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ज्योति गजभिये की कहानी भूखे भेड़िये पर एक संवेदनशील विमर्श

विश्व मैत्री मंच पर सोमवार को ज्योति गजभिये की कहानी भूखे भेड़िये पर सार्थक प्रतिक्रियाओँ का दौर चला। यह कहानी स्त्री मन को परिभाषित करती एक स्त्री के जीवन की मार्मिक कथा है। जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है भूखे भेड़िए …… यानी निर्ममता की पराकाष्ठा यानी स्त्री पीड़ा , स्त्री शोषण । इस कहानी की खूबी ये रही कि इसने नारी मन की गहराईयों को पूरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया। लेकिन आश्चर्य है कि इस कहानी पर विश्व मैत्री मंच की लेखिकाओं की की प्रतिक्रियाओँ की ही अधिकता रही, पुरुष लेखकों की प्रतिक्रिया नदारद थी।

डॉ.ज्योति गजभिये का परिचय:
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जन्म-8-1-64

शिक्षण- एम.ए.(हिंदी साहित्य) रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर
एम.फिल-महादेवी वर्मा के गद्य साहित्य में नारी जीवन (पूना युनिवर्सिटी)
पीएच.डी-समकालीन लेखिका नासिरा शर्मा के कथा साहित्य का अनुशीलन (मुंबई युनिवर्सिटी)
प्रकाशित पुस्तकें-
अनुभूति (क्षणिका संग्रह)
शमा(काव्य संग्रह)
ख़लिश(गज़ल संग्रह)
समकालीन लेखिका नासिरा शर्मा का कथा साहित्य (शोध ग्रंथ)
सम्मान-प्रज्ञाभारती प्रयाग हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा २००६
राष्ट्रीय हिंदी सेवी महासंघ द्वारा हिंदी सेवी सम्मान २०१०
भारतीय जनभाषा प्रचार समिति एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद शिवानी मंच साहित्य सेवी सम्मान जून२०१६
अध्यक्ष-
साहित्य सरिता हिंदी मंच नासिक
अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठियों में प्रपत्र एवं काव्य वाचन
आकाशवाणी मुंबई से रचनाओं का प्रसारण

ज्योति गजभिये की कहानी:

भूखे भेड़िये
रात की ड्यूटी बहुत थका देती है, बदन का पोर –पोर दुख रहा है सोचते हुये रेशमा ने अपना बेल्ट ठीक किया और डंडे को हवा में लहराते हुये चल पड़ी बस स्टॉप की ओर, सामने की संकरी गली को पार कर वह मुख्य सड़क पर आ गई , पौ फटने को थी, सुबह की अलमस्त हवायें उसे बड़ी भली लग रही थी | रात बापू की चक-चक में खाने का डिब्बा भी घर भूल आई थी , दस रूपये का वडा पाव लेकर खाया था और फिर रात भर का जागरण, जरा सा भी खटका होता तो मुस्तैद हो जाना पड़ता | बापू ने लाख समझाया रेशमा यह नौकरी औरतों के बस की बात नहीं पर वह ही अड़ गई थी , अब उसे किसी की सुनने की आदत नहीं रही , घरों में बर्तन –कपड़ा करना उसे जरा भी पसंद नहीं और खाना बनाना उफ कैसे औरतें सारा दिन रसोई में पसीने से लथ –पथ रोटियाँ सेंक लेती हैं छी…..यह भी कोई काम हुआ | तभी प्रीतम ने बताया था सिक्यूरिटी गार्ड की औरतों के लिये जगह निकली है , तू इंटरव्यू दे आ , बस यह नौकरी उसे मिलनी थी और मिल गई , जब वर्दी पहन कर तैयार होती है उसमें मर्दानगी आ जाती है, इसमें लोग भरोसा तो करते हैं और सम्मान भी मिलता है मनचाही नौकरी तो उसने पा ली पर मनचाहा दूल्हा नहीं मिला…… यही सब सोचते हुये रेशमा बस स्टॉप पर आई तो देखा वह पागल भिखारिन ढीला-ढाला पुराना सा शर्ट-पेंट पहने आज भी सर खुजाते हुये वहाँ पर खड़ी है, रेशमा को देखकर पेट की ओर इशारा करने लगी, मानो कहना चाह रही है भूख लगी है ,रेशमा को उसकी इस अदा पर हँसी आ गई, उसने महसूस किया उसे भी भूख लगी है , उसने झट सामने की चाय की टपरी से दो गिलास चाय और बिस्कुट का पुड़ा लिया ,पगली ने लपक कर रेशमा के हाथ से चाय ले ली और बिस्कुट डुबो-डुबो कर खाने लगी |
रेशमा ने चाय पीते हुये उससे पूछा “क्या नाम है रे तेरा ?”
“सूजी” कुछ शरमाते हुये भिखारिन बोली |
रेशमा मन ही मन सोच रही थी भला यह भी कोई नाम हुआ सूजी ,अब शायद आटा और मैदा भी लोगों के नाम होने लगेंगे , सोचते ही उसे हँसी आ गई , इतने में बस आ गई, रेशमा बस पर सवार हो गई , खिड़की से उसने देखा सूजी हाथ हिला-हिला कर उसे विदा कर रही थी | रेशमा ने सोचा इतनी अच्छी शक्ल-सूरत है इसकी ,यूँ सड़कों पर घूम रही है न जाने किस गम की मारी है |

