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भारतीयों ने अमरीका में कैसे अपना परचम फहराया

भारतीय अमेरिकियों की परिभाषा के दायरे में ऐसे दोनों लोग आते हैं जो अमेरिका में आप्रवासी हैं और वे भी जिनका जन्म अमेरिका में हुआ लेकिन भारतीय मूल के हैं। इन लोगों ने अमेरिका में असाधारण सफलता हासिल की है। अमेरिका में अब इनकी तादाद करीब एक प्रतिशत है। आबादी के इस समूह की शानदार सफलता का ‘‘द अदर वन पर्सेंट: इंडियंस इन अमेरिका’’ किताब में अंतर्दृष्टि के साथ आंकड़ों के आधार पर अच्छी तरह प्रस्तुति के जरिये विश्लेषण किया गया है जो पहले से बनी-बनाई अवधारणाओं को खत्म कर आज के भारतीय अमेरिकियों के बारे में बारीकी नज़रिया प्रस्तुत करता है। इसमें यह भी बताया गया है कि भारतीय अमेरिकियों की विदेश में बहुत-सी उपलब्धियों से खुद भारत किस तरह से प्रभावित हुआ है।

‘‘द अदर वन पर्सेंट: इंडियंस इन अमेरिका’’ के लेखक, संजय चक्रवर्ती, देवेश कपूर और निर्विकार सिंह हैं। इस पुस्तक में अमीर अमेरिकियों के लिए द अदर वन पर्सेंट शब्द-युग्म का इस्तेमाल किया गया है। इकोनॉमिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन के अनुसार इस तबके की आय वर्ष 2013 में नीचे के 99 प्रतिशत लोगों की कुल आय के मुकाबले 25 गुना थी।

पुस्तक के लेखकों का मानना है, ‘‘भारतीय अमेरिकी दरअसल उस एक प्रतिशत समूह के हिस्से नहीं हैं। कम से कम समग्र रूप में तो नहीं ही हैं। लेकिन जैसा कि लेखकों का विचार है, वे दुनिया के सबसे ताकतवर कहे जाने वाले मुल्क में सबसे धनी और आर्थिक रूप से सफल समूह के रूप में जाने जाते हैं।

चक्रवर्ती का कहना है, ‘‘भारतीयों के बारे में यहां एक राय हुआ करती थी कि वे यहां या तो दुकानदार होंगे या फिर मोटेल के मालिक। लेकिन अब इसमें बदलाव आ रहा है क्योंकि अब ज़्यादा भारतीय अमेरिकी उच्च डिग्री और शिक्षा के साथ-साथ साथ ज़्यादा आय अर्जित करने वाले भी बन गए हैं। इसके अलावा वे भारत के किस क्षेत्र से आ रहे हैं, इसमें भी बदलाव आया है।’’ प्रोफेसर चक्रवर्ती पेन्सिलवैनिया की टेंपल यूनिवर्सिटी में भूगोल और शहरी अध्ययन के प्रो़फेसर हैं और यूनिवर्सिटी ऑ़फ पेन्सिलवैनिया के एडवांस्ड स्टडी ऑ़फ इंडिया केंद्र में विजिटिंग स्कॉलर हैं।

लेखकों ने भारतीय आप्रवासियों की तीन मुख्य धाराओं का पहचान की हैं- ‘‘द अर्ली मूवर्स’’ यानी वे जो काफी पहले जाकर अमेरिका में बस गए। यह वह वर्ग था जो संख्या में छोटा था लेकिन यह काफी उच्च शिक्षित था और 1965 में अमेरिकी आप्रवासी कानून में ढील के बाद 1960 और 1970 के दशक में यह वर्ग अमेरिका आया। इसके बाद धारा उन परिवारों और ऐसे लोगों की थी जो 1980 के दशक और 1990 के दशक के मध्य तक यहां पहुंचे। ये लोग इन अर्ली मूवर्स के परिजन ‘‘द फैमिली’’ थे। इसके बाद वहां पहुंचने वाली आईटी जनरेशन या सूचना क्रांति की वह पीढ़ी थी जो संख्या में सबसे ज्यादा होने के साथ- साथ सर्वश्रेष्ठ शिक्षित पीढ़ी भी थी। 1991 की शुरुआत के साथ ये लोग अमेरिका आने लगे। यह पीढ़ी खासतौर से वर्ष 2000 में वाई2के कंप्यूटर समस्या के खतरे को देखते हुए अमेरिका में सूचना तकनीक के पेशेवरों की मांग के कारण वहां पहुंची थी। साल 2014 तक, लेखकों का मानना है, भारत, अमेरिका में नए आप्रवासियों का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका था।

इस आईटी पीढ़ी के प्रतीक के तौर पर शायद मदुरै में जन्मे गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचई और हैदराबाद में जन्मे माइक्रोसॉ़फ्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सत्य नडेला को देखा जा सकता है। इससे अमेरिका में भारतीय अमेरिकियों का प्रो़फाइल शिक्षा और आय के मामले में काफी ऊपर चला गया।

