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साहित्य के साथ लोक संस्कृति के लिए समर्पित जगदीश भारती

( चर्चित होने लगा उपन्यास ‘बिणजारा की टोळ’ )

राजस्थानी साहित्य सृजन के साथ – साथ लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में प्रवृत्त जगदीश भारती कोटा जिले की तहसील कनवास के ग्राम ढोटी में “करसो खेत खलांण ग्रामीण साहित्य एवं संस्कृति संवर्द्धन समिति ढोटी” के माध्यम से साहित्य और लोक संस्कृति की सेवा में रत हैं। आप राजस्थानी ( हाड़ोती ) भाषा के कवि और साहित्यकार हैं।

 चर्चा के दौरान आपने बताया कि इस समिति की राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में 33 शाखायें संचालित है जिसमें एक मध्यप्रदेश जिला राजगढ़ में है। उन्होंने कृषक कल्याण और लुप्त होती प्राचीन ग्रामीण लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए 2017 में इसकी स्थापना की थी। इसके माध्यम से ग्रामीण लोक साहित्य जैसे हीड,कड़ा,देव-जस,महिला गीत,मांगलिक
गीत,बंतळ,पहेलियां,हाली-हालन,ढोला-मारूं,तेजाजी देवलियो, निहालदे की बात, नरसी जी को माहेरो,गोपीचन्द भरथरी,
रुकमणी मंगल आदि ग्रामीण क्षेत्र में गाई जाने वाली लोकगाथाओं को संकलित कर पुस्तकें प्रकाशित करवाना हमारा उद्देश्य है।

करसो खेत खलांण के सम्पादन में लोक परम्परा से सम्बन्धित पांच लोक साहित्य की पांडुलिपियां प्रकाशन हेतु तैयार हैं। काफी लंबे समय से कई साथियों के माध्यम से तथ्यों का संकलन परिश्रम के साथ किया गया। अब तक तैयार पांडुलिपियों में * सत्यवादी हरिश्चन्द्र*, *तेजाजी देवलियो*, *पृथ्वीराज खींची के कड़े*,* गोपीचन्द भरथरी ख्याल* और *रुकमणी मंगल* शामिल हैं। ये सभी स्थानीय हाड़ोती बोली में तैयार की गई हैं। वर्तमान *नरसी जी का माहेरा* पर कार्य जारी है।

गौ-सेवा के प्रकल्पों का संचालन करना (गौशाला खुलवाना,बीमार गायों का इलाज), गौ रक्षा-सुरक्षा , गौपालन व गाय की महत्ता हेतु लोगों को जागरूक करना,सघन वृक्षारोपण,गांवों गावों में जनसहयोग से चड़ी-चुग्गा स्थलों का निर्माण, कमजोर,वंचित व विधवा महिलाओं को स्वरोजगार व स्वालम्बन हेतु प्रशिक्षण , किसानों के विकास व उन्नत कृषि हेतु प्रशिक्षण की व्यवस्था,दीपावली पर गौ-पूजन,बैल पूजन,गोवर्धन पूजन, घर साज सज्जा ,दीपक, दोहे चौपाई , छंद , चौतीसा,केल व शिक्षाप्रद कोटेशन लिखकर घर की सजावट करना,ऐतिहासिक महत्व के स्थलों पर आलेख, काव्यगोष्ठियां करवाकर , ऐसे स्थलों को जगजाहिर करना, विविध प्रतियोगिताएं आयोजित कर नकद पुरुस्कार से सम्मानित करना जेसे कार्य भी समिति के माध्यम से किए जाते हैं। पिताजी के नाम से ‘श्री धन्नालाल मेघवाल कृषक साहित्य सम्मान व माता जी के नाम से ‘श्रीमती गोपीबाई मेघवाल जामण संघर्ष सम्मान तथा श्री गजानन्द राव स्मृति सम्मान’ प्रदान किए जाते हैं। प्रत्येक सम्मान ग्यारह हजार रूपये का है। समिति अपनी एक साहित्यिक पत्रिका भी निकलती है।

साहित्य : संस्कृति संरक्षण के साथ – साथ जगदीश साहित्य के क्षेत्र में भी कवि और साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान रखते हैं। काव्यपाठ के लिए आपको विभिन्न अवसरों पर ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित कवि सम्मेलनों में आमंत्रित किया जाता है। हाड़ोती बोली में इनकी कविताओं को खूब पसंद किया जाता हैं। आकाशवाणी केन्द्र से भी आपकी कविताओं का प्रसारण हुआ है। गांव के परिवेश को उजागर करती इनकी एक कविता की कुछ पंक्तियां देखिए —
– सांझ ढळ्यां गांव मं–गांव,
गांव को नांव
जहन मं आता ईं,
 आ जावै छै,
आख्यां कै आगै,
 अेक रूपाळी सांझ,
 गांव की।
 घणीं ई ओपती,
सोवती सी तसबीर,
सुरग सी ठांव की।
 अेक कतार मं,
 बण्यां छोटा बडा,
कुछ काचा
 कुछ पाका,
लिप्या-पुत्या घरबार।

जैसे जैसे आप कथाकारों के संपर्क में आए कहानियां लिखने लगे। ग्रामीण परिवेश के इर्द गिर्द घूमती इनकी 26 राजस्थानी भाषा की कहानियों का संग्रह ‘पाछी बावड़जे मिजाजण’ प्रकाशित हुआ है। राजस्थानी उपन्यास- ‘बिणजारा की टोळ’ राजस्थानी पोथी ‘ढोटी के वे अलबेले लोग’ संस्मरण ‘डुल्या-ऊमरा’ एवम रेखाचित्र ‘ उजड़ -खेड़ो’ प्रकाशन की तैयारी में हैं। इनकी इन साहित्यिक कृतियों पर अभी से लेखकों द्वारा समीक्षा लिखी जाने लगी हैं। उपन्यास ‘बिणजारा की टोळ’ को लेकर खासे उत्साहित हैं।

परिचय : आपका जन्म कोटा जिले की तहसील कनवास के ग्राम ढोटी में 10 अक्टूबर 1968 को स्व.धननालाल मेघवाल के परिवार में हुआ। आपने बी. ए. , बी.एड. तक शिक्षा प्राप्त की है। वर्तमान में आप राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय,आमली झाड़, कोटा जिले में हिंदी विषय के वरिष्ठ अध्यापक के रूप में सेवारत हैं ।
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– डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवम पत्रकार

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