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धर्मालुओं और पर्यटकों के लिए रुचिकर पुस्तक मन्दिर संस्कृति ; धार्मिक पर्यटन

राजस्थान के सुविख्यात लेखक और राजस्थान के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के पूर्व ज्वायंट डायरेक्टर डॉ.प्रभात कुमार सिंघल की पुस्तक” मन्दिर संस्कृति: धार्मिक पर्यटन” प्रकाशित हुई है। आठ अध्यायों में विषयवस्तु को वर्गीकृत कर 142 पृष्ठों में रोचक रूप से प्रस्तुत किया गया हैं। 69 वर्षीय सिंघल यूं तो विभिन्न विषयों के विचारक और समर्थक हैं परन्तु पर्यटन विषय के विशेषज्ञ के रूप में खास पहचान बनाई है।

पुस्तक में पर्यटन को भारत के मंदिरों पर केंद्रित कर प्रथम अध्याय में अर्वाचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक के विभिन्न काल खंडों में मन्दिर संस्कृति के उद्भव, विकास और प्रसार के साथ – साथ समय – समय पर विकसित हुई मन्दिर शिल्प निर्माण की विभिन्न शैलियों पर रोशनी डाली गई है। मंदिरों की विकास यात्रा को बहुत ही सारगर्भित और त्थयात्मक रूप से उदरण सहित रोचकता से प्रस्तुत किया गया हैं।

अन्य अध्यायों में भारत के चार धाम बद्रीनाथ, रामेश्वरम,जगन्नाथ पुरी और द्वारका के साथ – साथ उत्तराखंड में हिमालय के लघु चार धाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री एवं सनातन काल से चली आ रही सप्त पूरियों अयोध्या, काशी वाराणसी, मथुरा, द्वारका, हरिद्वार,उज्जैन,कांचीपुरम, भारत में देवी के 51 शक्तिपीठ के साथ – साथ भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग केदारनाथ, काशी विश्वनाथ, नागेश्वर, सोमनाथ, महाकालेश्वर, ॐ करेश्वर, भीमाशंकर, त्रयंबकेश्वर, वैद्यनाथ, घृष्णेश्वर, मलीकार्जुं न एवं रामेश्वरम पर प्रकाश डाला गया है।

वैश्विक महत्व की दृष्टि से यूनेस्को की सूची में शामिल भारत की विश्व विरासत मंदिरों का परिचय शामिल किया गया हैं, जो घरेलू और विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। विभिन्न श्रेणियों में आने से शेष भारत के अति प्रमुख मंदिरों को उत्तर भारत और दक्षिण भारत के मंदिरों में वर्गीकृत कर प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक की विशेषता इस बात में निहित है कि मंदिरों की व्याख्या करते समय मन्दिर के पीछे जुडी कथा, स्थान, निर्माण काल, निर्माता, ऐतिहासिक एवं भौगोलिक परिवेश स्थापत्य और मूर्ति शिल्प कला की विशेषताओं को बखूबी वर्णित किया है। पुस्तक के आमुख में मध्य – पश्चिमी रेलवे मंडल कोटा के सीनियर सेक्शन इंजीनियर अनुज कुच्छल मन्दिर के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को सहज – सरल रूप में प्रतिपादित करते हुए बताते हैं कि पर्यटन से जुड़ कर किस प्रकार मन्दिर विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार का माध्यम बन रहे हैं और सामाजिक समरसता को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

यह निष्पक्षता का विषय है कि लेखक ने पूरी ईमानदारी बरतते हुए सन्दर्भ सूची भी साथ दी है। पुस्तक वीएसआरडी एकेडमिक पब्लिशिंग, मुंबई द्वारा आकर्षक कलेवर में प्रकाशित की गई है। आम पाठकों को ध्यान में रख कर इसका मूल्य 146 रू.रखा गया है। पुस्तक पाठकों के लिए
अमेजॉन एवं फिलिपकार्ट पर उपलब्ध है।
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समीक्षक
मृदुला अग्रवाल
मकान न. 96, सेक्टर 12,
पंचकुला – 134112

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