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क्या पीडीपी ख़त्म होने के कग़ार पर है

राजनीति में कब क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. इसे सही मायने में समझना हो तो जम्मू कश्मीर की राजनीति पर एक नजर डाली जा सकती है. राज्य की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) 2014 के विधानसभा चुनाव में कश्मीर की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. छह महीने पहले तक यह जम्मू कश्मीर की सत्ता चला रही थी. लेकिन अभी हालात ये हैं कि पीडीपी कश्मीर के राजनीतिक मंच से ख़त्म होती दिखाई दे रही है.

पिछले करीब एक महीने में दर्जनों छोटे-मोटे नेताओं के अलावा पार्टी के कम से कम पांच मुख्य नेता पीडीपी छोड़कर जा चुके हैं. और सूत्रों की मानें तो कई और बड़े नाम इसे अलविदा कहने की तैयारी में हैं. पार्टी छोड़कर जाने वालों में हसीब द्राबू, बशारत बुखारी, पीर मुहम्मद हुसैन, आबिद अंसारी और इमरान रज़ा अंसारी जैसे दिग्गज नेता शामिल हैं. छह महीने पहले तक ये पीडीपी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) गठबंधन सरकार में मंत्री पद संभाले हुए थे. इन नेताओं में से कुछ नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) में जा मिले हैं और कुछ भाजपा के मित्र माने जाने वाले सज्जाद लोन की पीपल्स कांफ्रेंस (पीसी) में शामिल हो गए हैं.

ऐसा क्या हुआ कि ये सभी पार्टी की अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती का साथ ऐसे कठिन समय में छोड़कर जा रहे हैं जब पार्टी को इन दिग्गजों की सब से ज़्यादा ज़रुरत थी? क्या पीडीपी ख़तम होने के कगार पर है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि पीडीपी का कमज़ोर होना जम्मू कश्मीर की राजनीति के भविष्य के लिए क्या मायने रखता है.

हुआ क्या?

1999 में बनी पीडीपी को महबूबा के पिता मुफ़्ती मुहम्मद सईद के नेतृत्व में सत्ता में आने में सिर्फ तीन साल लगे. 2002 में सिर्फ 16 सीटें लेकर सत्ता में आने वाली पीडीपी को कश्मीर के राजनीतिक मंच पर एक प्रमुख राजनीतिक ताकत माना जाने लगा. 2008 में पीडीपी ने अपनी सीटें बढ़ाकर 22 कर ली थीं. लेकिन पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और कांग्रेस-नेशनल कॉन्फ्रेंस गठबंधन सरकार ने जम्मू कश्मीर में सत्ता संभाली.

2014 में पीडीपी 87 सदस्यों वाली विधानसभा में 28 सीटें जीतकर फिर सबसे बड़ी पार्टी होने का श्रेय तो ले लिया, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो साथ ही साथ उसने अपनी बर्बादी के बीज भी बो लिए. कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विशेषज्ञ खालिद गुल सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं, ‘अगर 2014 का पीडीपी चुनाव अभियान उठाकर देख लिया जाए तो भाजपा को कश्मीर से दूर रखने के अलावा उनका कोई और एजेंडा नज़र नहीं आता. मुफ़्ती सईद और महबूबा मुफ़्ती अपनी हर रैली में सिर्फ भाजपा के ‘मिशन-44’ पर रोक लगाने की बात करते दिखाई दिए.’

खालिद के मुताबिक भाजपा विरोधी एक लंबे अभियान के बाद जब पीडीपी ने भाजपा के साथ ही गठबंधन करने का एलान किया तो कश्मीर के लोगों को लगा कि वे ठगे गए हैं. वे कहते हैं, ‘लोगों में पीडीपी के लिए बहुत गुस्सा पैदा हो गया था जो अभी भी ठंडा नहीं हुआ है.’

