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जम्मू कश्मीर का भारत में विलयः भ्रांतियाँ और तथ्य

26 अक्तूबर को जम्मू-कश्मीर के देशभक्त लोग हर बरस विलय दिवस मनाते हैं। इसी रोज 1947 में यहां के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय के लिए विलय-पत्र पर दस्तखत किए थे। गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने 27 अक्तूबर को इसे मंजूरी दी। विलय-पत्र का खाका हूबहू वही था जिसका भारत में शामिल हुए अन्य सैंकड़ों रजवाड़ों ने अपनी-अपनी रियासत को भारत में शामिल करने के लिए इस्तेमाल किया था। न इसमें कोई शर्त शुमार थी और न ही रियासत के लिए विशेष दर्जे जैसी कोई मांग।
इस वैधानिक दस्तावेज पर दस्तखत होते ही समूचा जम्मू कश्मीर , जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला इलाका भी शामिल है,भारत का अभिन्न अंग बन गया। भारत में जम्मू कश्मीर के विलय से संबंधित दस्तावेजों में यह सर्वाधिक वजनदार और मौलिक दस्तावेज हैं। राय में इसके बाद के घटनाच और भारत के साथ उसके रिश्तों पर जितने भी सवाल रह रह कर उठते रहे हैं, यह दस्तावेज उनका सच्चा और सटीक उत्तर है। भारतद्रोहियों व पाकपरस्तों के पास इसकी कोई काट नहीं।
पंडित नेहरू जम्मू कश्मीर के मामले में व्यक्तिगत तौर पर बहुत रूचि रखते थे। अन्य कारणों में रियासत की भौगोलिक और आतंरिक स्थितियों को शुमार कर सकते हैं। जम्मू कश्मीर एक बड़ा राय था जिसकी सीमाएं पांच देशों को छूती थीं। यहां अधिक आबादी मुस्लिम थी और राजा हिंदू था। रियासत के अलग अलग हिस्सों, मसलन गिलगित बाल्टिस्तान,कश्मीर, जम्मू और लद्दाख के लोगों की आकांक्षाएं भी भिन्न भिन्न थी। महाराजा को इनके बीच संतुलन कायम करते हुए निर्णय लेना था। इस वजह से वे पंद्रह अगस्त तक कोई निर्णय नहीं ले सके।
लिहाजा, उन्होंने 14 अगस्त को भारत और पाकिस्तान दोनों को अलग अलग यथास्थिति समझौते के प्रस्ताव भेजे। पाकिस्तान के साथ वे अंतिम निर्णय होने तक यातायात और संचार के संबंध कायम रखने के साथ अनामण की संधि चाहते थे। पाक ने इसे तत्काल मान लिया चूंकि उसके हुकमरानों को लगता था कि ब्रिटेन के दबाव में महाराजा आखिर पाकिस्तान में विलय को राजी हो जाएंगे। भारत को हरि सिंह ने यथास्थिति समझौते का जो प्रस्ताव भेजा उसमें भारत के साथ उन्हीं संबंधों को कायम रखने की बात कही गई थी जैसे कि उनके ब्रिटिश इंडिया के साथ थे। भारत ने यह कह कर इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया कि हम परस्पर बातचीत के बाद ही ऐसा कोई करार करेंगे। पर इस बातचीत के लिए कोई पहल दिल्ली ने की नहीं। इसके बावजूद महाराजा भारत के नेतृत्व के साथ रियासत के भविष्य को लेकर लगातार विमर्श कर रहे थे।
पाकिस्तान को जम्मू कश्मीर हाथ से खिसकता नजर आने लगा तो बौखलाहट में उसने 22 अक्तूबर को कबाइलियों के वेश में फौज भेज कर जम्मू कश्मीर पर आमण कर दिया। पाकिस्तानियों ने रियासत में जो कत्लोगारत मचायी उसका सामना करने में महाराजा की फौज को दिक्कत आनी ही थी। उन्होंने भारत से मदद मांगी। दिल्ली ने विलय से पूर्व सेना भेजने से इनकार कर दिया तो महाराजा ने विलय-पत्र पर दस्खत कर दिल्ली भिजवा दिया। इसके साथ ही हरि सिंह ने शेख को आपातकालीन सरकार का मुखिया भी बना दिया।