सूजी के बारे में सोचते उसे अपने भी सारे गम याद आ गये, अभी कुल जमा चौबीस की है पर यूँ लगता है पचास वर्ष की जिन्दगी देख ली हो उसने …..शराबी पिता माँ को आँसू के अलावा कुछ न दे सका, और माँ के हाथ लोगों के घरों में बर्तन-कपड़े कर कर त्वचा रोग के शिकार हो गये | जिस दिन पिता ने माँ का गला दबाना चाहा वह दोनों बेटियों को लेकर अलग हो गई | ठाणे में पहाड़ियों पर टीन की छत डालकर झोपड़ी बनाई थी तीनों माँ-बेटियाँ किसी तरह वहाँ गुजारा कर रहे थे , माँ का तेज-तर्रार स्वभाव था जो शोहदों को उनके पास फटकने भी न देता, अभी कुछ ही दिन गुजरे थे की पहाड़ ने किस जन्म का बैर निकाला उसकी थरथराहट आज भी महसूस करती है रेशमा, जब लैंड स्लाइड हुई थी पहाड़ गर्जना कर फटा और उसके ऊपर के सारे पत्थर तेजी से सरक कर गिरने लगे, उनकी झोपड़ी कहाँ टिकती इस प्रलय के सामने , माँ ने उसे सौदा लाने बाहर भेजा था आकर देखती है तो पत्थरों के बीच उसकी झोपड़ी का कोई पता ठिकाना नहीं और एक-एक पत्थर और टीन जब हटाये गये तब मिले माँ और बहन के निष्प्राण शरीर, रेशमा इस दुनिया में अकेली हो गई थी , रो-रो कर उसकी आँखें सूज गई थी तब माँ की सहेली सुगंधा उसे साथ ले गई ,वह भी माँ की तरह लोगों के घरों में काम करती थी , सुगंधा की छोटी सी खोली में उसका बेटा और पति भी रहता था, उसका बेटा खा जाने वाली नजरों से जब उसे देखता तो रेशमा भीतर तक काँप जाती थी , रमेश उस बाज की तरह था जो चिड़िया को दबोचने की फिराक में होता है , एक बार उसे अवसर मिल ही गया और माँ -पिता के काम पर जाने के बाद उसने धर दबोचा रेशमा को ,वह चीखी-चिल्लाई पर किसी को भी उसकी आवाज सुनने की फुर्सत नहीं थी | मात्र चौदह वर्ष की उम्र में उसने अपना कौमार्य खो दिया , जब रो-रो कर उसने यह घटना सुगंधा को सुनाई, तो उसने मुँह बंद रखने को कहा | सुगंधा को इसके लिये एक ही उपाय सूझा उसने नाबालिग रेशमा की शादी रमेश से करवा दी | मांग में सिंदूर भर वह एक ऐसे नाकारा आदमी की बीवी बन गई जो काम के नाम पर दिन भर जुआ खेलता था | दुनिया ने इतने सारे सबक दे दिये थे कि वह चौथी कक्षा से ज्यादा पढ़ नहीं पाई थी पर अब वह कुछ ज्यादा ही आक्रमक हो गई थी ,सीधी-सादी लड़कियों को ही ज्यादा दुख उठाने पड़ते हैं, वह जान गई थी | रमेश की गिरफ्त से वह निकलना चाहती थी ,जो शादी इस तरह जबरदस्ती की गई हो वह उसे शादी नहीं मानती थी | एक बार न जाने कहाँ से पिता को उसकी याद आ गई वे उसे खोजते हुये आये, रेशमा सब कुछ छोड़कर सुगंधा को बिन बताये उनके साथ चूनाभट्टी आ गई ,पिता ने जो दूसरी औरत रखी थी वह उन्हें छोड़ कर चली गई थी घर का काम रेशमा ने सम्हाल लिया साथ ही पास की एक फैक्ट्री में पैकेजिंग का काम करने लगी प्रीतम वहीँ पर ड्राइवर था, वह रेशमा पर जान छिडकता था उसी की पहचान से सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी मिली थी | और आज वह सारे गमों को दरकिनार किये वह अपनी शर्तों पर जीवन जी रही थी |

जब घर पहुँची तो देखा बापू रात ज्यादा दारू पीने की वजह से अभी भी निढाल पड़ा है | वह हाथ-मुहँ धो कुछ खाकर सो जाना चाहती थी , देखती क्या है प्रीतम दरवाजे पर खड़ा है बोला “रेशमा भूख लगी है कुछ खिला दे ?”
“अरे अभी काम पर से आई हूँ ,कुछ पकाया भी नहीं और तू आ गया |”
“इसीलिये कहता हूँ शादी कर ले मुझसे यह काम-वाम सब छुडवा दूँगा, अरे रानी बना कर रखूँगा तुझे|”
“तेरे जैसे कई देखे हैं ,जो कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं |”
रेशमा ने उपरी तौर पर कह तो दिया पर वह जानती थी प्रीतम के प्रेम को ,क्या होता है यह प्रेम या फिर होता ही नहीं ,इसी फेरे में पड़ी थी वह ,अब तक मर्द के रूप में कई भूखे भेड़ियों को देख चुकी थी , सहज ही किसी पर विश्वास नहीं होता | प्रीतम की कुछ परिक्षायें बाकी थी | रेशमा ने तुरंत भाजी-रोटी बना कर उसे परोसी | कई बार दुनिया इतनी बड़ी और भयावह लगती तब किसी का साथ होना बहुत ही जरुरी लगता है फिर प्रीतम क्या बुरा है , पर अब तक उसने उसके समक्ष कुछ भी स्वीकारा नहीं था|

