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जमनालाल बजाज : गांधी का ‘पांचवां बेटा’ जिसने उनका ट्रस्टीशिप का सिद्धांत जीकर दिखाया अव्यक्त

आज के पूंजीपतियों को देखते हुए हमारे लिए कल्पना करना भी मुश्किल हो सकता है कि भारत में जमनालाल बजाज जैसे वैरागी पूंजीपति भी हुए हैं

पूंजीपतियों के साथ एक समस्या होती है कि वे स्वयं ही अपनी प्राथमिक छवि यानी व्यवसायी या व्यापारी की छवि से मुक्त नहीं हो पाते. और कई बार समाज ही उन्हें जीवनपर्यंत उसी नज़र से देखता रह जाता है. एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जमनालाल बजाज का स्वतंत्र चित्रण न हो पाने की वजह शायद यही रही होगी. आज के पूंजीपतियों की मानसिकता और जीवनचर्या को देखते हुए हमारे लिए कल्पना करना भी मुश्किल हो सकता है कि भारत में जमनालाल बजाज जैसे वैरागी पूंजीपति भी हुए हैं जिसने त्याग और ट्रस्टीशिप का ऐसा उदाहरण पेश किया कि गांधी और विनोबा जैसे लोग उनके साथ पारिवारिक सदस्य के रूप में घुल-मिल गए.

जमनालाल एक गरीब मारवाड़ी के घर पैदा हुए थे. नेहरू के जन्म के साल ही. और उनसे ठीक दस दिन पहले. आज के राजस्थान और तब के जयपुर रियासत के सीकर में. जमनालाल केवल चौथी कक्षा तक पढ़े थे. अंग्रेजी नहीं आती थी. वर्धा के एक प्रौढ़ निःसंतान दंपत्ति ने बहुत ही चालाकी से जमनालाल की मां से वचन ले लिया और फिर उस बहुत ही धनी परिवार ने जमनालाल को गोद ले लिया.

लेकिन जमनालाल को धन से वितृष्णा हो गई थी. एक बार पूरे परिवार को किसी बड़े विवाहोत्सव में जाना था. पिता और परिवार के अन्य सदस्य अपने धन का खूब बढ़-चढ़कर प्रदर्शन करना चाहते थे. जमनालाल से कहा गया कि वह भी हीरे-पन्नों से जड़ा एक हार पहनकर वहां जाएं. लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया. इस बात पर पिता से अनबन हो गई और वे घर छोड़कर भाग निकले. उस समय जमनालाल की उम्र केवल 17 साल थी.

बाद में उन्होंने एक स्टैम्प पेपर पर एक कानूनी मजमून बनाकर पिताजी को भेज दिया. अन्य बातों के अलावा जमनालाल ने इसमें लिखा था, ‘मुझे आपके पैसों से कोई लोभ-लालच नहीं. मैं धन की परवाह ही नहीं करता. मैं घर से कुछ भी लेकर नहीं जा रहा हूं. जो कपड़ा तन पर था केवल वही पहने जा रहा हूं. प्रार्थना करता हूं कि मेरे जाने पर दुखी मत होइयेगा और सदा प्रसन्नचित्त रहिएगा. दुनियादारी के संबंध एकदम खोखले होते हैं. सांसारिक सुख-सुविधाएं हमें अपने घातक शिकंजे में जकड़ लेती हैं. आपको धन्यवाद कि आज आपने मुझे उस भयानक जंजाल से मुक्त कर दिया. आप निश्चिंत रहें. मैं जीवन में कभी आपका एक पैसा भी लेने के लिए किसी अदालत में नहीं जाऊंगा. इसीलिए यह कानूनी दस्तावेज बनाकर भेज रहा हूं. आप अपने पैसों का उपयोग दान करने के लिए करें. और दान भी खुशी-खुशी सेवाकार्यों के लिए करें, दिखावे और यश के लिए नहीं.’