26 अक्तूबर को विलय पत्र पर महाराजा के दस्तखत हुए। 27 को माउंटबेटन की कलम चली और इसी दिन भारतीय फौज संकटग्रस्त कश्मीर में दाखिल हुई। जिस दिन भारतीय फौज वहां पंहुची, उस दिन वह भारतीय जम्मू कश्मीर था। उस रोज तक राय की लगभग साढे चार हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर ही पाकिस्तानी काबिज हो पाए थे।

पृष्ठभूमि
जम्मू कश्मीर में स्वतंत्रता से पूर्व नेशनल कांफ्रेंस और मुस्लिम कांफ्रेंस दो प्रमुख दल सक्रिय थे। 1939 में नेशनल कांफ्रेंस का गठन हुआ। नेशनल कांफ्रेंस का केवल कश्मीर घाटी में अच्छा प्रभाव था । मुस्लिम कांफ्रेंस को जम्मू के अनेक क्षेत्रो छिट-पुट समर्थन हासिल था। कोई भी दल भारत के खिलाफ नहीं था जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि राज्य की जनता में भारत में विलय के संबंध में कोई ऊहा-पोह थी।

जब भारत की स्वतंत्रता का निश्चय हो गया और यह चर्चा शुरू हो गयी कि अंग्रेज कांग्रेस को सत्ता सौंपेंगे, साथ ही भारत का एक हिस्सा काट कर पाकिस्तान नाम का नया राज्य बनेगा जिसकी बागडोर जिन्ना संभालेंगे, तो शेख के मन में भी यह इच्छा बलवती हो गयी कि कश्मीर की सत्ता उसे सौंपी जानी चाहिये।

1946 में नेशनल कांफ्रेस ने ‘कश्मीर छोड़ो’ का नारा दिया जो अंग्रेजो के विरुद्ध नहीं बल्कि महाराजा के खिलाफ था। उसकी मांग थी कि कांग्रेस की तर्ज पर नेशनल कांफ्रेंस को सत्ता सौंप कर महाराजा कश्मीर छोड़ दें। परिणामस्वरूप महाराजा ने राजद्रोह के आरोप में शेख को कारावास में डाल दिया। पं नेहरू ने शेख के आंदोलन का समर्थन किया जो महाराज और नेहरू के संबंधों में खटास का कारण बना। पं नेहरू की जिद के चलते महाराजा को शेख के हाथों सत्ता सौंपने को विवश होना पड़ा। किन्तु इससे पूर्व शेख को जेल से तभी छोड़ा गया ,जब उसने महाराजा के प्रति निष्ठा की शपथ ली।

26 सितम्बर 1947 को महाराजा को लिखे गये अपने पत्र में शेख अब्दुल्ला ने लिखा – इस बात के बावजूद कि भूतकाल में क्या हुआ है, मैं महाराजा को यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैंने और मेरी पार्टी ने कभी भी महाराज या उनकी राजगद्दी या उनके राजवंश के प्रति कभी भी अनिष्ठा की भावना नहीं रखी है। …… महाराज, मैं अपने और अपने संगठन की ओर से आपको पूर्ण निष्ठा व समर्थन का आश्वासन देता हूं … . पत्र खत्म करने से पहले महाराज मैं एक बार फिर अपनी अविचल निष्ठा का आश्वासन देता हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह मुझे महामहिम के संरक्षण में वह अवसर प्रदान करें कि इस राज्य को शांति, समृद्धि और सुशासन हासिल हो सके।
यह तथ्य है कि महाराजा ने अपने हस्ताक्षर किये हुए विलय पत्र के साथ एक पत्र भेजा था जिसमें विलय का निर्णय करने में हुए विलम्ब के कारणों पर प्रकाश डाला था। किन्तु उन्होंने इसमें कहीं भी राज्य में विलय को लेकर हुए किसी विवाद की चर्चा तक नहीं की है। न तो उसमें भारत में विलय को लेकर जनता के विरोध का उल्लेख है और न ही पाकिस्तान के साथ विलय अथवा स्वतंत्रता की मांग संबंधी किसी आन्दोलन का जिक्र। अन्य उपलब्ध दस्तावेजों में भी कहीं ऐसे किसी विवाद का संदर्भ नहीं मिलता। फिर भी माउंटबेटन द्वारा विलय को विवादित बताया जाना किसी दूरगामी राजनीति की ओर संकेत करता है।

