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जिसने लद्दाख नहीं देखा, उसने कुछ नहीं देखा

जम्मू-कश्मीर उत्तर भारत का एक ऐसा राज्य है, जहां पर्यटन की संभावनाएं बहुत प्रबल हैं। हालांकि पिछले कुछ सालों में आतंकी गतिविधियों के कारण यह उद्योग कुछ प्रभावित रहा। बावजूद इसके आज भी यहां दुनियाभर के लोगों का आना जाना अनवरत जारी है। इस राज्य के तीनों क्षेत्र जम्मू, लद्दाख और कश्मीर के हजारों पर्यटन स्थल आज भी अपनी शोभा को बरकरार रखे हुए हैं। जम्मू कश्मीर राज्य के एक खण्ड के रूप में ज्ञात लद्दाख अपनी विशिष्ठ संस्कृति के लिए विश्वविख्यात है। ऐतिहासिक काल से बल्तिस्तान घाटी, सिन्धु घाटी और जंस्कार का क्षेत्र लद्दाख के रूप में जाना जाता है। विभिन्न हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं और चोटियों से आवृत्त यह क्षेत्र अनेक प्रसिद्ध नदियों, हिमनदों, झीलों एवं झरनों के साथ ही बौद्ध संस्कृति के लिए भी यह क्षेत्र विख्यात है। इसके दक्षिण में लाहौल-स्पीति, पूर्व में अक्साई चिन, पश्चिम में जम्मू-कश्मीर तथा उत्तर में जिनजियांग का क्षेत्र है। कुनलुन पर्वत श्रृंखला और मुख्य हिमालय के बीच बसा लद्दाख एक विरल जनसंख्या वाला क्षेत्र है। गॉडविन आस्टिन (8611 मीटर) और गासरब्ब्रूम (8068) सर्वाधिक ऊंचाई वाली चोटियों में शामिल हैं। लद्दाख का क्षेत्र जिसमें से लगभग 59 हजार वर्ग किलोमीटर भारत के अधिकार में है, समुद्र तल से लगभग तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। प्रकृति की अनमोल धरोहर के साथ ही यहां बड़ी संख्या बैद्ध मठ हैं जहां दुनियां के कोलाहल से दूर शांति का अनुभव किया जा सकता है।

कब जाएं-
हमेशा बर्फ से ढंके रहने के कारण लद्दाख के अधिकतर भाग कई-कई महीने समस्त विश्व से कटे रहते हैं न तो यहां सड़क मार्ग दुरुस्त रहते हैं और न ही अन्य यातायात के साधन मिलते हैं। ऐसे में मई से लेकर नवंबर तक का मौसम इस क्षेत्र में जाने का सबसे अच्छा समय है। वैसे सितंबर और अक्टूबर के महीने में यहां पर्यटकों की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी देखी गयी है।

कैसे जाएं-
यदि आप वायुमार्ग से जा रहे हैं तो जम्मू, चंडीगढ़, दिल्ली, श्रीनगर से लेह के लिए इंडियन एयरलाइंस की सीधी उड़ानें हैं। लेह शहर में आपको टैक्सी, जीपें तथा जोंगा को किराए पर लेना पड़ता है। ये स्थानीय ट्रांसपोर्ट तथा बाहरी क्षेत्रों में जाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। अगर आप रेलमार्ग से जाना चाहते हैं तो सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन जम्मू है, जहां से लेह की दूरी मात्र 690 किमी है। जम्मू रेलवे स्टेशन देश के प्रत्येक भाग से रेल द्वारा जुड़ा हुआ है। यहां से बस, टैक्सी व अन्य साधनों से आपको आगे की यात्रा पूरी करनी पड़ेगी। वहीं आप अगर सड़क मार्ग से लेह तक पहुंचना चाहते हैं तो इसके लिए जम्मू-श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग बना है। श्रीनगर से लेह 434 किमी, कारगिल 230 किमी तथा जम्मू 690 किमी की दूरी पर स्थित है।

कहां ठहरें-
लेह में ठहरने के लिए हर तरह की सुविधा है। ज्यादातर होटल चूंकि स्थानीय लोगों द्वारा चलाए जाते हैं इसलिए उनकी सेवाओं में पारिवारिक लुत्फ ज्यादा होता है। यहां गेस्ट हाउसों में पांच सौ रुपये दैनिक किराये के डबल बेडरूम से लेकर बड़ी होटल में 2600 रु. रोजाना तक के कमरे मिल जाएंगे। लेकिन यहां घरों से जुड़े गेस्ट हाउसों में रहना न केवल किफायती है बल्कि लद्दाखी संस्कृति व रहन-सहन से परिचित भी कराता है। नुब्रा घाटी के इलाकों में हालांकि अभी पर्यटकों के रहने की व्यवस्था विकसित की जानी बाकी है। जून से सिंतबर के ट्यूरिस्ट सीजन में होटल बुकिंग पहले से करा लेना सुरक्षित रहता है।

