ताजा सामाचार

आप यहाँ है :

एक अनपढ़ श्रमिक की देन है यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल कालका-शिमला रेलवे लाइन

यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल 116 साल पुरानी कालका-शिमला रेलवे लाइन के निर्माण की कहानी बेहद रोचक है। 116 वर्ष पुरानी इस रेलवे लाइन को ब्रिटिश इंजीनियरों के बजाय एक अनपढ़ पहाड़ी नौजवान ” बाबा भलकू राम ” के इंजीनियरिंग कौशल से तैयार किया गया।

इंजीनियरिंग कौशल के धनी थे बाबा भलकू राम
बाबा भलकू राम चायल के समीप झाझा गांव के एक अनपढ़ किन्तु विलक्षण प्रतिभा संपन्न ग्रामीण थे। जब सारे अंग्रेज इंजीनियर कालका शिमला रेल लाइन का सर्वे करने में असफल हो ये तब रेल्वे में मजदूरी कर रहे बाबा भलकूराम की सलाह और सहयोग से अंग्रेज इंजीनियर शिमला कालका रेलवे लाइन के निर्माण में सफल हो पाए थे। हिंदुस्तान तिब्बत रोड के निर्माण के वक्त भी बाबा भलकू के मार्ग निर्देशन में न केवल सर्वे हुआ बल्कि सतलुज नदी पर कई पुलों का निर्माण भी हुआ था। जिसके लिए उन्हें ब्रिटिश सरकार के लोक निर्माण विभाग द्वारा ओवरसियर की उपाधि से नवाजा गया था। कहा जाता है की भलकू अपनी एक छड़ी से नपाई करता और जगह जगह सिक्के रख देता और उसके पीछे चलते हुए अंग्रेज सर्वे का निशान लगाते चलते। जहाँ अंग्रेज इंजीनियर फेल हो गए वहां अनपढ़ ग्रामीण एक छड़ी के सहारे इस मुश्किल कार्य को अंजाम दिया। जिसको आज़ादी के बाद एक इंच आगे नही बढाया जा सका। चायल से करीब आधे घंटे की दूरी पर भलकू का गांव है और वह घर भी है जिसमें वह रहते थे. सौ से ज्यादा साल पुराना यह घर लकड़ी का बना है और अभी तक यह वैसा ही खड़ा है जो उनके इंजीनियरिंग कौशल का एक अद्भुत नमूना है.

ब्रिटिश रेलवे कंपनी के मुख्य इंजीनियर एच. एस हेरिंगटन के लाइन बिछाने की विफलता के बाद भलकू ने 96.57 किलोमीटर लंबे इस रेलवे ट्रैक का खाका तैयार किया.

कहते हैं कि कालका शिमला रेल खंड के निर्माण के समय सुरंग संख्या 33 बनाते वक्त अंग्रेजी इंजीनियर सुरंग के छोर मिलाने में असफल हो गए थे। जिसके चलते अंग्रेजी हकूमत ने उस पर एक रुपया जुर्माना लगाया था। जिसकी शर्मिंदगी के चलते इंजीनियर बरोग ने खुदकुशी कर ली थी। इसी बीच गांव झाजा के बाबा भलकू ने अपनी छड़ी के साथ अंग्रेजी इंजीनियर को राह दिखाई जिसके चलते सुरंग के दो छोर मिले और कालका-शिमला रेलमार्ग का निर्माण पूरा हो सका। रेलवे में श्रमिक बाबा भलकू ने ही अपनी लाठी से इस पहाड़ी के नीचे प्रस्तावित सुरंग का दूसरा मुहाना निकाला। इसकी लंबाई एक किलोमीटर 143 मीटर और 61 सेंटीमीटर है।

कोई कहता है कि उन्हें इसका सपना आया था। अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से ही उन्होंने यह कर दिखाया। कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होने से रेलवे इस पर खामोश है। कहते यह भी हैं कि मशोबरा से बेखलटी तक भलकू सड़क नाम इसलिए पड़ा कि बाबा यहां से आगे तक रेल विस्तार चाहते थे।