बहरहाल, लोगों ने पीडीपी को चुन लिया था और अगले चुनाव तक वे कुछ कर भी नहीं सकते थे. लेकिन पीडीपी में दरारें दिखने में ज़्यादा देर नहीं लगी. पहला बड़ा झटका पार्टी को तब लगा जब 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद चल रही अशांति के बीच पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक तारिक़ हमीद कर्रा ने पीडीपी छोड़ देने का एलान किया. इस अशांति को ‘संभालने’ में पीडीपी-भाजपा सरकार की नाकामयाबी को नरसंहार बताते हुए कहा था कि पीडीपी सत्ता के लालच में अपने सिद्धांतों का बलिदान कर रही है. सुरक्षा बलों के हाथों बुरहान वानी की मौत के बाद भड़की अशांति में 80 लोग मारे गए थे.

कर्रा का इस्तीफा महबूबा मुफ्ती के उस बयान के बाद आया था कि ‘छोटे छोटे बच्चे आर्मी कैंप में टॉफ़ी और दूध लेने तो नहीं गए थे न?’ अपने इस्तीफे में कर्रा का कहना था, ‘पीडीपी ने लोगों के दिलों में छल, असंतोष और विश्वासघात के बीज तभी बो दिए थे जिस दिन उसने भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया था.’

इसके कुछ दिन बाद कर्रा कांग्रेस में शामिल हो गए. उनके जाने से सरकार तो नहीं गिरी, न ही और लोग उनकी देखा देखी पार्टी छोड़ कर गए. लेकिन इसने पीडीपी में कलह के बीज ज़रूर बो दिए. कश्मीर की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले टिप्पणीकार शाह अब्बास कहते हैं, ‘कर्रा के जाने के बाद और कश्मीर में थोड़ी शांति आ जाने के बाद महबूबा मुफ़्ती पर भाई-भतीजावाद के आरोप लगे क्योंकि उनके भाई और कुछ अन्य रिश्तेदारों को पार्टी में पद मिल गए थे.’

समय बीतने के साथ ये आरोप संगीन होते गए और पीडीपी में पड़ रही दरारें और साफ़ होती गईं. शाह अब्बास कहते हैं, ‘मिसाल के लिए बशारत बुखारी का केस लेते हैं. उनको 2017 में अपने तीन मंत्री पदों से हाथ धोना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने शायद अपना इस्तीफ़ा भी दे दिया था जो पार्टी ने मंजूर नहीं किया. अब अगर बशारत पीडीपी को छोड़ के एनसी में जा मिले हैं तो मुझे नहीं लगता यह कोई अचंभे वाली बात हैं.’

इसके बाद पीडीपी को बड़ा झटका तब लगा जब इस साल जून में भाजपा ने उसके साथ गठबंधन तोड़ दिया. भाजपा के इस फैसले के साथ ही पीडीपी में चल रहा आंतरिक कलह सबके सामने आ गया. इमरान रज़ा अंसारी के नेतृत्व में कम से कम पीडीपी के छह विधायकों ने पार्टी नेतृत्व पर भाई-भतीजावाद के आरोप खुले आम लगाए और कहा कि पीडीपी एक ‘फैमिली रन’ पार्टी है.

हालात को काबू में रखने के लिए महबूबा मुफ्ती ने कई क़दम उठाए. पहले उन्होंने अपने भाई और दो अन्य रिश्तेदारों को पार्टी संगठन से किनारे कर दिया. उसके बाद महबूबा ने हसीब द्राबू को पार्टी की ‘पॉलिटकल अफेयर्स कमेटी’ में जगह देने की पेशकश की. लेकन हसीब ने न सिर्फ इसे नकार दिया बल्कि उन्होंने इस बात को सार्वजनिक भी कर दिया. उन्होंने कहा कि संगठन के पुनर्गठन की इस कवायद के जरिये महबूबा मुफ्ती प्रायश्चित नहीं कर रहीं बल्कि उन जैसे नेताओं को किसी भी तरह मनाने की कोशिश कर रही हैं.

