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सृजन, सेवा और विकास के कर्मयोगी पद्मश्री मगराज जैन

पद्मश्री मगराज जैन थार की महान विभूति थे जिन पर थार मरुस्थलीय क्षेत्र के गावं, गरीब और युवा सदैव गर्व करते रहेंगे। थार के हुनर को वैश्विक पहचान दिलाने का श्रेय जैन को जाता है। भारत-पाक की अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे बाड़मेर जिले के शिव गांव में 24 मार्च 1929 को जन्मे मगराज जैन एक ऐसी शख्सियत है जिन्होंने थार के लोक संगीत, लोककला और मेलों को पुनर्जीवित कर विश्वस्तरीय ख्याति दिलाने में अहम भूमिका निभाई। नेहरू युवा केन्द्र के युवा समन्वयक के बतौर श्री जैन ने युवाओं की क्षमता संर्वधन के बहुतेरे प्रशिक्षण आयोजित कर युवाओं को रोजगार से जोड़ा। लोक कला एवं संस्कृति के उन्नयन संरक्षण और अकाल के दौरान पीड़ित परिवारों को रोजी रोटी के साधन उपलब्ध कराने के महत्वपूर्ण सेवा कार्य एवं व्यक्तिगत गुणों के लिये थार रेगिस्तान के सपूत मगराज जैन को भारत सरकार द्वारा सन् 1989 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। पद्मश्री मगराज जैन का 86 वर्ष की आयु में 4 नवम्बर 2014 को देहावसान हो गया था।

1947 मैं देश विभाजन की खूनी त्रासदी ने किशोर मगराज की आत्मा को झिंझोड़कर रख दिया जब रेडक्लिफ लाइन ने भारत-पाकिस्तान दो राष्ट्र बना दिए। पाकिस्तान से शरणार्थियों का बाड़मेर आना शुरू हो गया। खून से लथपथ, भूख और गरीबी से त्रस्त इंसानों के लिए कोई आसरा नहीं, पीने को पानी नहीं। अट्ठारह वर्ष के किशोर वय के श्री जैन द्वारा हर रोज जल्दी उठकर ट्रेन पर जाना और शरणार्थियों की सेवा करना उनका मिशन बन गया। घर घर खाना, कपड़े इकट्ठे करना और ट्रेन से आ रहे लुटे पिटे लोगों को पहुंचाना। अपने साथियों की टीम बनाकर लोगों की पीड़ा हरने का जो कार्य उन्होंने उस समय शुरू किया वह जिंदगी भर उनकी जिंदगानी का हिस्सा बन गया। तब से ताजिंदगी उन्होंने पीड़ित मानवता के सेवा में खुद को समर्पित कर दिया।

मगराज जैन बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और विलक्षण प्रतिभा के धनि थे। उच्च शिक्षा अर्जित करने के बाद उन्होंने अध्यापन और समाज सेवा से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुवात की। 1951 से 1973 तक शैक्षिक सेवा के दौरान उन्होंने अभावग्रस्त बाड़मेर जिले के लोगों की कठिनतम जीवन यात्रा को नजदीक से देखा। पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रीत्व काल में 1952 में शुरू की गई भारत सेवक समाज की शाखा बाड़मेर में स्थापित कर दी। अब बाड़मेर में एक नया दौर शुरू हुआ भारत सेवक समाज अकाल और सूखे वाले बाड़मेर के लिए राहत, चिकित्सा, शिक्षा, सामुदायिक सेवा का पर्याय बन गया।

जहां सड़क नहीं, पानी नहीं, बिजली नहीं,वहां शिक्षा की अलख जगाने के लिए अनौपचारिक शिक्षा, चल पुस्तकालय, वाचनालय, सामुदायिक सेवा के लिए जनभागीदारी से पानी के 30- 40 कुओं का निर्माण,बेरीयों का रखरखाव, गरीबों के लिए निशुल्क होम्योपैथिक चिकित्सा, अकाल राहत कार्य में जिले के लोगों को राहत देना शुरू किया। वर्ष 1965, 1971 के युद्ध में जवानों की,सेना की सेवा में भारत सेवक समाज श्री जैन के नेतृत्व में सेवारत था। गरीबों,दलितों,वंचित वर्ग को उस जमाने में सामुदायिक सेवाएं पहुंचाना चुनौतीपूर्ण था जबकि आवागमन,संचार के साधनों का अभाव था। शिक्षक होने का मतलब श्री जैन के लिए केवल पढ़ाना नहीं था वरन उन सिविक मूल्यों के जरिए लोगों खासतौर से ग्रामीण लोगों के जीवन में बदलाव लाना और कष्ट में रह रहे लोगों को राहत, मदद पहुंचाना था। 1972 में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए उन्हें राजस्थान सरकार द्वारा राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान से नवाजा गया।