संवैधानिक स्थिति
17 जून 1947 को भारतीय स्वाधीनता अधिनियम-1947 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया। 18 जुलाई को इसे शाही स्वीकृति मिली जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई तथा उसके एक भाग को काट कर नवगठित राज्य पाकिस्तान का उदय हुआ।
पाकिस्तान के अधीन पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत एवं सिंध का भाग आया। ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहा शेष भू-भाग भारत के साथ रहा। इस अधिनियम से ब्रिटिश भारत की रियासतें अंग्रेजी राज की परमोच्चता से तो मुक्त हो गईं, परन्तु उन्हें राष्ट्र का दर्जा नहीं मिला उन्हें यह सुझाव दिया गया कि भारत या पाकिस्तान में जुड़ने में ही उनका हित है। इस अधिनियम के लागू होते ही रियासतों की सुरक्षा की अंग्रेजों की जिम्मेदारी भी स्वयमेव समाप्त हो गई।

भारत शासन अधिनियम 1935, जिसे भारतीय स्वाधीनता अधिनियम 1947 में शामिल किया गया, के अनुसार विलय के बारे में nनिर्णय का अधिकार राज्य के राजा को दिया गया। यह भी निश्चित किया गया कि कोई भी भारतीय रियासत उसी स्थिति में दो राष्ट्रों में से किसी एक में मिली मानी जायेगी, जब गवर्नर जनरल उस रियासत के शासन द्वारा निष्पादित विलय पत्र को स्वीकृति प्रदान करें।

जम्मू-कश्मीर रियासत, जिसका विलय 26 अक्तूबर 1947 को भारतीय संघ में हुआ, वह आज के भारत द्वारा शासित जम्मू-कश्मीर राज्य से कहीं अधिक विशाल था। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर रियासत के निम्न हिस्से हैं :-

जम्मू – इसका क्षेत्रफल कुल 36,315 वर्ग कि.मी. है जिसमें से आज हमारे पास लगभग 26 हजार वर्ग कि.मी. है। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों से युक्त पीर पंजाल पर्वत के दक्षिण में इस क्षेत्र में तवी और चेनाब जैसी बारहमासी नदियां बहती हैं। यहां की वर्तमान जनसंख्या का लगभग 67 प्रतिशत हिन्दू है। मुख्य भाषा डोगरी व पहाड़ी है।

कश्मीर– लगभग 22 हजार वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल, जिसमें से लगभग 16 हजार वर्ग कि.मी. ही हमारे पास है। वर्तमान में अधिकांश जनसंख्या मुस्लिम है, लगभग 4 लाख हिन्दू वर्तमान में कश्मीर घाटी से विस्थापित हैं। जेहलम और किशनगंगा नदियों में जाने वाली जलधाराओं से बना यह क्षेत्र दो घाटियों जेहलम घाटी एवं लोलाब घाटी से मिलकर बना है। मुख्यत: कश्मीरी भाषा बोली जाती है, परन्तु एक तिहाई लोग पंजाबी-पहाड़ी बोलते हैं।

लद्दाख– कुल 1,01,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र, जिसमें से लगभग 59 हजार वर्ग कि.मी. भारत के अधिकार में है। प्रकृति की अनमोल धरोहर के साथ ही बड़ी संख्या में बौद्ध मठ यहां हैं जहां दुनिया के कोलाहल से दूर शांति का अनुभव किया जा सकता है।

01 जुलाई 1979 को लद्दाख का विभाजन कर लेह और करगिल; दो जिलों का गठन किया गया। पश्चिम बंगाल के गोरखालैंड की तर्ज पर दोनों जिलों का संचालन ‘स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद’ द्वारा किया जाता है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, लद्दाख की कुल जनसंख्या 236539 और क्षेत्रफल 59146 वर्ग कि.मी. है। यह भारत के सबसे विरल जनसंख्या वाले भागों में से एक है।

राज्य में लोकसभा की 6 और विधानसभा की 87 सीटें हैं जिसमें लद्दाख में लोकसभा की एक और विधानसभा की 4 सीटें हैं। करगिल और लेह जिले में विधानसभा की दो-दो सीटें है; जिनके नाम क्रमशः जांस्कर व कारगिल और नोब्रा व लेह है। दोनों जिले करगिल और लेह लद्दाख लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या 65 लाख से ज्यादा है; जिसमें करीब 1,52,339 मतदाता लद्दाख में हैं।

