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इस्कॉन मुंबईः भोजन जब प्रसाद बन जाता है, तो माँ के हाथ के खाने से भी ज्यादा स्वादिष्ट हो जाता है

मुंबई के जुहू में स्थित इस्क़ॉन के भगवान रासबिहारी जी के मंदिर में भोजन जिस पवित्रता, शुध्दता और शास्त्रीय विधि से मंत्रोच्चार के साथ बनाया जाता है, कदाचित ऐसा भोजन तो किसी कट्टर सनातनी हिंदू परिवार में भी नहीं बनता होगा। में मुंबई के कोने कोने से लोग गोविंदा रेस्टोरेंट में सपरिवार भोजन करने आते हैं। खफ परेड से लेकर सुदूर थाणे तक के लोग। जहाँ मुंबई में एक से दूसरी जगह जाने में ही दो से ढाई घंटे लग जाते हैं, उस शहर में लोग थका देने वाली लंबी यात्रा करके जब यहाँ भोजन करने या बच्चों का जन्म दिन मनाने से लेकर वैवाहिक वर्षगाँठ तक मनाने आते हैं तो कल्पना की जा सकती है कि यहाँ के भोजन में क्या नहीं होगा।

इस्कॉन के जनसंपर्क अधिकारी श्री कृष्ण भजन दास बताते हैं- हमारे भोजन के चार अंग हैं। स्वाद, विटामिन, बनाने वाले का भाव और ईश्वर को अर्पित करने का भाव। हम अपने रोजमर्रा की जिंदगी में जिस तरीके से भोजन बनाते हैं और करते हैं, यहाँ इस्कॉन में उसे एकदम अलग तरीके से बनाया जाता है।

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं-

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥ ३-१३॥
यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो लोग केवल अपने लिए अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं ॥

कृष्ण ने कहा है कि जो व्यक्ति भोजन बनाकर मुझे अर्पित करता हैस वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। अनाज किसी फैक्ट्री में या किसी मनुष्य के द्वारा नहीं बनाया जा सकता। ये तो खेतों में पैदा होता है, और ये ईश्वर की देन है। हम अनाज से भोजन बनाकर जब ईश्वर को अर्पित करते हैं तो ईश्वर उस भोजन को ग्रहण नहीं करते बल्कि उसका स्वाद लेते हैं।

जैसा कि एक प्रसिध्द भजन है कौन कहता है भगवान खाते नहीं, हम शबरी के जैसे उनको खिलाते नहीं..

जब हम भगवान को भोग लगा देते हैं तो वह भोजन महाप्रसाद बन जाता है। महाप्रसाद से भोजन का विस्तार होता है। ईशोपनिषद् का पहला मंत्र है-

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते,
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते।
ॐ शांति: शांति: शांतिः

इसका सीधा अर्थ यही है कि पूर्ण में से पूर्ण को निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है अर्थात हम परमात्मा को जितना भी अर्पण करते हैं वह उतना ही हमारे पास बचा रहता है।

कृष्ण भजन दास जी बताते हैं, यहाँ प्रसाद बनने के लिए कठोर नियमों का पालन किया जाता है और इसी भाव से भोजन प्रसाद बनाया जाता है कि प्रभु इस प्रसाद को नैवेद्य के रुप में वैसे ही स्वीकार करते हैं जैसे प्रभु राम ने शबरी के बैर खाए थे।

कृष्ण भजन दास जी कहते हैं, भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि जो मनुष्य भोजन को प्सराद के रूप में ग्रहण करता है वह अनुपम शारीरिक, मानसिक, गुणों के साथ सुदृढ़ हो जाता है।

स्वामी श्री ल प्रभुपाद जी अपना भोजनअपने हाथ से बनाते थे और भगवान को अर्पण करते थे। जब वे अमरीका गए तो खाली हाथ थे मगर जब उन्होंने वहाँ खुद भोजन बनाकर भगवान को अर्पण करके आसपास इकट्ठे हुए श्रध्दालुओं को प्रसाद दिया तो उसके स्वाद से सभी लोग चमत्कृत रह गए।

कृष्ण भजन दास जी बताते हैं चैतन्य महाप्रभु ने प्रसाद के माध्यम से ही एक बड़ा भक्ति आंदोलन खड़ा किया। वल्लभाचार्य, दक्षिण भारत के गौड़ीय संप्रदाय हो या पारंपरिक हिंदू परिवार सभी के घर में भोजन तभी किया जाता है जब तक भगवान को भोग न लग जाए। भगवान को भोग लगने के बाद प्रसाद का स्वाद ही बदल जाता है, वह अमृत तुल्य हो जाता है।

कृष्णदास जी बताते हैं इस्कॉन में जो लोग भोजन प्रसाद बनाते हैं उनको कड़े नियमों का पालन करना होता है। इस्कॉन में 7 तरह के रसोईघर हैं। जिसमें भगवान का, ब्रह्मचारी का, गोविंदा रेस्टोरेंट का, बैकरी का, मिठाई का, दर्शनार्थियों के लिए और स्टाफ के लिए रसोईघर हैं। यहाँ खाना बनाने के काम में लगे लोगों के लिए प्रमुख शर्त यही है कि वे मांसाहारी न हों, किसी तरह का व्यसन न करते हैं, प्रसाद बनाने के पहले स्नान ध्यान करते हों। यहाँ जो वेटर खाना परोसते हैं वे भोजन तैयार होने के बाद नैवेद्य लगाने के बाद कुछ देर कीर्तन करते हैं।

इस्कॉन द्वारा मकर सक्रांति पर एक लाख लोगों को भोजन कराया जाता है, लेकिन खाने की गुणवत्ता और शुध्दता पर कोई समझौता नहीं किया जाता। इस्कॉन के रेस्टोरेंट में मुंबई के कोने कोने से लोग परिवार सहित भोजन करने आते हैं।

भगवान को पाँच बार में 56 भोग लगाया जाता है। सबसे पहले सुबह 4 बजे मिठाई, 7 बजे दूध, 8 बजे फलों का, 12 बजे 56 भोग, 4 बजे फलों का , 6.30 बजे, विविध व्यंजनों का भोग और रात 9 बजे दूध और खीर का भोग लगाया जाता है। जब यहाँ भोजन बनाया जाता है तो पूरी प्रक्रिया में मंत्रों का उच्चार किया जाता है और गाय के शुध्द देसी घी से ही सभी सामग्री बनाई जाती है।

कृष्ण भजन दास बताते हैं कि पूज्य श्री ल प्रभुपादजी की भावना यही थी कि मंदिर के आसपास दस मील के क्षेत्र में कोई व्यक्ति भूखा नहीं रहे, इसी भावना से मंदिर में आने वाले सभी भक्तों को खिचड़ी का प्रसाद दिया जाता है।

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