जिन्दगी अच्छी हो या बुरी जीनी तो पड़ती ही है ,फिर रोते –बिसूरते रहने की बजाये आने वाली दुर्घटनाओं का दो दो हाथ कर सामना करना बेहतर है …..ड्यूटी से आते –जाते वक्त कई बार सूजी दिखी ,कुछ बातें भी की उससे, पर वह खुद के बारे में कुछ नहीं बताती थी पर मदर मेरी चर्च में अकसर कुछ बुदबुदाते हुये खड़ी रहती थी …शायद कोई प्रार्थना करती हो | रेशमा की उत्सुकता उसके विषय में बढ़ती जा रही आखिर एक दिन बड़ा सा लम्बा फ्राक पहने हुये एक क्रिश्चियन अधेड़ महिला से सूजी के बारे में पूछ ही लिया , उसने बताया की वह मतिमंद ही पैदा हुई थी , पिता ने माँ को छोड़ दिया था ..माँ उसका और उसके भाई का पालन पोषण कर रही थी ,सूजी और उसकी माँ अकसर साथ ही चर्च आते थे , एक दिन सूजी की माँ को बस ने कुचल कर मार दिया , भाई ने अपनी शादी होने के बाद सूजी को घर से बाहर निकाल दिया अब वह सड़कों पर भीख माँगती फिरती है और चर्च आकर माँ की याद कर लेती है |

रेशमा को सूजी की कहानी अपनी सी लगी , गम के शिकंजे में कसी एक विक्षिप्त युवती भूखे भेड़ियों की इस दुनिया में कैसे रहती है , अभी यह बात मन में आई ही थी कि …..उस रात यह घटना रेशमा ने अपनी आँखों से देख ली , रात के लगभग दस बजे थे वह डंडा घुमाते, गुनगुनाते हुये ड्यूटी पर जा रही थी तो अचानक किसी की बहुत दबी हुई चीख सुनाई दी , रेशमा मुस्तैद हो गई चारों ओर देखा उसे महसूस हुआ आवाज सामने वाली अधबनी बिल्डिंग से आ रही है वह उस ओर दौड़ी देखती क्या है चार-पांच लड़के किसी के साथ जबरदस्ती कर रहे हैं ….वह अँधेरे में ठीक से देख नहीं पा रही थी, उसने अपने मोबाइल की रोशनी में देखा ,कोई लड़की जमीन पर पड़ी थी और चार लड़के उसे चारों बाजू से पकड़े हुये थे , और एक लड़का अपने पेंट की बटने खोल रहा था रेशमा ने देखा तो उसकी नस-नस में सनसनाहट होने लगी , कान की लवें गर्म हो गई , रक्त उबल-उबल कर उसके मस्तिष्क की ओर जाने लगा , वह शेरनी सी दहाड़ी और पेंट उतारने वाले लड़के के समक्ष खड़ी हो गई , डंडे से सीधा सर पर प्रहार किया वह लड़का संतुलन खो कर गिर गया उसका सर फूट गया था बाकी के लड़कों की तरफ डंडा घुमाया ही था कि वे भाग खड़े हुये , रेशमा ने हाथ का डंडा फेंका और जोर से चिल्लाई-“स्साले भूखे भेड़ियों कहाँ भागते हो , एक-एक को देख लूँगी |”

उसने मुड़ कर लड़की की ओर देखा वह सूजी थी , डर से काँपते हुये खड़ी थी उसके मुँह पर उन कमीनों ने कपड़ा बांध दिया था, उसकी चीख जो रेशमा ने सुनी थी शायद मुँह पर कपड़ा बाँधते वक्त वह चिल्लाई थी | थर-थर काँपती हुई सूजी को उसने अपनी बाँहों में भर लिया और उसी क्षण मन ही मन एक निर्णय ले लिया कि अब सूजी को वह दर-दर भटकने नहीं देगी , अपने घर ले जायेगी | सूजी का हाथ पकड़े वह पास की पुलिस चौकी में गई , रिपोर्ट दर्ज करवाई, पुलिस ने घायल लड़के को हिरासत में लिया आधी रात ऐसे ही निकल गई ,ड्यूटी पर देर से पहुँची……साथ में सूजी थी |

दूसरे दिन वह सूजी को लेकर घर पहुँची पर अब भी वह सूजी को लेकर दुविधा में थी ,क्या वह उसे अपने घर में सुरक्षित रख पायेगी | सबसे ज्यादा डर तो उसे अपने बापू का था शराब के नशे में उसने एक बार उस पर ,खुद की बेटी पर भी हाथ डालने की कोशिश की थी तब उसने बापू को ऐसा सबक सिखाया था की वह आज भी रेशमा से आँखें नहीं मिला पाता | घर आकर उसने बापू से कह दिया वह घर बदल रही है , प्रीतम के घर के पास ही एक खोली थी वह उसमें सूजी के साथ रहने चली गई | आजकल के लड़कों का क्या बूढों का भी कोई भरोसा नहीं , ऐसे में प्रीतम जैसा कोई मिल जाये तो बड़े सौभाग्य की बात होती है ,वह प्रीतम के बारे में सोचते ही गर्व से भर जाती है , कितना विश्वास करने लगी थी प्रीतम पर वह | सूजी को जब हॉस्पिटल ले गई पता चला वह तीन माह की गर्भवती है , डॉक्टर ने कहा सफाई में सूजी की जान को खतरा है सो बच्चा रखना ही पड़ेगा | एक और जिम्मेदारी रेशमा पर आन पड़ी थी , नाजुक नर्म शिशु कैसा होगा ? क्या वह उसका पालन-पोषण कर पायेगी ……तमाम उलझनों से घिरी रेशमा असमय ही अपनी उम्र से बड़ी होती जा रही थी और सूजी ने अपनी माँ के बाद किसी से प्रेम किया होगा तो वह रेशमा से |

