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भारत के असली बाहुबलि जैन तीर्थंकर ऋषभ देव के पुत्र थे

इन दिनों सारे देश में सिर्फ बाहुबली फिल्म को लेकर चर्चाओं का दौर चल रहा है। मनो देश में कोई त्यौहार आया हो और हर कोई इसे उत्साह के साथ मना रहा हो। डायरेक्टर एसएस राजामौली की इस फिल्म ने इतिहास रच दिया है। हर किसी की जुबान पर सिर्फ बाहुबली ही छाया हुआ है। लोग यह जानकर सुकून की सांस ले रहे हैं कि आखिर कट्टप्पा ने बाहुबलि को क्यों मारा लेकिन हम में से अधिकतर लोग इस बात से अंजान है कि हमारे देश भारत में लाखों साल पहले एक असली बाहुबलि ने जन्म लिया था। जिसके शौर्य और पराक्रम के बारे में देवलोक में भी चर्चाएं होती थी। जिसके सामने चक्रवर्ती का चक्रवर्तित्व भी बौना हो जाता है। आज हम आपको ऐसे ही भारत के वीर असली बाहुबली से रूबरू कराने वाले हैं।

जैन मान्यता के अनुसार पहले तीर्थंकर ऋषभदेव के भारत-बाहुबली को मिलाकर100 पुत्र थे। दोनों की वीर और पराक्रमी भी थे। ऐसा मान जाता है कि इनके पुत्र भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत पड़ा। ऋषभदेव अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश का राजा थे। समय के बीतने पर कल्पवृक्षों का अभाव हो गया। इसके बाद ऋषभदेव ने राज्य के लोगों को असि, मसि और कृषि की शिक्षाएं दी। कुछ समय पश्चात निलांजना नाम की नृत्यकी की नृत्य के दौरान मृत्यू हो जाने पर उन्हें वैराग्य हो गया और वे संसारता की आसारता जानकर वैराग्य धारण कर जैन मुनि दीक्षा लेकर वन को चले गए। दीक्षा से पूर्व उन्होंने अपने राज्य को भरत-बाहुबली समेत सौ पुत्रों में बांट दिया।

आयोध्या का राज्य उनके पुत्र भरत को मिला जबकि छोटे भाई बाहुबली को मिला अस्माका का राजपद मिला। दक्षिण भारत में. इसकी राजधानी हुआ करती थी पोदनपुर। एक दिन भरत अपने दरबार में बैठे हुए थे. उन्हें एक के बाद एक तीन शुभ समाचार मिले. सबसे पहले माली ने आकर बताया कि उनके पिता ऋषभदेव की साधना सफल हुई है. दूसरा शुभ समाचार मिला आयुधशाला से नौरत्नों के जरिए उन्हें चमत्कारी चक्र की प्राप्ति हुई है. तीसरा समाचार मिला रानीवास से कि उन्हें बेटा हुआ है.
चक्ररत्न की प्राप्ति होने पर उन्होंने वे युध्द पर निकल गए और छह खंडों को जीतकर वापस लौटे। अब पूरी दुनिया में सिर्फ बाहुबलि का राज्य पोदनपुर ही बचा था। जिसे वो नहीं जीत चके । इसके लिए उन्होंने बाहुबली को दासता स्वीकार करने के लिए पत्र भेजा लेकिन बाहुबलि ने दासता स्वीकार नहीं की। इसके बाद क्रोधित भरत ने बाहुबलि के ऊपर चढ़ाई कर दी। लेकिन भरत से हजार गुनी कम सेना होने के बाद भी वे घबराए नहीं। वे यह जानते थे कि सारी दुनिया को भरत जीत चुके हैं फिर भी उन्हें अपने सामर्थ पर यकीन था और वे युद्घ करने रणभूमि में आ गए।

जैसे ही युध्द का उदघोष हुआ। तभी प्रबुद्घजनों ने संबोधन किया कि उनके पिता तो अंहिसा के पथिक हैं फिर उनके पुत्र युद्घ का तांडव कर हिंसा कैसे कर सकते हैं तब उनमें तय हुआ कि सेना के बिना ही सिर्फ भरत बाहुबलि के बीच तीन तरह का युद्घ होगा। सबसे पहले दृष्टि युद्घ हुआ, उसके बाद जल युद्घ और मल्ल युद्घ तीनों ही तरह से युद्घ में विश्वविजेता भरत को बाहुबलि ने हरा दिया। इसे देखकर पूरी दुनिया में बाहुबली का गुणगान होने लगा। तभी हार से क्रोधित भरत ने अपना चक्ररत्न अपने छोटे भाई भरत पर चला दिया। लेकिन चक्ररत्न भी बाहुबलि के तीन परिक्रमा कर वापस लौट गया। क्योंकि चक्ररत्न सगे सबंधियों पर नहीं चलता इसलिए यह प्रयोग भी भरत का व्यर्थ गया।

भरत को जीतने के बाद धीरोदात्त बाहुबलि को वैराग्य आ गया उन्हें लगा कि नष्ट हो जाने वाले इस राज्य के लिए भाईयों में लड़ाई हो गई। भरत खून का प्यासा हो गया। इस तरह से संसार के दुख देखकर उन्होंने भी भरत को अपना राज्य देकर दीक्षा धारण कर ली और घोर तपस्या कर अपने पिता के मार्ग पर चलकर मोक्ष की प्राप्ति की।
बाहुबलि की विश्व की सबसे ऊंची 57 फीट की प्रतिमा कर्नाटक श्रवणबेलगोला में आज भी उनके पराक्रम और अदभुत कौशल की कहानी कह रही है। हमें यह सब मिथक लग सकता है लेकिन भारत को गौरवशाली इतिहास में बाहुबलि आज भी अमर हैं। हां ये जरूर है कि असली बाहुबली को आज हमने भुला दिया। लेकिन वो हमेशा अमर थे, अमर हैं उनकी विजय पताका आज भी गोम्मटेश बाहुबलि के रूप में दुनिया देखर रही है। इस प्राचीन प्रतिमा का निर्माण वर्ष 983 में यहां के गंग शासक रचमल्ल के शासनकाल में चामुण्डराय नामक मंत्री ने बाहुबली की इस विशाल प्रतिमा का निर्माण करवाया था. भारतीय राज्य कर्नाटक के मड्या जिले में श्रवणबेलगोला के गोम्मटेश्वर स्थान पर स्थित महाबली बाहुबली की विशालकाय प्रतीमा जिसे देखने के लिए विश्‍व के कोने-कोने से लोग आते हैं। बाहुबली की विशालकाय प्रतिमा पूर्णत: एक ही पत्थर से निर्मित है। इस मूर्ति को बनाने में मूर्तिकार को लगभग 12 वर्ष लगे। बाहुबली को गोमटेश्वर भी कहा जाता था

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