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साहित्य के बिना पत्रकारिता संस्कारविहीन : प्रो. केजी सुरेश

पटना। पत्रकारिता में उन्माद, विद्वेष का कोई स्थान नहीं है। पत्रकारिता की भाषा संयम और संस्कार की भाषा होनी चाहिए, जिसमें पत्रकारिता को साहित्य से अपने टूटे रिश्ते को फिर से जोड़ना होगा। साहित्य के बिना पत्रकारिता संस्कारविहीन है। ‘पत्रकारिता और साहित्य’ विषय पर यह विचार माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने व्यक्त किये। व्याख्यान का आयोजन पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं पत्रकारिता विभाग के संयुक्त तत्वावधान आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. तरुण कुमार ने की। उल्लेखनीय है कि यह वर्ष दादा माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ का शताब्दी वर्ष है। एमसीयू इस वर्ष साहित्य और पत्रकारिता के विमर्श को देशभर में चला रहा है।

कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने आज की पत्रकारिता की भाषा पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि समाज का विश्वास बनाए रखना आज पत्रकारिता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि आज सबकुछ संशय के घेरे में है। सच दिखाने के नाम पर जैसी भाषा में जैसी चीजें दिखाई जा रही हैं, वह कई बार किसी सभ्य समाज से बाहर की चीज लगती है। आज जो मीडिया में प्रतिबिंबित हो रहा है, वह क्या भारतीय समाज का सत्य है। इस पर विचार किए जाने की जरूरत है।

पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए प्रो. सुरेश ने कहा कि आज नए सिरे से पाठकों-दर्शकों की सच्ची रुचियों को ध्यान में रखने की आवश्यकता है और उनके भाषिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों को जनोन्मुख बनाने की भी आवश्यकता है। पहले से ही दर्शकों-श्रोताओं की रुचियों को निर्धारित करना सही नहीं है। इस अवसर पर पटना कॉलेज की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. कुमारी विभा, शिक्षक डॉ. मार्तण्ड प्रगल्भ, डॉ. पीयूष राज, डॉ. गौतम कुमार, प्रशांत रंजन समेत हिन्दी एवं जनसंचार विभाग के स्नातक एवं स्नातकोत्तर के विद्यार्थी उपस्थित थे।

कुलसचिव

(डॉ. अविनाश वाजपेयी)

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