रेशमा ने सूजी को सख्त हिदायत दी थी कि वह दरवाजा बंद रखे जब वह आयेगी उसे आवाज देगी दरवाजा तभी खुलेगा , सूजी मतिमंद थी पर बहुत सी बातें अच्छी तरह समझ जाती थी , घर का थोड़ा-बहुत काम भी कर लेती थी …..निश्चित ही रेशमा के कारण सूजी को सहारा मिला था और रेशमा की अकेली दुनिया में किसी पाक दिल ने प्रवेश किया था , स्वार्थ के इस युग में पाक दिल बचे ही कितने हैं , सारे दिमाग वाले तो बिना मतलब काम ही नहीं करते ….काश की दुनिया में कुछ मतिमंद और बढ़ जायें तभी स्वार्थ कुछ कम होगा …..

आज ड्यूटी पर पेट में बड़ा दर्द उठा , शायद सुबह जो चायनीज मंगा कर खाया था उसमें मिलावट रही होगी , उसने प्रभा को फोन कर उसकी जगह काम करने को बुलाया और खुद चल पड़ी घर की ओर, ऐसे तो वह कभी छुट्टी नहीं लेती पर एक दिन की छुट्टी तो बनती है ….यदि कल पेटदर्द ठीक लगा तो सूजी को लेकर जुहू बीच घूमने चली जायेगी | मेडिकल स्टोर से उसने पेटदर्द की दवाई ली और घर की ओर कदम बढ़ाने लगी देखती क्या है की दरवाजा अधखुला है और अंदर से छीना-झपटी की आवाजें आ रही हैं , वह भीतर गई तो अवाक् रह गई प्रीतम सूजी से जबरदस्ती करने में लगा हुआ है उसकी आँखों को मानो विश्वास ही नहीं हुआ वह पलकें झपका कर एक बार और विश्वास कर लेना चाहती थी की वह प्रीतम ही है …..वह प्रीतम ही था , क्रोध और ग्लानि से रेशमा की आँखे लाल हो गई उसने प्रीतम की कनपटी पर जोरदार थप्पड़ मारा , प्रीतम हाथ जोड़ कर कह रहा था “माफ कर दे रेशमा”
पर रेशमा ने मानो कुछ सुना ही नहीं उस पर खून सवार था पास की लाठी उठा उस पर दनादन वार करने शुरू कर दिये उस दिन प्रीतम भागता नहीं तो रेशमा उसकी जान ही ले लेती | उसके जाने के बाद रेशमा की आँखों का क्रोध दर्द का लावा बन गया , दोनों आँखें बहने लगी वह फूट-फूट कर रो पड़ी , सूजी उसके कंधे पर हाथ रख खड़ी थी , रेशमा की आँखें पानी नहीं खून बहा रहीं थी रोते रोते वह चीखी “साला तू भी भूखा भेड़िया निकला |”

प्रीतम पास होने से पहले ही फेल हो चुका था |
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काव्यकोश में संतोष श्रीवास्तव चित्र सज्जा कस्तूरी मणिकांत

आज की संचालक कवियत्री समीक्षक मधु सक्सेना

आओ मधु स्वागत है

मधु सक्सेनाः धन्यवाद सन्तोष ….
मधु सक्सेनाः रायपुर की हल्की सुहानी सर्दी और सूरज के शरमाते रूप के साथ आपके साथ हूँ मित्रों हल्की धुंध में भी आप सब के मुस्कराते चेहरों को देखते हुए चाय के गर्म प्याले में से चाय सुड़कते हुए आप सब को सुबह की नमस्कार …

मधु: ज्योति को कविता और नाटकों के माध्यम से जाना ।आज उनके कहानीकार के रूप का स्वागत ..

मधुः आज के चित्रांकन और शब्दांकन के तालमेल में बधाई सन्तोष और कस्तूरी को । पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के मेल से ही दुनिया खूबसूरत होगी ….
सृजन का सम्मान होगा …

सुरभि पांडेः नमस्कार मंच पर ज्योति जी की कहानी है, अच्छा लग रहा है, धन्यवाद सन्तोष जी। कहानी पर पढ़कर लिखूँगी अभी तसल्ली से।कस्तूरी को धन्यवाद उन्होंने सन्तोष जी के शब्दों को रूप दिया।मेरी ओर से बधाई स्वीकारें मोहतरमाकहानी पढ़कर बताती हूँ, मधु आज पूरे दिन मधु से बात करने का मौक़ा मिलेगा, चन्द शब्द, किसी के जो याद रह गए , उनको भेंट कर रही हूँ।साथ तुम्हारा कितना हसीं है, महका आसमां, महकी ज़मीं है

रमा रश्मि आगराः सभी बहनों को सुप्रभात ज्योति जी की कहानी ‘भूखे भेड़िये’ सशक्त कथ्य आैर शिल्प के साथ पाठक को बांधे रखती है… नारी जीवन की कटु परिस्थितियों के साथ कुछ पुरुषों की हीन मानसिकता को रेखांकित करती है….ये कहानी एक ऐसे वर्ग विशेष को लेकर लिखी गई है जो कि अशिक्षित है या फिर कम पढ़ा लिखा….अत: अपने परिवेश में कहानी पूर्ण रूप से सफल और उद्देश्यपूर्ण है….. ज्योति जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ……