उनकी जीवन यात्रा में दूसरा मोड़ तब आया जब 1973 में वे नेहरू युवा केंद्र में युवा समन्वयक पद पर आ गए। यहां उन्होंने क्षेत्र में अलग-अलग रूचियों वाले लोगों के समूह तैयार कर अलग अलग गैर सरकारी संस्थाएं खड़ी की जो पर्यावरण, प्रौढ़ शिक्षा, खेल, ललित कला, लोक संगीत, नशा मुक्ति, महिला विकास आदि में कार्य कर सकें। जिला युवक कल्याण समिति के माध्यम से ऊंट गाड़ों का निर्माण, मजदूरों के लिए अनौपचारिक शिक्षा के लिए रात्रिकालीन कक्षाएं,टंकण, गलीचा प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं जन सहयोग से शुरू की। जिसकी प्रशंसा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी की।

श्री जैन ने नेहरू युवा केंद्र एवम् मरुधर लोक कला केंद्र के माध्यम से बाड़मेर के विलुप्त हो रहे सनावड़ा, लखेटा, कनाना गैर मेलों को जीवंत किया,इसकी पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनाई। इससे गैर नृत्य कलाकारों की रोजी रोटी बन गई। इसी तरह लंगा मांगणियार भील लोक संगीत समुदाय की गरिमा को बढ़ाने, मान्यता देने के लिए लोकानुरंजन मेलों का आयोजन ने यहां की लोक कला संगीत को शोहरत दी और कलाकारों को रोजगार। उन्होंने लोक संगीतकारों के समूह बनाने में पहल की ताकि उन्हें आकाशवाणी दूरदर्शन में जगह मिल सके। इसी तरह करीब पांच हजार से अधिक युवक-युवतियों को हस्तशिल्प यथा कांच कशीदा एप्लीक, चर्म कार्य, रेडियो मरम्मत सहित चालीस से अधिक विभिन्न व्यवसायों में प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराई और उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया। युवाओं की रोजी-रोटी का जरिया बन गया।

नेहरू युवा केंद्र ने अपनी निजी आय से वाहन खरीदने के साथ अपना भवन भी बना लिया। यह सम्पूर्ण देश में इकलौता उदहारण था जब किसी नेहरू युवा केंद्र ने बिना सरकारी सहायता के लाखों रूपये की धनराशि अर्जित कर अपने लिए भवन का निर्माण कराया हो।

सरकारी सेवा से 1988 में सेवानिवृत्त होने के बाद उनके पैर कहां रुकने वाले थे। उन्होंने तय कर रखा था कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का उन्नयन करके ही थार मरुस्थल को बचाया जा सकता है,लोगों की जिंदगी को बेहतर किया का सकता है। श्री जैन ने सोसायटी टू अपलिफ्ट रूरल इकोनामी नाम से गैर सरकारी संगठन शुरू किया। थार की विलुप्त हो रही थारपारकर नस्ल संरक्षण एवं डेयरी, सूखे में कृषि विज्ञान, स्थानीय हुनर के जरिए रोजगार, मलेरिया और अन्य बीमारियों से मर रहे लोगों के लिए चिकित्सा सुविधा, प्रसव में औरतों के जीवन को बचाने के लिए विभिन्न सुविधाएं और प्रशिक्षण कार्य, सड़क पानी की आधारभूत सुविधाओं से वंचित बॉर्डर के इलाके में अस्पताल स्थापित कर,मूक, बधिर बच्चों के लिए विद्यालय,शिक्षा से वंचित महिलाओं के लिए शिक्षा,आय संवर्धन गतिविधियां,हस्त शिल्प केंद्र, भारत-पाक सीमा पर गरीबी झेल रहे दलित गरीब ,वंचित वर्ग का सशक्तिकरण ने थार की सूरत एवं यहां के लोगों की जिंदगी बदल दी है और बदलाव का दौर आज भी जारी है। कृषि के प्रयोगों ने सूखे में भी किसान अपनी आमदनी को प्राप्त कर रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी श्री जैन के थारपारकर नस्ल संरक्षण एवं कार्यों को देखकर प्रसन्नता जाहिर की और बॉर्डर में स्थापित उनके आश्रम बिंजराड विजिट किया।

पद्मश्री मगराज जैन 86 वर्ष की आयु पार कर 4 नवम्बर 2014 को हमें छोड़ कर चिरनिंद्रा में लीन हो गए। उनके सेवा कार्य आज भी मालाणी में श्रद्धा के साथ याद किये जाते है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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