रोमांचक पर्यटन
यह इलाका ट्रैकिंग, पर्वतारोहण और राफ्टिंग के लिए काफी लोकप्रिय है। यूं तो यहां पहुंचना ही किसी रोमांच से कम नहीं लेकिन यहां आने वालों के लिए उससे भी आगे बेइंतहा रोमांच यहां उपलब्ध है। दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित सड़कों (मारस्मिक ला व खारदूंग ला) के अलावा इस इलाके में सात हजार मीटर से ऊंची कई चोटियां हैं जिनपर चढ़ने पर्वातारोही आते हैं। ट्रैकिंग के भी यहां कई रास्ते हैं। ट्रैकिंग व राफ्टिंग के लिए तो यहां उपकरण व गाइड आपको मिल जाएंगे लेकिन पर्वतारोहण के लिए भारतीय पर्वतारोहण संस्थान से संपर्क करना पड़ेगा। स्थानीय भ्रमण के लिए आपको यहां मोटरसाइकिल भी किराये पर मिल सकती है।

मेले व त्योहार
लद्दाख क्षेत्र में मूलत: बौद्ध धर्म की मान्यता है। इसलिए यहां की संस्कृति और तीज-त्योहार उसी के अनुरूप होते हैं। पूरे इलाके में हर तरफ आपको बौद्ध मठ देखने को मिल जाएंगे। इनमें से ज्यादातर इतिहास की धरोहर हैं। ज्यादातर बड़े मठों में हर साल अपने-अपने आयोजन होते हैं। तिब्बती उत्सव आम तौर पर काफी जोश व उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। मुखौटे और अलग-अलग भेष बनाकर किए जाने वाले नृत्य-नाटक, लोकगीत व लोकनृत्य यहां की संस्कृति का प्रमुख अंग हैं। यहां की बौद्ध परंपरा का सबसे बड़ा आयोजन हेमिस का होता है। गुरु पद्मसंभव के सम्मान में होने वाला यह आयोजन तिथि के अनुसार जून या जुलाई में होता है। इसी तरह ज्यादातर मठ सर्दियों व गरमियों में अपने-अपने जलसे करते हैं। लद्दाखी संस्कृति को संजोये रखने और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्यटन विभाग भी अपने स्तर पर हर साल सितंबर में पंद्रह दिन का लद्दाख उत्सव आयोजित करता है।

क्या देखें
प्रकृति की इस बेमिसाल तस्वीर के नजारे आपकी आंखों को कभी थकने नहीं देते लेकिन उसके अलावा भी बौद्ध संस्कृति की अनमोल विरासत यहां मौजूद है। यहां देखने की ज्यादातर चीजें इसी से जुड़ी हैं। चाहे वह पुराने राजमहल हों, मठ हों, मंदिर या फिर संग्रहालय। लेह के आसपास के कई गांवों में इस तरह के मठ मिल जाएंगे। इस तरह का ज्यादातर निर्माण 14वीं सदी से 16वीं सदी के बीच लद्दाख के धर्मराजाओं ने कराया। हालांकि अधिकतर मठ व महल जर्जर अवस्था में हैं और उनके मूल निर्माण का कुछ हिस्सा ही आज सलामत है लेकिन फिर भी वे इतिहास के एक दौर की पूरी कहानी कहते हैं यहां के जनजीवन में देखने लायक सबसे अनोखी बात द्रोगपा गांव हैं। भारतीय क्षेत्र में कुल पांच द्रोगपा गांव हैं जिनमें से केवल दो ही में विदेशी पर्यटकों को जाने की इजाजत है। धाव बियामा गांवों में पूरी तरह दार्द लोगों के बचे-खुचे वंशजों की बसावट है। इन दार्द लोगों को सिंधु घाटी में आर्यो की आखिरी नस्ल माना जाता है। जाहिर है कि मानवविज्ञानियों के लिए इन गांवों की खासी अहमियत है। इनके सालाना त्योहार भी बड़े आकर्षक होते हैं जब सारे लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में नाचते-गाते घरों से निकलते हैं। इस इलाके में अभी पर्यटन ढांचा पूरी तरह विकसित नहीं है। द्रोगपा गांव लेह से 150 से 170 किलोमीटर आगे हैं। वहां रुकने के लिए कुछ गेस्टहाउस हैं और साथ ही आस-पास के कुछ गांवों में भी कैंपिंग साइट बनाई गई हैं।

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