ईरा पंत: ज्योति जी भूखे भेड़िये जो सिर्फ नारी देह को अपमानित कर गर्व महसूस करते है, पढ़ी तो अंत तक पढ़ती ही गयी।गरीब, लाचार महिला को अपने कौमार्य की रक्षा करना कितना मुश्किल होता है, आसानी से उपलब्ध होने वाली उपभोग की वस्तु लगती है। नायिका को आपने कभी मजबूत और कभी भावुक, कोमल नारीमन की स्वामिनी बनाकर घटनाओं को इस तरह गूंथा है कि मन को भीतर तक हिला देती है वो।
कभी शिवानी पन्त की भी पगली पढ़ी थी जो आज तक याद है। फिर ताज़ा हो गयी वो याद।कहन, भाव, लेखन, सब ज़हीन।

मधु: रमा जी …आपने सही आकलन किया ..हीन मानसिकता दूसरों को जीवन भर का दर्द दे जाता है। रेशमा अब किसी पर विश्वाश नही कर पाएगी ।इसकी मानसिकता की जड़ आखिर है कहाँ ? ये प्रश्न भी ..आभार रमाजी ।पहली टीप का स्वागत ।

मधुः इरा …नारी कहीं सुरक्षित नही ..कभी मन पर हमला कभी तन पर …और घाव जन्म भर का …कैसे करें सुधार .?धन्यवाद सखी ।

मीता अग्रवाल रायपुरः मंच मधुदी ज्योति जी, भूखे भेड़िये शीर्षक उद्देश्य को पूर्ण करती है।कथानक वास्तविकता यर्थाथ और पुरुष मानसिकता को उधेडता है, कमजोर निम्न तबके की स्त्रीशोषण की शिकार कितनी आसनी से हो जाती है वही सशक्त रेशमा के लिए वह प्रारंभ मे आकर्षण का पात्र बनता है, पर उसका वहशी रुपुरुष मानसिकता कीपोल खोल विश्वास पर कुठारा घात कर रेशमाके अॉखो से खून टपका कर कहलवाता है साला तू भी भूखा भेडिया निकला।बेहतरीन कथ्य, शिल्पसे सनी कटु सत्य उजागर करती है। ज्योति जी सार्थक कहानी हेतु कोटिश: बधाई।
रूपेंद्र तिवारीः ज्योति जी की कहानी”भूखे भेड़िए”शीर्षक से स्पष्ट होता कथानक जितन रोमहर्षक लगा उतना ही सत्यता के समीप भी।घटना दर घटना नायिका के विश्वास का डगमगाना वैसा ही जैसा वास्तविक जीवन में होता है।भाषा बहुत प्रभावी तथा दृश्य गढ़ने की क्षमता रखती है।एक निम्नवर्ग की नव युवती जीवन की कठिनाइयों को सहज लेकर अपने मूल्यों पर जीवन जी ते हुए सकारात्मक संदेश देती है।स्वयं यदि स्त्री तटस्थ है तो उसे अनर्थ से कोई नहीं डिगा सकता।विवशता अवश्य दुर्बल बनाती है किन्तु दृढ़ निश्चय सात्विकता तथा अन्याय से जूझना सीखाती है।”भूखे भेड़िए” शीर्षक जंगल राज को दर्शाता है पृतसत्ता का एकाकाधिकार किन्तु स्त्री समाज की द्वितीय मूख्य धारा है अपनी शर्तों पर जीवन यापन का हौसला व अधिकार दोनो रखती है।
ज्योति जी बहुत सुंदर सार्थक कहानी के लिए हार्दिक बधाई आपको मधु दीदी सुलझा हुआ प्रभावी संचालन।

लता तेजेश्वरः ज्योति की कहानी भुखे भेडिए, नज़दिकी से हर पहलूँओं को बय़ां करने में कामयाब रही। अक्सर मिल जाते हैं समाज में हमारे आसपास, रंग रूप या नियत तो तब पता चलती है जब मौके हाथ में हो वर्ना सभी काले सफेद ही नज़र आते हैं। या यूं कहो गाय के खाल में भेड। कहानी इस जटिलता को दर्शाने में कामयाब रही। बधाई।

मधुः पूर्णिमा जी … इस कहानी में सच्चाई नज़र आई आपको ….और तारीफ़ के लिए शुक्रिया .
मधुः रूपेंद्र …. स्त्री जीवन की कठिनाइयों को लेकर बुनी कहानी ..समाज का आइना है …इस कहानी के साथ इसमें उपजे प्रश्नों पर भी विचार चलते रहें तो कोई निष्कर्ष भी मिले ।आपकी सार्थक टीप से मंच सुशोभित हुआ ।आभार सखी ।
मधुः जया ….सदियो से होता आया और कितनी सदियाँ लगेगी हवस से मुक्त होने में ?…कोई जवाब नही। आप पत्रकार और सम्पादक है क्या कहेंगी इस बारे में ?

आशा रावत देहरादूनः इतने सुंदर पोस्टर के लिए संतोष जी और कस्तूरी को बधाई। ज्योति की कहानी निःसंदेह भाव और शिल्प दोनों की कसौटी पर खरी उतरती है।पठनीयता ऐसी कि पूरी पढ़े बिना सांस भी न लेने दे।पुरुष की आदिम प्रवृत्ति और बेबस स्त्री के शोषण का सशक्त और स्वाभाविक चित्रण है।यद्यपि सभी पुरुष चरित्रहीन और शोषक नहीं होते, किंतु एक स्त्री पहचान करे तो कैसे?