 

बाद में किसी तरह जमनालाल को ढूंढ़ निकाला गया और घर वापस आने के लिए मनाया गया. पिता (जिन्हें संभवतः वृद्ध होने की वजह से वे अपना दादा मानते थे) के मरने के बाद भी जमनालाल को यह बात याद रही कि जिस धन का उन्होंने एक बार परित्याग कर दिया है, उसका मालिक बनने का उन्हें कोई नैतिक अधिकार नहीं है. बाद में जमनालाल ने विरासत में मिली तमाम संपत्ति का मूल्यांकन कराया और उसमें उस दिन तक का चक्रवृद्धि ब्याज जोड़कर उतनी संपत्ति का दान कर दिया. ऐसा उन्होंने जीवन में कई बार किया. पूरा जीवन वह अपने आप को एक ट्रस्ट के ट्रस्टी की भांति ही मानते रहे.

बाल-विवाह के उस दौर में जमनालाल की शादी 13 साल की उम्र में ही नौ साल की जानकी से कर दी गई. युवा जमनालाल के भीतर आध्यात्मिक खोजयात्रा आरंभ हो चुकी थी और वह किसी सच्चे कर्मयोगी गुरु की तलाश में भटक रहे थे. इस क्रम में पहले वह मदन मोहन मालवीय से मिले. कुछ समय तक वे रबीन्द्रनाथ टैगोर के साथ भी रहे. अन्य कई साधुओं और धर्मगुरुओं से भी वह जाकर मिले. 1906 में जब बाल गंगाधर तिलक ने अपनी मराठी पत्रिका ‘केसरी’ का हिंदी संस्करण नागपुर से निकालने के लिए इश्तहार दिया, तो युवा जमनालाल ने एक रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मिलनेवाले जेबखर्च से जमा किए गए सौ रुपये तिलक को जाकर दिे दिए. जमनालाल ने लिखा है कि देशसेवा के लिए दान में दिए गए उस सौ रुपये से जो खुशी उन्हें तब मिली थी, वैसी बाद में लाखों दान करने पर भी नहीं मिली.

 

 

इस बीच जमनालाल महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में किए जा रहे सत्याग्रह की खबरों को पढ़ते और उनसे बहुत प्रभावित होते रहे. 1915 में भारत वापस लौटने के बाद जब गांधीजी ने साबरमती में अपना आश्रम बनाया तो जमनालाल कई बार कुछ दिन वहां रहकर गांधीजी की कार्यप्रणाली और उनके व्यक्तित्व को समझने की कोशिश करते रहे. गांधीजी में उन्हें संत रामदास के उस वचन की झलक मिली कि ‘उसी को अपना गुरु मानकर शीष नवाओ जिसकी कथनी और करनी एक हो.’ जमनालाल को अपना गुरु मिल चुका था. उन्होंने पूरी तरह से गांधीजी को अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया.

जमनालाल अब गांधीजी से अक्सर यह अनुरोध करने लगे कि गांधी अपना आश्रम वर्धा में आकर बनाएं जहां उन्हें जमनालाल की ओर से हर प्रकार का सहयोग मिलेगा. लेकिन गांधी अपनी गति से चलनेवाले व्यक्ति थे. बहुत कहने पर उन्होंने अपनी जगह 1921 में विनोबा को वर्धा भेज दिया और कहा कि वे जाकर वहां के ‘सत्याग्रह आश्रम’ की जिम्मेदारी संभालें. विनोबा पूरे बजाज परिवार के कुलगुरु की तरह वहां जा बसे. विनोबा और जमनालाल बजाज के बीच हुए पत्राचार को पढ़कर उन दोनों के बीच के आत्मीय संबंधों का पता चलता है.