इसके बाद महबूबा मुफ्ती ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ गठबंधन सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा. लेकिन इससे अभी तक कोई फ़र्क़ पड़ता दिखाई दे नहीं रहा. लोग पीडीपी को छोड़कर जा रहे हैं और यह सिलसिला शायद अभी चलता रहेगा.

अब सवाल यह है कि अगर पीडीपी में इतने समय से कलह चल ही रही थी तो यह उथल-पुथल अब क्यों. आसान सा जवाब ढूंढें तो यह नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता नासिर सोगामी से मिल जाता है. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं कि हर राज्य में चुनाव से पहले यह सब होता है और जम्मू-कश्मीर का मामला अलग नहीं है. नासिर आगे जोड़ते हैं, ‘दूसरी बात ये कि राजनेता समझते हैं पीडीपी की ज़मीनी हालत क्या है. भाजपा के साथ गठबंधन लोगों की नज़र में कितनी बड़ी गलती थी, यह कश्मीर के राजनेताओं से ढकी-छुपी बात नहीं है. तो अगर अब लोग पीडीपी को छोड़कर एक अच्छे भविष्य की तलाश में हैं तो इसमें बुराई क्या है?’

तो क्या पीडीपी ख़तम हो जाएगी?

सत्याग्रह ने इस सवाल पर सबसे पहले पीडीपी के नेताओं से बात करनी चाही. लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता रफ़ी मीर और हाल तक मंत्री रहे नईम अख्तर सहित कई नेताओं ने इससे इनकार कर दिया. सूत्रों ने बताया कि पार्टी हाईकमान का हुक्म है कि मीडिया से इस विषय पर बात न की जाए.

दूसी तरफ राजनीतिक विशेषज्ञ इतनी जल्दी पीडीपी को खारिज करने के हक़ में नहीं हैं. पीडीपी पर करीब से नजर रखने वाले मसूद हुसैन का मानना है कि राजनीति में न किसी पार्टी को और न ही किसी शख्स को ख़ारिज किया जा सकता है. वे कहते हैं, ‘ख़ास तौर पर कश्मीर में किसी राजनैतिक पार्टी की प्रासंगिकता को ख़ारिज करना बेवकूफी होगी. हां, पीडीपी बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रही है, लेकिन उनकी प्रासंगिकता को नकारना बेवकूफी होगी.’

मसूद की तरह ही कश्मीर यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट के प्रमुख रहे नूर अहमद बाबा भी मानते हैं कि पीडीपी को इतनी जल्दी खारिज नहीं किया जा सकता. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, ‘लेकिन सच ये भी है कि पीडीपी बहुत तेज़ी से नीचे की तरफ जा रही है और ऐसे ही जाती रही तो ख़त्म होने में वक़्त नहीं लगेगा. अब ये पार्टी चलाने वालों के तरीके पर निर्भर करता है कि पीडीपी इस मुश्किल से निकलने में कामयाब होती या नहीं.’

वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि किसी ख़ास विचारधारा के न होने के चलते कोई बड़ी बात नहीं होगी कि पीडीपी वाक़ई ख़तम हो जाए. कश्मीर लाइफ नाम की मैगजीन के एसोसिएट एडिटर शम्स इरफ़ान कहते हैं, ‘अगर आप नज़र दौड़ाएं तो पीडीपी में यहां-वहां से खफा हुए लोग शामिल हो गए थे. कुछ मुख्यधारा की पार्टियों से और कुछ अलगावादियों से. ये सब तभी तक इकट्ठे रह सकते हैं जब तक सत्ता में हों या सत्ता आती दिखाई दे रही हो, और पीडीपी के पास इस समय दोनों में से कोई विकल्प नहीं है.’

शम्स उन कुछ लोगों में से हैं जो यह मानते हैं कि पीडीपी का अंत हो सकता है. शम्स की ही तरह नासिर सोगामी भी मानते हैं कि पीडीपी के पास कोई विचारधारा नहीं है. हालांकि वे यह कहने से परहेज़ कर रहे हैं कि पीडीपी ख़तम हो सकती है.

साभार- https://satyagrah.scroll.in/ से



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