मधुः आशा जी ….पहचान कैसे हो अच्छेबुरे चरित्र की ? सवाल ये उठता है इस कहानी से …जवाब भी खोजने हैं। हमे चलना है सवालों के साथ ।आपने बढ़िया लिखा। धन्यवाद।

जया भोपालः मधु जी शुरुआत सबको अपने घर से करना होगी। दरअसल मानसिकता की स्वच्छता और संवेदना घरेलू शिक्षा से आती है। समाज में इसका अभाव बढ़ रहा है। दूसरी ओर प्रतिबद्धता की कमी भी इसका कारण है।

मधुः रूपेंद्र … हाँ कहानी में सुझाव भी है ।पर क्याइसके सिवाय में कुछ हल है ?आपने गहराई से कहानी को समझा ।धन्यवाद ।

मधुः जया …. घर से शुरुआत हो और अगली पीढ़ी समझदार बन जाए ये उद्देश्य लेकर भी चलना होगा…आभार सखी ।

पूर्णिमा ढिल्लनः न जाने क्यों माँ बेटे को संस्कारित करने मे मात खा जाती है ।और उसकी सजा समाज केसाथ साथ माँ को भी भुगतनी पड़ती है ।

वर्षा रावलः ज्योति जी की कहानी पढ़ी ,भूखे भेड़िये । मन सचमुच कसैला हो गया , हर दूसरे व्यक्ति की ऐसी निगाहों से दो चार होती महिलाएं , इसीलिए विश्वास नही कर पाती किसी पर ,और अनजाने ही टेस्ट लेने लगती हैं तब तक जब तक मनचाहा जवाब न मिल जाए ये केवल निम्न वर्ग की बात नही हर वर्ग में विश्वास ढूंढने की प्रक्रिया चलती है। यहाँ रेशमा दबंग स्त्री है , भले ही मन से कोमल पर दिखने में स्ट्रांग , जो ज़रूरी है आज के परिप्रेक्ष्य में भी। बस यही कहा जा सकता है कि स्त्री को रेशमा की तरह मजबूत होना चाहिए । अंत भी स्वाभाविक था कहानी का कि प्रेमी को पीट लेने के बाद स्त्री रेशमा टूटन को महसूसती है , लिए गए टेस्ट में उसे असफल होते देखती है और जब सपना टूटता है तो खुद पर कोई बस नही होता …..ज्योति जी को शुभकामनाएं…

मधुः पूर्णिमा जी .. चाहते हुए भी सब हाथों से फिसल जाता है …कोई भी स्त्री नही चाहती की उसका पुत्र अवगुणी हो ..पर नहीं न कहीं हार हो जाती है ..फिर भी प्रयास जरूरी है …अब पुत्रियों को आत्मविश्वास से भरपूर बनाना ज़रूरी है । आभार सखी ।

मधुः वर्षा … विशवास ढूढने की प्रक्रिया आविश्वास के धरातल पर खड़ा होता है ..’दूध का जला ….
बात समझने की है वरना रेशमा तो बनना ही होगा ..आपने कहानी को जीवन से जोड़ा ।धन्यवाद बहना ।
शारदा गायकवाड़ः ज्योतिजी की कहानी पढ़ते लगा जैसे आँखों के सामने हर घटना घट रही हो । मैने उनकी कविताँ और नाटक पढ़े हैं, मगर कहानी मन लगाके आज ही पढ़ी । बेहद ह्रदयस्पर्शी है । औरतों के लिए ऐसे भेड़ियों का सामना नयी बात नही लेकीन इस कहानी मे औरत के बेबसी के इतने पड़ाव आये है कि सोचना मुश्किल है। और जिसपे भरोसा किया वहभी भेड़िया होना यह तो दर्दकी इंतिहा है। पिता ने बेटी की तरफ बुरी नजर से देखना यह भी औरत की दर्द की दास्तान है। बहुत खूबी से ऐसी घटनाओंको गूंथा है । सचमुच ज्योति जी तारीफके काबिल है। शारदा…

जयश्री शर्माः ज्योति गजभिये की कहानी अति संवेदन शील है।जिसमे नारी जीवन की विडम्बना ओर पुरुष कावहशी पन उजागर होता है।पिता पुत्र पति किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता समाज की यह ज्वलन्त समस्या है जिस पर काबू पाना आवश्यक है पर काबू पानालगभग तब तक असम्भक है
जब तक वः स्त्री को अपने से कमजोर समझना छोड़ दे और व्यवहारिक रूप से दोनों को सैम नासमझ जाये
कहानी में इतनी सूंदर तारतम्यता है की पूरी कब पढ़ ली गई पता ही नहीं चलता
सुंदर सरल शब्द सहज ही हृदय स्पर्श क्र लेते हैं।
मधुः सरोज ….आपकी सटीक टीप से मंच समृद्ध हुआ …।कशमकश से ज़िन्दगी में स्थिरता का अभाव हो रहा है । अविश्वाश जीने नही देता … पर कुछ सार्थक करना तो है ही ..सही राह चाहिए …
आपकी सोच को बधाई ।

मधुः शारदा जी …. ज्योति की कहानी दर्द के साथ दवा भी दे रही ।लेखन की सार्थकता सिद्ध हो रही …आभार सखी ।

मधुः जया शर्मा जी ….स्त्री भरोसे के साथ जीना चाहती है पर जहाँ भरोसा करती वहीँ दगा ….रेशमा टूट टूट कर जुड़ती है और मज़बूत होकर उभरती है ।ये मज़बूत होना ही इस कहानी का उद्देश्य है ।
आपकी टीप बहुत सही ।धन्यवाद सखी।

पूर्ति खरेः ज्योति जी सादर प्रणामआपकी कलम ने क्या लिख डाला, वाह बेहद सवेंदनशील कहानी, रेशमा का किरदार तो गजब का , काश हम सभी रेशमा की तरह सोचें , सच है हर तरफ भूखें भेड़िये हैं, एक दम दमदार कहानी, मैं बेबाक हो पढ़ती गई।

