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लद्दाख के 500 लोग अपनी पहचान को मोहताज

जम्मू । भारत-पाकिस्तान के बीच वर्ष 1971 में हुए युद्ध की छाया अभी भी लद्दाख के तयाकशी गांव का पीछा नहीं छोड़ रही है। जमीन के राजस्व दस्तावेजों के न होने से गांव के करीब 500 लोग 46 साल बाद भी जम्मू-कश्मीर के निवासी होने का प्रमाण नहीं दे पा रहे हैं। वर्ष 1971 के युद्ध के दौरान जब ग्रामीण विस्थापित हुए और कई इलाके भारतीय नियंत्रण में आ गए, उस समय तयाकशी, तुरतुक, चुलुंका और थांग के राजस्व दस्तावेज स्कर्दू में रह गए जो उस समय जिला मुख्यालय था। स्कर्दू इन दिनों पाक अधिकृत कश्मीर में पड़ता है।

युद्ध के कारण इन गावों के कई परिवार विभाजित हो गए और उनके रिश्तेदार कुछ सौ मीटर की दूरी पर नियंत्रण रेखा की दूसरी तरफ रह रहे हैं। नोब्रा से कांग्रेस विधायक दालदिन नामगयाल ने कहा, ‘यह शर्मनाक है कि इन लोगों की कोई पहचान नहीं है। जम्मू-कश्मीर और भारत के निवासी होने की बात को साबित करने के लिए उन्हें कोर्ट से शपथपत्र हासिल करना पड़ता है। यह उस सरकार के लिए शर्मनाक है जो राष्ट्रवाद के लंबे-लंबे वादे करती है।’

यहां पर कुछ ग्रामीण किसी तरह से आधार कार्ड हासिल करने में सफल रहे हैं लेकिन यह उस जमीन के मालिकाना हक को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है जिस पर वे दशकों से रह रहे हैं। कोर्ट के शपथपत्र के बिना वे यह भी साबित करने में असमर्थ हैं कि वे जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी हैं। नूब्रा विधानसभा सीट में कुल 25 हजार लोग रहते हैं जो चीन और पीओके से सटा हुआ है।

तुरतुक, चुलुंका और थांग के जिला मुख्यालय भी स्कर्दू में हैं लेकिन राज्य सरकार ने इन तीन गांवों के लोगों को राजस्व दस्तावेज दे दिया है। अब कांग्रेस विधायक ने विधानसभा में तयाकशी के लोगों को भी जमीन के दस्तावेज जारी करने की मांग को लेकर प्रस्ताव रखा है।

साभार- इकॉनामिक टाईम्स से



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