करगिल के मुसलमान पक्के देशभक्त माने जाते हैं और 1999 में पाकिस्तान द्वारा कारगिल घुसपैठ के दौरान उन्होंने भारतीय सेना का खुलकर साथ दिया था। लद्दाख को चीन पश्चिम तिब्बत कहता है और सिन्धु नदी तक अपनी सीमा को बढ़ाना चाहता है। 1950 से ही इस क्षेत्र पर उसकी नजर है। लेह, जंस्कार, चांगथांग, नुब्रा, यह चार घाटियां बौध्दबहुल व सुरू घाटी पूर्णतया मुस्लिमबहुल है।

गिलगित-वाल्टिस्तान– जम्मू-कश्मीर के इस क्षेत्र को पाकिस्तान ने विधिवत अपना प्रांत घोषित कर उसका सीधा शासन अपने हाथ में ले लिया है। यह लगभग 63 हजार वर्ग किमी. विस्तृत भू-भाग है जिसमें गिलगित लगभग 42 हजार वर्ग किमी. व वाल्टिस्तान लगभग 20 हजार वर्ग किमी. है। गिलगित का सामरिक महत्व है। यह वह क्षेत्र है जहां 6 देशों की सीमाएं मिलती हैं- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, चीन, तिब्बत एवं भारत। यह मध्य एशिया को दक्षिण एशिया से जोड़ने वाला दुर्गम क्षेत्र है जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा जिसके द्वारा पूरे एशिया में प्रभुत्व रखा जा सकता है।

अमेरिका भी पहले गिलगित पर अपना प्रभाव रखना चाहता था और एक समय चीन के बढ़ते प्रभुत्व को रोकने के लिये सोवियत रूस की भी ऐसी ही इच्छा थी, इसलिये 60 के दशक में रूस ने पाकिस्तान का समय-समय पर समर्थन कर गिलगित को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने का प्रयास किया था। वर्तमान में गिलगित में चीन के 11000 सैनिक तैनात हैं। पिछले वर्षो में इस क्षेत्र में चीन ने लगभग 65 हजार करोड़ रूपये का निवेश किया व आज अनेक चीनी कंपनियां व कर्मचारी वहां पर काम कर रहे हैं।

1935 में जब सोवियत रूस ने तजाकिस्तान को रौंद दिया तो अंग्रेजों ने गिलगित के महत्व को समझते हुये महाराजा हरिसिंह से समझौता कर वहां की सुरक्षा व प्रशासन की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने के लिये 60 वर्ष के लिये इसे पट्टे पर ले लिया। 1947 में इस क्षेत्र को उन्होंने महाराजा को वापिस कर दिया।

विस्थापितों की भूमि-जम्मू

गत 63 वर्षों से जम्मू विस्थापन की मार झेल रहा है। आज जम्मू क्षेत्र में लगभग 60 लाख जनसंख्या है जिसमें 42 लाख हिन्दू हैं। इनमें लगभग 15 लाख विस्थापित लोग हैं जो समान अधिकार एवं समान अवसर का आश्वासन देने वाले भारत के संविधान के लागू होने के 60 वर्ष पश्चात भी अपना अपराध पूछ रहे हैं। उनका प्रश्न है कि उन्हें और कितने दिन गुलामों एवं भिखारियों का जीवन जीना है।

पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर के विस्थापित–
1947 में लगभग 50 हजार परिवार पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर से विस्थापित होकर भारतीय क्षेत्र स्थित जम्मू-कश्मीर में आये। आज उनकी जनसंख्या लगभग 12 लाख है जो पूरे देश में बिखरे हुए हैं। जम्मू क्षेत्र में इनकी संख्या लगभग 8 लाख है। सरकार ने इनका स्थायी पुनर्वास इसलिये नहीं किया कि पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर हमारे नक्शे में है, हमारा दावा कमजोर हो जायेगा, अगर हम उनको उनका पूरा मुआवजा दे देंगे। आज 63 वर्ष पश्चात भी उनके 56 कैंप हैं जिनमें आज भी वे अपने स्थायी पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं।

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¨ जो मकान, जमीन उनको दी गई, उसका भी मालिकाना हक उनका नहीं है।