नौ नवंबर 1903 को शुरु की गई कालका-शिमला रेल लाइन को मूल रूप से 107 सुरंगों के बीच से निकाला गया था, लेकिन अब यह रेलवे लाइन 102 सुरंगों से होकर गुजरती है. कालका-शिमला टॉय ट्रेन 869 पुलों और 919 तीखे मोड़ों से होकर गुजरती है. इसका सबसे कम 48 डिग्री का तीखा मोड़ इंजीनियरिंग कौशल की मिसाल है. मनमोहक वादियों से गुजरती देश की सबसे संकरी रेल लाइन बेजोड़ इंजीनियरिंग का जीता जागता उदाहरण है.

इस रेलवे लाइन पर सबसे बड़ी सुरंग बड़ोग में है जो एक किलोमीटर लंबी है. बड़ोग सुरंग को कर्नल एस. बड़ोग के नाम पर रखा गया है जिन पर सुरंग के गलत अलाइनमेंट की वजह से हुए नुकसान के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक रुपए का जुर्माना लगाया था. इससे आहत होकर उन्होंने इस सुरंग में आत्महत्या कर ली थी. उनकी याद में इस सुरंग का नाम बड़ोग रख दिया गया. कर्नल बड़ोग की मौत के बाद इंजीनियर हेरिंगटन को इसके निर्माण का काम सौंपा गया. उन्होंने इसके निर्माण में बाबा भलकू की सहायता ली. ऐसा कहा जाता है कि बाबा भलकू ने जो रास्ता बताया उसी पर यह सुरंग बनकर तैयार हुई.

द ग्रेटेस्ट नैरो गेज इंजीनियरिंग ऑफ इंडिया’

इस क्षेत्र पर रेल लाइन बिछाने का कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण था. चट्टानों के गिरने वाले क्षेत्रों के किनारे निर्माण करने का सवाल ही नहीं था, इसलिए पहाड़ियों की तलहटी में खोदकर रास्ता बनाना एकमात्र विकल्प था. गहरी घाटियों की कम चौड़ाई पर कार्य करने की समस्या से निपटने के लिए उन घाटियों की ऊंचाई को काटकर तथा समतल बनाकर बुद्धिमानी से पुलों का निर्माण किया गया. ‘गिनीज बुक ऑफ रेल फैक्ट्स एंड फीट’ ने इसे ‘द ग्रेटेस्ट नैरो गेज इंजीनियरिंग ऑफ इंडिया’ बताया है. इस रेलवे लाइन को रिकॉर्ड चार वर्ष में पूरा किया गया. यूनेस्को ने 2008 में इसे विश्व धरोहर घोषित किया था.

बाबा की याद में शिमला में ”बाबा भलकू रेल संग्रहालय ”

भलकू के बारे में एक अनोखी बात यह कही जाती है कि वे जीव-जंतुओं से बहुत प्रेम करते थे और यहां तक के अपने बालों के जुओं को भी शक्कर खिलाते थे. कहा जाता है कि वह जगन्नाथ यात्रा पर गए थे और फिर वहां से कभी लौटे नहीं. इस रेलवे लाइन के निर्माण में भलकू के योगदान को ध्यान में रखते हुये शिमला में ”बाबा भलकू रेल संग्रहालय ” बनाया गया है. संग्रहालय में एक ब्रिटिश अधिकारी का प्रमाण पत्र भी है जिसमें बाबा भलकू के योगदान का जिक्र किया गया है.

इस संग्रहालय में हथकरघा संचालित लीवर, हेयर अवपथन उपकरण, लाइन बदलने का लीवर, पीतल की टोपी सहित अग्निशमन यंत्र, कोयले का बक्सा, चिमटा, छड़, बेलचा, मशाल पॉट, हस्त संकेत दीपक, सबसे बड़ी बड़ोग सुरंग का मॉडल, गुमशुदा संपत्ति रजिस्टर सहित और भी कई पुरानी वस्तुएं हैं।

image_pdfimage_print


Leave a Reply
 

Your email address will not be published. Required fields are marked (*)

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

सम्बंधित लेख
 

Back to Top