कि यह देखना अभीष्ट है कि हमारे वैज्ञानिकों की भूमिका क्या रही? निश्चय ही उन वैज्ञानिकों का सबसे बड़ा योगदान आर्थिक क्षेत्र में रहा होना चाहिए।” डॉ. आत्माराम ने इसी दिशा में सोचना प्रारंभ किया और विकास-कार्यक्रम में वे सक्रिय होकर भागीदार बने।

आत्माराम जी का जीवन अत्यंत सादगी-पूर्ण रहा। सादगी के बारे में एक बार की घटना है कि आप एक बार किसी कारखाने का निरीक्षण करने के लिए आ गए। जब आप वहाँ पहुँचे, तो कारखाने के अधिकारी आपको पहचान नहीं पाए। उन्होंने किसी दूसरे व्यक्ति का ही स्वागत कर डाला। फिर तो अधिकारियों को बड़ी शर्म उठानी पड़ी पर डॉ. आत्माराम को इसकी तनिक भी चिंता नहीं हुई। डॉ. आत्माराम अजमेर के मेयो कॉलेज में भी रहे। सरलता और सादगी तथा समाज-सुधार करना इनके परिवार वालों का ध्येय रहा है और यह सभी डॉ. आत्माराम में विद्यमान था।

आप विज्ञान की शिक्षा हिंदी में ही देने के पक्षधर थे| 1959 में भारत सरकार ने आपको पद्मश्री सम्मान दिया| आपने अनुसंधानशालाओं में व्याप्त जड़ता और शिथिलता को दूर किया। 6 फरवरी सन् 1983 में भारत के इस महान् वैज्ञानिक का निधन हो गया। डॉ. आत्माराम के निधन से भारत का एक अग्रगण्य वैज्ञानिक सदा के लिए खो दिया किन्तु हमारी प्रेरणा के लिए उनका जीवन सन्देश हमारे सामने सदा रहेगा| जिस से प्रेरित होकर हमारे भावी वैज्ञानिक बहुत कुछकर पाने में सफल होंगे|

डॉ. अशोक आर्य
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