1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के दौरान जमनालाल ने एक अजीब सा प्रस्ताव महात्मा गांधी के सामने रख दिया. जमनालाल ने गांधीजी से अनुरोध किया कि वे उनका ‘पांचवां बेटा’ बनना चाहते हैं और उन्हें अपने पिता के रूप में ‘गोद लेना’ चाहते हैं. पहले पहल तो इस अजीब प्रस्ताव को सुनकर गांधीजी को आश्चर्य हुआ, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इसपर अपनी स्वीकृति दे दी. 16 मार्च, 1922 को एक विचाराधीन कैदी के रूप में गांधीजी ने साबरमती जेल से जमनालाल को एक चिट्ठी में लिखा था, ‘तुम पांचवें पुत्र तो बने ही हो, किन्तु मैं योग्य पिता बनने का प्रयत्न कर रहा हूं. दत्तक लेनेवाले का दायित्व कोई साधारण नहीं है. ईश्वर मेरी सहायता करे और मैं इसी जन्म में इसके योग्य बन सकूं.’

बहुत बाद में एक बार किसी चिट्ठी में जल्दबाजी में गांधीजी ने उन्हें ‘चिरंजीवी जमनालाल’ की जगह ‘भाई जमनालाल’ कहकर संबोधित कर दिया. इसपर जमनालाल इतने दुखी हो गए कि इस बारे में उन्होंने एक लंबी चिट्ठी महात्मा गांधी को लिखी और गांधीजी को स्पष्टीकरण देना पड़ा. गांधीजी के प्रभाव में जमनालाल बहुत ही आत्मचिंतन और आत्मालोचना की ओर प्रवृत्त हुए. वह गांधीजी के सामने अपना हृदय खोलकर कर रख देते और अपनी तमाम समस्याओं का समाधान उन्हीं से मिलकर पाते.

जमनालाल ने सामाजिक सुधारों की शुरुआत सबसे पहले अपने घर से ही की. असहयोग आंदोलन के दौरान जब विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार शुरू हुआ तो उन्होंने सबसे पहले अपने घर के तमाम कीमती और रेशमी वस्त्रों को बैलगाड़ी पर लदवाकर शहर के बीचोंबीच उसकी होली जलवाई. उनकी पत्नी जानकीदेवी ने भी सोने और चांदी जड़े हुए अपने वस्त्रों को आग के हवाले कर दिया और आजीवन खादी पहनने का व्रत ले लिया.

त्याग की ये सूची लंबी है. जमनालाल ने अंग्रेज सरकार द्वारा अपनी ओर से दी गई ‘राय-बहादुर’ की पदवी त्याग दी. बंदूक और रिवॉल्वर जमा कराते हुए अपना लाइसेंस भी वापस कर दिया. अदालतों का बहिष्कार करते हुए अपने सारे मुकदमे वापस ले लिए. मध्यस्थता के जरिए विवादों को निपटाने के लिए अपने साथी व्यवसायियों को मनाया. जिन वकीलों ने आज़ादी की लड़ाई के लिए अपनी वकालत छोड़ दी उनके निर्वाह के लिए उन्होंने कांग्रेस को एक लाख रुपये का अलग से दान दिया. सनातनियों के घोर विरोध के बावजूद वर्धा स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर में दलितों का प्रवेश कराने में उन्होंने विनोबा के नेतृत्व में अद्भुत सफलता हासिल की. अपने घर के प्रांगण, खेतों और बगीचों में स्थित कुओं को उन्होंने दलितों के लिए खोल दिया.

असहयोग आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ तीखा भाषण देने और सत्याग्रहियों का नेतृत्व करने के लिए 18 जून, 1921 को जमनालाल को गिरफ़्तार कर लिया गया. उनके साथ-साथ विनोबा को भी गिरफ़्तार कर लिया गया. विनोबा को तो एक ही महीने की सजा हुई, लेकिन जमनालाल को डेढ़ साल के सश्रम कारावास की कठोर सजा और 3000 रुपये का जुर्माना भी हुआ. 1935 के अधिनियम के तहत जब कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का फैसला किया तो जमनालाल ने इसका खुला विरोध किया था. बाद में जब चुने गए विधायक और मंत्री ब्रिटेन की राजशाही के नाम पर शपथ-ग्रहण करने लगे, तो भी उन्होंने इसपर ऐतराज जताया. कांग्रेस के इस निर्णय से वे कभी संतुष्ट न हो सके. जमनालाल को कभी किसी पद की इच्छा नहीं रही. 1937-38 में हरिपुरा में कांग्रेस अध्यक्ष उन्हीं को बनाने पर सहमति हो चुकी थी. लेकिन उन्होंने गांधीजी से कहा कि यूरोप से लौटे सुभाष चंद्र बोस को यह सम्मान और अवसर दिया जाना चाहिए.