रत्ना पांडेः कस्तूरी जी का पोस्टर और सन्तोष जी के दोहे की अद्भुत सार्थक जुगलबँदी शीर्षक शानदार कहानी भी उम्दा ज्योति जी को साधुवाद रेशमा का बहुत सुंदर चित्रण मंद बुद्धि सूजी स्वाभाविक चरित्र
समाज में ऐसी घटनाए होती हैं कुछ भी अतिरंजित नहीं लगा बचपन का कटु अनुभव समय पूर्व समझदार बना गया जल्दी विश्वास न कर पाना भी सहज लगा मन में प्रीतम के साथ घर बसाने का ख्याल आया हीथा पर वह भी भेड़िया निकला सुंदर गति से कहानी पाठक को बाँधती चलती है लेखिका को बहुत बधाई

प्रभा शर्माः संवेदनशील कहानी ‘ ””भेडिया”” ‘ आज औरतों को चारों ओर कहीं न कहीं किसी भी रुप में इस तरह की घटनाओं से दो चार होना पड़ता है।आज समाज की यह एक ज्वलंत समस्यों में से एक है ।जिस पर काबू पाना मुश्किल तो है पर नामुमकिन नहीं है।नारी को अपनी अबला की छवि से बाहर निकल खुद को मजबूत करना होगा।अपने को कमजोर नहीं बल्कि कठोर जैसे कहानी की नायिका रेशमा ::: कोमल मन जरुर परंतु हरतरफ से चौकन्ना रहने की जरुरत है।चाहे निम्न हो या मध्यम /उच्च वर्ग विश्वासघात उसी के साथ होता है।भेडियों से बचने के लिये आज बेहद जरूरी है। आज लड़कियों /औरतों को हर तीसरी चौथी इस तरहकी निगाहों से दोचार होना पड़ता है ।तो विश्वाश टूट जाता है। स्त्री किसी पर विश्वास करे भी तो कैसे::?पुरुष केरूप मेंआदिमानव::::: सभीपुरुष ऐसे नहीं होते। विश्वासकी डोर टूटने केबाद:::::::::::::: ज्योति जी कहानी बहुत ही सशक्त हृदयस्पर्शी है। हार्दिक शुभकामनाएँ सखी।
सरोज लोद्या, मुंबईः भेड़िया …कहानी समाज की ज्वलन्त समस्या का सटीक चित्रण है। अबला नारी को सुरक्षा देने के बदले में पुरुष भेड़ी अवसरवादी बन के अपनी इच्छा को पूरी करने में कामियाब हो जाता है।अबला से सबल नारी बन जीवन को चुनोती मानकर एक औरत अपनी जिम्मेदारी ही नहीं स्त्री कुल की नाज बन जाती रेश्मा ।कहानी सटीक और मार्मिक से बुनी हुई है। बधाई ज्योति
गीता भट्टाचार्यः भूखा भेड़िया ज्योति जी की कहानीअत्यंत ममॆस्पॆशी है जिसने मन के भीतर दबे पुरूष के प्रतिआशंका-कुशंका को कुरेदकर बाहर निकाला है।कथा के माध्यम से ठीक ही कहा है ज्योति जी ने। आखिर किस पर विश्वास करे नारी पिता, पुत्र ,मित्र प्रेमी सभी तो एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं।अतः नारी को हर पग पर फूंक-फूंक कर कदम रखना आवश्यक है। युगों -युगों सेनारी अपने भोलेपन के कारण छली जारही है ठगी जारही है ।यहाँ पर कहानी यह संदेश दे रही है कि अब टूटना नहीं है वरन् मजबूत होकर ईंट का जवाब पत्थर से देनाहै।बहुत खूब। कलमकार को अनेकानेक बधाई ।

सुरभि पांडेः भूखा भेड़िया पढ़ ली, धन्यवाद ज्योति जी।अच्छी कहानी, बड़ी रफ्तार वाली।जिनके बारे में लिखा है सब जानकर ही लिखा गया है।कुछ भी बनावटी नही लगता।
काश सारी सूजियों को रेशमा मिल जाएं। मुझे अजनबी मेहरबां रेशमा की तलाश है।

वृंदा पंचभाईः ज्योतिजी की कहानी बड़ी ही मार्मिक हृदयस्पर्शी रोंगटे खड़ी करने वाली,कहानी अंत तक बहुत अच्छी बन पड़ी है,पुरुष की मानसिकता को दर्शाती , बहुत ही सुंदर शब्द रचना ,सीधे सरल भाषा में उद्देश्य को पूर्ण करतीहै। वाकई मनुष्य के मन की यह विकृति कमजोर और अकेली सूजी जैसी लड़कियों के जीवन में ग्रहण लगा देती है जो कोमल मन को विक्षिप्त बनाने के लिए कारक बन जाती है ।समाज में ऐसे दुश्चरित्र दिख ही जाते है ।ज्योति जी को बहुत बहुत बधाई।

नीलम दुग्गलः अच्छे कथानक के लिए बधाई ज्योति। नायिका टूटी नहीं और उसका संघर्ष प्रेरणा देता है। अंत में वह प्रेमी को फटकारने और दुत्कारने का साहस रखती है यह बात बहुत वजनदार है। अगर औरत स्वयं को समर्थ समझे तो अनेक समस्याओं का समाधान हो जाए। साधुवाद।

