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हिन्दी के प्रसिध्द कवि वीरेन्द्र डंगवाल नहीं रहे

हिन्दी के जाने माने कवि कवि वीरेंद्र डंगवाल का आज सोमवार28 सितंबर को तड़के निधन हो गया। वे पिछले सप्ताह से बरेली के आरएमएस अस्पताल में भर्ती थे जहां आज सुबह 4 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। वीरेंद्र डंगवाल 68 वर्ष के थे।

साहित्यिक जगत में वे वीरेन दा के नाम से मशहूर थे। वीरेन दा की रुचि कविताओं के साथ-साथ कहानियों में भी रही। उत्तराखंड के टेहरी गढ़वाल में जन्में वीरेन दा ने पाब्लो नेरुदा, बर्तोल्त ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलुब, तदेऊश रोजविच और नाजिम हिकमत की दुर्लभ कविताओं के अनुवाद भी किए हैं।

वीरेन दा की कविताओं का अनुवाद बांग्ला, मराठी, पंजाबी, अंग्रेजी, मलयालम और उड़िया में हुआ है। उनका पहला कविता संग्रह 43 वर्ष की उम्र में आया था। वीरेन दा को इनके दूसरे कविता संकलन ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ के लिए 2004 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था। वीरेन हिन्दी दुनिया की नई पीढ़ी के सबसे चहेते और आदर्श कवि रहे हैं। वीरेन दा ने बरेली कॉलेज में हिन्दी का अध्यापन कार्य भी किया और शौकिया पत्रकार भी रहे।
उन्होंने बाईस साल की उम्र में पहली रचना, एक कविता, लिखी और फिर देश की तमाम स्तरीय साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते रहे। उन्होनें १९७०-७५ के बीच ही हिन्दी जगत में खासी शोहरत हासिल कर ली थी। विश्व-कविता से उन्होंने पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलुब, तदेऊश रोजेविच और नाज़िम हिकमत के अपनी विशिष्ट शैली में कुछ दुर्लभ अनुवाद भी किए हैं। उनकी ख़ुद की कविताओं का भाषान्तर बाँग्ला, मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी, मलयालम और उड़िया जैसी भाषाओं में प्रकाशित हुआ है।

वीरेन डंगवाल का पहला कविता संग्रह ४३ वर्ष की उम्र में आया। इसी दुनिया में नामक इस संकलन को रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (१९९२) तथा श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार (१९९३) से नवाज़ा गया। दूसरा संकलन ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ २००२ में आया और इसी वर्ष उन्हें ‘शमशेर सम्मान’ भी दिया गया। दूसरे ही संकलन के लिए उन्हें २००४ का साहित्य अकादमी पुरस्कार भी दिया गया।[2] उन्हें हिन्दी कविता की नई पीढ़ी के सबसे चहेते और आदर्श कवियों में माना जाता है। समालोचकों के अनुसार, उनमें नागार्जुन और त्रिलोचन का-सा विरल लोकतत्व, निराला का सजग फक्कड़पन और मुक्तिबोध की बेचैनी और बौद्धिकता एक साथ मौजूद है।

वे शौकिया तैर पर पत्रकारिता से भी जुड़े रहे थे और एक लंबे अरसे तक अमर उजाला के ग्रुप सलाहकार और बरेली के स्थानीय संपादक रहे। वर्ष २००९ में एक विवाद के चलते उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया था।

स्व. वीरिंद्र डंगवाल की प्रमुख रचनायें
इसी दुनिया में
दुष्चक्र में स्रष्टा
कवि ने कहा
स्याही ताल

स्व. वीरेन्द्र डंगवाल को मिले पुरस्कार और सम्मान
साहित्य अकादमी पुरस्कार (२००४)
शमशेर सम्मान (२००२)
श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार (१९९३)
रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (१९९२)



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