आखिर, भारतीय अमेरिकी दूसरे नस्ली समूहों से आगे कैसे निकल गए। इस किताब में इसकी तीन मूल वजहें बताई गई हैं- चयन, आत्मसात करना यानी बदलते परिवेश के लिए तैयार होना और उद्यमशीलता। इसमें सबसे महत्वपूर्ण चयन को माना जा सकता है। अमेरिका आने वाले अधिकतर वे लोग थे जो भारत की सामाजिक व्यवस्था से निकले एक छोटे से समूह से आते थे। लेखकों का मानना है कि, ये चुनिंदा लोग शहरी होने के साथ पढ़े-लिखे और उच्च या प्रभावी वर्ग से ताल्लुक रखते थे और तकनीक के क्षेत्र में उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे।

चक्रवर्ती कहते हैं, ‘‘चयन वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण है। अमेरिका में कानूनी रूप से आ पाने के मानदंड बहुत ऊंचे हैं और शायद 90 प्रतिशत भारतीय इन बाधाओं को पार नहीं कर सकते।’’

लेखकों का मानना है कि 1991 के बाद जो भारतीय आप्रवासी अमेरिका आए, वे अपनी शिक्षा, आय के उच्च स्तर और अंग्रेजी ज्ञान के कारण यहां के समाज में तेजी के साथ ढल गए। उन्होंने कारोबार शुरू किए क्योंकि उनमें से बहुतेरे तकनीकी रूप से दक्ष थे और वे एक ऐसे समय में अमेरिका आए थे जब कि इंटरनेट से संबंधित कंपनियां खूब फलफूल रही थीं। अमेरिकी भारतीय सिलीकॉन वैली और दूसरे डिजिटल उद्योग क्षेत्रों में एक विशेष ताकतवर वर्ग के रूप में उभर कर सामने आए। वास्तव में, लेखकों ने अमेरिका में ऐसे सात तकनीकी क्षेत्रों का पता लगाया है जहां अमेरिकी भारतीयों का जमावड़ा है क्योंकि उनके आसपास तकनीकी कंपनियां मौजूद हैं।

हालांकि सूचना तकनीक से जुड़े इस समूह ने अमेरिकी भारतीयों की आय और उनके शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाया लेकिन लेखकों का मानना है कि इसके दूसरे पक्ष में अभी भी बहुत से अमेरिकी भारतीय ऐसे हैं जिनका शिक्षा का स्तर निम्न होने के साथ वे अंग्रेजी में कमजोर हैं और माहौल को आत्मसात नहीं कर पा रहे हैं। चक्रवर्ती का कहना है, ‘‘इस वर्ग में ज्यादातर वे लोग हैं जो 1970 और 1980 के दशक में अपने परिवार के दूसरे सदस्यों के पास आए थे।’’

लेखकों की राय में भारतीय अमेरिकियों को जिन्हें मॉडल माइनॉरिटी यानी अल्पसंख्यकों के आदर्श समूह के रूप में जाना जाता है, की शानदार सफलता का उनकी जन्मभूमि पर भी कई तरह से सकारात्मक असर पड़ा है। इनमें भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और निवेश में बढ़ोतरी, अधिक मात्रा में पैसा भेजना और पोर्टफोलियो निवेश और अमेरिका की मुक्त उद्यमी व्यवस्था के लाभों के बारे में जागरूकता का बढ़ना शामिल है।

चक्रवर्ती का कहना है, लोगों में संतुष्टि और कुछ हासिल कर लेने का बोध है। ‘‘देखो हमारे लोग अमेरिका में कितना शानदार काम कर रहे हैं।’’ वह कहते हैं, ‘‘हालांकि यह सब भारत में भी दिख रहा था, लेकिन अमेरिका में यह अधिक दिख रहा है क्योंकि आप्रवासी वहां के बारे में अच्छी बातें कह रहे थे और जो अच्छी चीज़ थी।’’

भारतीय अमेरिकियों के लिए भविष्य किस दिशा में जा रहा है? एक तो यह वास्तविक संभावना है कि वे दूसरे दो प्रतिशत का हिस्सा बन जाएं। यह अनुमान कुछ हद तक अमेरिका में उनके आप्रवासन रुझान को ध्यान में रखते हुए लगाया जा रहा है लेकिन इससे एक हकीकत भी जुड़ी है। बहुत से भारतीय अमेरिकी बच्चे पैदा करने की मुख्य उम्र के दौर में है और दूसरे प्रवासियों जैसे मेक्सिको और चीनियों की अपेक्षा उनमें जन्म दर ज्यादा है।

हालांकि, अमेरिका में आप्रवासी नीति को लेकर इन दिनों काफी बहस चल रही है लेकिन चक्रवर्ती का भारत और दुनिया के दूसरे मुल्कों में अपने भविष्य के बारे में सोच रहे लोगों के लिए यह संदेश काफी कुछ बयां करता है, ‘‘अमेरिका अभी भी बड़ी संभावनाओं का देश है।’’

स्टीव फॉक्स स्वतंत्र लेखक, पूर्व समाचारपत्र प्रकाशक और रिपोर्टर हैं। वह वेंटुरा, कैलि़फोर्निया में रहते हैं।

साभार- https://span.state.gov/ से

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