1938 में जमनालाल बजाज राजस्थान (तब जयपुर रियासत) के अकालग्रस्त इलाकों का दौरा कर कुछ राहत कार्य करना चाहते थे. लेकिन 29 दिसंबर, 1938 को सवाई माधोपुर स्टेशन पर एफएस यंग नाम के एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी ने उन्हें जयपुर के अंग्रेज दीवान का एक आदेश दिखाया. इसमें लिखा था कि जमनालाल जयपुर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते क्योंकि इससे अशांति उत्पन्न होने का खतरा है. जमनालाल ने जवाब दिय, ‘मैंने जयपुर रियासत में जन्म लिया है, वहीं का पला-बढ़ा हूं. वहीं का नागरिक हूं. मैं अपने ही राज्य के लिए खतरा कैसे हो सकता हूं. जयपुर का दीवान तो खुद ही विदेशी है. उसे मुझे रोकने का क्या अधिकार है? मुझे ऐसा कोई आदेश बर्दाश्त नहीं है और मैं इसे तोड़ने जा रहा हूं.’ अंग्रेज अधिकारी यह सुनकर हक्का-बक्का रह गया.

1924 में नागपुर में हुए एक हिन्दू-मुस्लिम दंगे में जमनालाल निर्भीक होकर बीच-बचाव में गए. इसमें उनको चोटें आ गईं. पांच सितंबर, 1924 को महात्मा गांधी ने सूरत की सभा में लोगों से कहा, ‘आप अपना डरपोकपन दूर कर लें. जमनालालजी के हाथ में चोट आई, इससे मुझे प्रसन्नता हुई. यदि झगड़े-फसाद को शांत करते हुए वे मर भी जाते, तो भी मुझे प्रसन्नता ही होती. क्योंकि उससे हिंदू धर्म की ज्यादा रक्षा होती. उनको अकस्मात् ही पत्थर लगा. लेकिन जो पत्थरों की बौछार में जाकर खड़ा होता है उसे केवल पत्थर ही नहीं लगेगा, बल्कि वह मर भी सकता है. यदि जमनालालजी मर जाते तो इससे लड़नेवाले दोनों पक्ष लज्जित होते और रोते.’ उल्लेखनीय है कि गांधीजी के आश्रम में रहनेवाली रेहाना तैयबजी के साथ जमनालाल जी का बहन-भाई का रिश्ता रहा.

11 फरवरी, 1942 को अकस्मात ही जमनालालजी का देहांत हो गया. उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी जानकीदेवी ने स्वयं को देशसेवा में समर्पित कर दिया. विनोबा के भूदान आंदोलन में भी वह उनके साथ रहीं. जमनालाल जी ने गांधीजी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को वास्तविक जीवन में जीकर दिखाया. उन्होंने प्रसिद्ध संत तुकाराम के इस पद को अपने जीवन का सूत्र माना था-

‘जोडोनियां धन उत्तम वेव्हारें। उदास विचारें वेच करी।।’

यानी धन शुद्ध साधनों से और ईमानदारी से अर्जित करो और खर्च करो दूसरों की भलाई के लिए उदारतापूर्वक और विवेकपूर्वक।

आज के दौर में कम से कम भारत में ऐसे पूंजीपतियों के उदाहरण तो ढूंढने पर भी बिरले ही मिलेंगे.

साभार- https://satyagrah.scroll.in से



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