अर्पणा शर्मा, भोपालः ज्योति की कहानी स्त्री शोषण के विभिन्न स्तर दर्शाती है। सिक्यूरिटी गार्ड की भूमिका में रेशमा द्वारा स्वयं को मर्दानगी से पूर्ण महसूस करना, उसके मन में विश्वासघात और शोषण के भय को ही दिखाता है। जाहिर है विभिन्न स्तरों पर छली गई स्त्री यथासंभव सतर्क और रक्षात्मक व्यवहार वाली होजाती है। रेशमा का उद्दात और कोमल पक्ष सूजी को लेकर सामने आता है भले ही वह बाहर से मर्दाना , कड़ा व्यवहार दर्शाती हो, ऐसा व्यवहार तो आजकल लड़कियों /स्त्रियों में आम है….शायद स्व-रक्षा का यही उपाय है कि हम बाहर से मजबूत, उग्र, आक्रामक दिखें…. अंत में भी रेशमा अपने प्रेमी के भी दोगले चरित्र से आहत तो होती है परंतु उसके प्रेम को नक्कार देने की हिम्मत भी दिखाती है। कुल मिलाकर एक अच्छी कहानी ।
पर वास्तव में सभी पुरुष ऐसे नहीं होते। फिर भी मासूम, अनुभवहीन, निश्छल लड़कियों /स्त्रियों को सावधान रहने की शिक्षा देती है। भई ये कहानी है और वास्तविकता और काल्पनिकता का सुंदर समावेश बाँधे रखता है। ये भी लगा कि इतने संघर्ष के बाद काश रेशमा का प्रेमी ही सच्चा और वफादार निकलता तो एक सुखद कहानी बनती….

आदरणीया ज्योति जी- बधाई । आपकी लेखनी सतत् सृजनरत रहे। स्नेहिल शुभकामनाएँ

विनीता राहुरीकरः समाज की एक विकृत सच्चाई दिखाती कहानी। यह दुर्भाग्य ही है कि हम अब तक बेटियों को एक सुरक्षित समाज भी नही दे पाये हैं। ज्योति जी की कहानी समाज के उस कलुषित चेहरे को सामने लाती है। और एक सकारात्मक सीख भी देती है कि यदि स्त्री को सुरक्षित रहना है तो सूजी नहीं रेशमा बनकर रहना होगा। क्या ही अच्छा हो कि सब स्त्रियां रेशमा जैसी हिम्मती हो जाएँ और दुराचारियों पर डंडे बरसाने का साहस कर सकें। तभी वो सुरक्षित रह सकेगी। बहुत अच्छी कहानी के लिए ज्योति जी को हार्दिक बधाई।

राजम नटराजनः माफ करना ज्योति, तबीयत से बधाई दूंगी सोचते-सोचते दिन निकल गया। गजानन माधव मुक्तिबोध कहा करते थे ‘अभाव विषयों का नहीं,सवाल उन्हें चुनने का है। ज्योति में एंपेथी है विषय के साथ तादात्म्य करने की शक्ति है,समाज-सेवक का सिर्फ कर्तव्य-बोध नहीं है।अच्छा चुनाव अच्छी कहानी

आशा सिंहः ज्योति जी आपकी कहानी मार्मिकता से आज की सच्चाई व्यक्त करती है। आज के समय में एक सच्चे साथी का मिल पाना बहुत कठिन है। और इससे भी बड़ा सत्य यह है कि जहाँ मजबूरी है वहाँ उसका फायदा उठाने वाले भी हैं। आपकी कहानी पाठक को बाँधे रखती है। बहुत ही भावपूर्ण कहानी।

लेखिका ज्योति गजभिये का धन्यवाद एवँ आभार वक्तव्य
सर्वप्रथम संतोष जी का हार्दिक आभार प्रगट करती हूँ जिन्होंने वी एम एम के पटल पर मेरी कथा को स्थान दिया, उनका प्रोत्साहन ही मेरा संबल है, मधु जी एक बहुत अच्छी इंसान बांदवगढ़ में हुई उनसे मुलाकात हमेशा के लिये यादगार बन गई, रत्ना पांडेय जी मंच की सक्रिय सदस्या और संचालक दोनों ने संचालन का भार खुशी खुशी वहन किया, मेरा धन्यवाद।

अब कहानी पर, कहानी के पात्र हम बाहर कहीं से नहीं बल्कि आस-पास से लेते हैं, रेशमा इस लड़की का इंटरव्यू मैंने इसी साल महिला दिवस पर लिया था, वह मुंबई में अंधेरी में रहती है, मुलुंड में हुई लैंड स्लाइड दुर्घटना में उसकी माँ-बहिन की मृत्यु हो गई, वह सिक्यूरिटी गार्ड का काम करती है उसने जिस पगली को अपने घर लाया उसका नाम सुजाता है।
कहानी में बयान सबकुछ सत्य घटना है सिर्फ प्रीतम का चरित्र मैंने रचा है, गैंग रेप की घटनायें हर हफ्ते कहीं न कहीं होती हैं तब शिकार कौन बनती हैं ,ऐसी ही लड़कियाँ, महानगरों में अमीरों के लिये सुरक्षा कहीं से जुटा भी ली जाये पर गरीब और अकेली लड़कियों का कौन रक्षक है?उन्हें स्वयं ही रक्षाकवच खोजने पड़ते हैं जैसे रेशमा ने लाठी को चुना……एक बात और रेशमा चाहती तो देह विक्रय भी कर सकती थी पर उसने ईमानदारी से मेहनत की रोटी खाई, ऐसी लड़कियों को सैल्यूट, जिसे हमने महिला दिवस पर सम्मानित किया. आपने कहानी को प्यार दिया, अपनी प्रतिक्रियायें दी नतमस्तक हूँ आपके समक्ष …..

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