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जड़ों से जुड़ता “जम्मू-कश्मीर”

भारत सरकार का कश्मीर के बंद व क्षतिग्रस्त लगभग पचास हज़ार मंदिरों का जीर्णोद्धार के निर्णय ने समस्त भारतभक्तों को उत्साहित किया है। देव भूमि कश्मीर में जब देवी-देवताओं के सदियों प्राचीन मंदिरों में शंखनाद होगा और घंटियां बजेगी तो अपनी जड़ों से जुड़ने को आतुर जम्मू-कश्मीर की जनता अवश्य आनन्दित होगी। साथ ही अगर ऐसी सकारात्मक स्थिति में शासन अपनी पूर्व योजनाओं के अनुसार कश्मीर से विस्थापित हिन्दुओं को कश्मीर में पुनः सुरक्षित बसाने का भी निर्णय शीघ्र करें तो और अधिक सार्थक होगा।

क्या यह उचित नहीं कि विस्थापित हिन्दुओं को उनकी पैतृक जमीन-जायदाद मिलें और उनको वहां पूर्ण सुरक्षा के साथ बसाया जा सकें? अगर इसमें कोई समस्या हो तो उसके बदले उतने ही मूल्यों के कश्मीर के सुरक्षित स्थानों पर उनको बसाया जाना चाहिये। निःसंदेह अगर वहां हिन्दू नहीं बसाये जाएंगे तो फिर वहां के मंदिरों के जीर्णोद्धार का कोई औचित्य नहीं। मंदिर में भगवान हो पर भक्त न हो तो कश्मीर के विकास का अभियान कैसे सफल होगा ?

वर्तमान स्थितियों में यह भी सोचना चाहिये कि क्या भविष्य में शांति व सद्भाव बनाने के लिये कश्मीर में हिन्दुओं के हत्याकांडों के दोषियों पर वैधानिक कार्यवाही होनी चाहिये ? अगर उन दोषियों को उनके अपराधों की सजा मिलेगी तो वह भी मानवता की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक कार्य होगा। ऐसा होने से कश्मीर सहित पूरे देश में एक सार्थक संदेश जाएगा और भविष्य में ऐसे कट्टरपंथी मुसलमान (जिहादी) कहीं भी हिन्दुओं के उत्पीडन का दुःसाहस नहीं करेगा। प्रायः अपराधी को उसके अपराध की सजा मिलने से ही न्यायायिक व्यवस्था में सामान्य जन का विश्वास बना रहता है।

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद

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