¨ 1947 में छूट गई संपत्तियों एवं विस्थापित आबादी का ठीक से पंजीकरण ही नहीं हुआ फिर मुआवजा बहुत दूर की बात है। ¨ विभाजन के बाद पाक अधिगृहीत कश्मीर से विस्थापित हुए हिन्दू, जो बाद में देश भर में फैल गये, उनके जम्मू-कश्मीर में स्थायी निवासी प्रमाण पत्र ही नहीं बनते।

¨ विधानसभा में पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर के 24 क्षेत्र खाली रहते हैं। विधानसभा और विधान परिषद में इन विस्थापित होकर आये उस क्षेत्र के मूल निवासियों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिये जाने का प्रस्ताव अनेक बार आया है किन्तु इस पर सरकार खामोश है।

¨ इनके बच्चों के लिये छात्रवृत्ति, शिक्षा-नौकरी में आरक्षण आदि की व्यवस्था नहीं है।

पश्चिमी पाक के शरणार्थी- इनकी आबादी लगभग दो लाख है। ये 63 वर्ष पश्चात भी जम्मू-कश्मीर के स्थायी नागरिक नहीं हैं। नागरिकता के सभी मूल अधिकारों – वोट, उच्च शिक्षा एवं व्यावसायिक शिक्षा में बच्चों को दाखिला, सरकारी नौकरी, संपत्ति खरीदने का अधिकार, छात्रवृति आदि से यह वंचित हैं।

छम्ब विस्थापित– 1947 तथा 1965 में युद्ध के समय इस क्षेत्र के लोग विस्थापित हुए। 1971 में इस क्षेत्र को शिमला समझौते में पाकिस्तान को देने के पश्चात स्थायी तौर पर विस्थापितों की यह संख्या भी लगभग एक लाख है। इनका पुनर्वास तो भारत सरकार की जिम्मेदारी थी, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय समझौते में हमने छम्ब की 18 हजार एकड़ भूमि पाकिस्तान को दे दी। भारत सरकार ने वादे के अनुसार न तो भूमि अथवा उसके बदले कीमत दी, घर-पशु आदि के लिये भी एक परिवार को केवल 8,500 रूपये दिये।
कश्मीरी हिन्दू– 1989-1991 में आये कश्मीर के हिन्दू यह महसूस करते हैं कि हम देश, समाज, सरकार, राजनैतिक दल – सभी के ऐजेंडे से आज बाहर हो गये हैं। 52 हजार पंजीकृत परिवारों की अनुमानित आबादी 4 लाख है। एक के बाद एक आश्वासन, पैकेज – पर धरती पर वही ढाक के तीन पात।

20 वर्ष पश्चात् भी धार्मिक-सामाजिक संपत्तियों के संरक्षण का बिल विधानसभा में पारित नहीं हुआ, राजनैतिक तौर पर विधानसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। 1991 में 1 लाख से अधिक पंजीकृत मतदाता थे जो आज कम होकर 70 हजार रह गये हैं। विस्थापन के पश्चात उनके वोट बनाने और डालने की कोई उचित व्यवस्था न होने के कारण समाज की रूचि कम होती जा रही है। आज भी समाज की एक ही इच्छा है कि घाटी में पुन: सुरक्षित, स्थायी, सम्मानपूर्वक रहने की व्यवस्था के साथ सभी की एक साथ वापसी हो।

जम्मू के आतंक पीड़ित क्षेत्रों के विस्थापित- कश्मीर घाटी के पश्चात जम्मू के डोडा, किश्तवाड़, रामबन, उधमपुर, रियासी, पुंछ, राजौरी, कठुआ जिलों के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में यह आतंकवाद आया, पर सरकार ने आज तक इन क्षेत्रों से आंतरिक विस्थापित लोगों की न तो गिनती ही की और न ही उनके लिये उचित व्यवस्था की। यह संख्या भी लगभग एक लाख है। आतंकवाद से प्रभावित लोगों की कुल संख्या तो लगभग 8 लाख है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पश्चात भी सरकार इनकी उपेक्षा कर रही है। जबकि ये वे लोग हैं जिन्होंने आतंकवाद से लड़ते हुये बलिदान दिये, स्थायी रूप से विकलांग हो गये। गांव-घर-खेत छोड़े, पर न धर्म छोड़ा और न भारत माता की जय बोलना छोड़ा। आज इनके बच्चे बिक रहे हैं, घरों एवं ढाबों में मजदूरी कर रहे हैं।

जम्मू से भेदभाव
जम्मू क्षेत्र के 26 हजार वर्ग किमी. क्षेत्र में 2002 की गणनानुसार 30,59,986 मतदाता थे। आज भी 2/3 क्षेत्र पहाड़ी, दुष्कर, सड़क-संचार-संपर्क से कटा होने के पश्चात भी 37 विधानसभा क्षेत्र हैं व 2 लोक सभा क्षेत्र। जबकि कश्मीर घाटी में 15,953 वर्ग किमी. क्षेत्रफल, 29 लाख मतदाता, अधिकांश मैदानी क्षेत्र एवं पूरी तरह से एक-दूसरे से जुड़ा, पर विधानसभा में 46 प्रतिनिधि एवं तीन लोकसभा क्षेत्र हैं।
जनसंख्या में धांधली– 2001 की जनगणना में कश्मीर घाटी की जनसंख्या 54,76,970 दिखाई गई, जबकि वोटर 29 लाख थे और जम्मू क्षेत्र की जनसंख्या 44,30,191 दिखाई गई जबकि वोटर 30.59 लाख हैं।

उच्च शिक्षा में धांधली– आतंकवाद के कारण कश्मीर घाटी की शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई, पर प्रतियोगी परीक्षाओं में वहां के विद्यार्थियों का सफलता का प्रतिशत बढ़ता गया।

मेडिकल सीटों में दाखिला– एमबीबीएस दाखिलों में जम्मू का 1990 में 60 प्रतिशत हिस्सा था जो 1995 से 2010 के बीच घटकर औसत 17-21 प्रतिशत रह गया है। सामान्य श्रेणी में तो यह प्रतिशत 10 से भी कम है।

लद्दाख से भेदभाव
जम्मू-कश्मीर राज्य में लोकतांत्रिक सरकार के गठन के बाद से ही इस क्षेत्र के साथ भेदभाव किया जाता रहा है। इस समस्या के समाधान के लिए पश्चिम बंगाल के गोरखालैंड की तर्ज पर लद्दाख के दोनों जिलों के संचालन हेतु ‘स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद’ का गठन किया गया लेकिन फिर भी इस क्षेत्र के साथ भेदभाव कम नहीं हुआ है।
लद्दाख से भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.ए.एस.) में अब तक 4 लोग चुने गए हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इनमें से एक भी बौद्ध नहीं; बल्कि सभी मुस्लिम थे।
वर्ष 1997-98 में के.ए.एस. और के.पी.एस. अधिकारियों की भर्ती के लिए राज्य लोक सेवा आयोग ने परीक्षा आयोजित की। इन परीक्षाओं में 1 ईसाई, 3 मुस्लिम तथा 23 बौद्धों ने लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की। 1 ईसाई और 3 मुस्लिम सेवार्थियों को नियुक्ति दे दी गयी जबकि 23 बौद्धों में से मात्र 1 को नियुक्ति दी गयी। इस एक उदाहरण से ही राज्य सरकार द्वारा लद्दाख के बौद्धों के साथ किये जाने वाले भेदभाव का अनुमान लगाया जा सकता है।

कश्मीर से नियंत्रित होने के कारण लद्दाख की भाषा और संस्कृति भी आज संकट में है। लद्दाख की भोटी भाषा एक समृद्ध भाषा रही है। संस्कृत के अनेक ग्रंथ भी मूल संस्कृत में अप्राप्य हैं किन्तु वे भोटी भाषा में सुरक्षित हैं। राज्य सरकार की उर्दू को अनिवार्य करने की नीति के कारण लद्दाख के आधे से अधिक विद्यार्थी लद्दाख से बाहर जा कर पढ़ने के लिये विवश हैं। भोटी भाषा को संविधान की 14वीं अनुसूची में शामिल करके ही उसके अस्तित्व को बचाया जा सकता है।

चीन से लगने वाली 1600 किमी लम्बी सीमा का बड़ा भाग लद्दाख से जुड़ा हुआ है। सीमा की सुरक्षा और लद्दाख की विशेष सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए लद्दाख के समाज और उसकी विशिष्टता के संरक्षण का एकमात्र उपाय उसे संघ शासित राज्य घोषित करना ही है।
साभार- http://www.jammukashmirnow.com/ से posting

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