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लायी हयात आए,कज़ा ले चली चले

क्या आप जानते हैं कि उपन्यासकार, इतिहासकार,राजनीतिक विश्लेषक और भारतीय पत्रकारिता की सबसे बुजुर्ग हस्ती खुशवंत सिंह दुनिया से खुद विदा लेना चाहते थे. जी हाँ ! 98 वर्ष के की उम्र में खुशवंत जी ने 18 सितम्बर 2012 को ही नई दिल्ली में कह दिया था कि अब समय आ गया है कि वह अपने बूटों को टांग दें,एक बार पीछे मुड़कर देखें और अंतिम यात्रा के लिए तैयार हो जाएं.लेकिन जिंदगी यह सिलसिला खत्म करने की इजाजत ही नहीं देती.

खुशवंत सिंह ने अपने एक स्तंभ ‘विद मैलिस टुवार्डस वन एंड ऑल’ में लिखा था, ‘मैं 70 साल से लगातार लिखता रहा हूं.सच यह है कि मैं मरना चाहता हूं. मैंने काफी जी लिया और जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं है जो करने की मेरी इच्छा हो,जो करना था कर चुका.अब जब कुछ करने को बचा नहीं तो जिंदगी आगे खींचने का क्या मतलब.’ ज़िंदगी जी लेने का ऐसा उम्दा एहसास और मौत को गले लगा लेने की ऎसी बेबाक तैयारी ! सच ये कोई मामूली बात तो नहीं कही जा सकती।

खुशवंत सिंह का जन्म 1915 में हुआ था.उन्होंने ‘योजना’, ‘द इलस्ट्रेटेड वीकली’ और ‘नेशनल हेराल्ड’ के अलावा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ का संपादन किया था. उन्होंने अंग्रेजी में 50 से भी अधिक उपन्यास लिखे और ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ सहित उनके कई कहानी संकलन प्रकाशित हैं.खुशवंत अखबारों के लिए स्तंभ भी लगातार लिखते रहे.

विवादों में रहने वाले लेखक खुशवंत सिंह अपनी साफगोई और बेखौफ फितरत के लिए जाने जाते हैं। अंग्रेजी-हिंदी में समान रूप से पढे जाने वाले खुशवंत ताउम्र युवा ऊर्जा एवं रचनात्मकता से भरपूर रहे।कुछ न कुछ करते रहना इन्हें अच्छा लगता था. यूं तो इनकी जिंदगी एक खुली किताब की तरह रही है, लेकिन इनके जीवन के कुछ ऐसे पहलू भी हैं,जो पूरी तरह दुनिया के सामने नहीं आए। इनके व्यक्तित्व के चंद पहलुओं पर निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट साहब ने बड़ी खूबसूरती से रौशनी डाली है.

बकौल श्री भट्ट हमारी सभ्यता मुनाफे पर चलती है। समाज में उसी की इज्जत व शोहरत होती है,जो मुनाफा ला सके। इसलिए जब कोई वृद्ध मुनाफे में सहायक नहीं होता तो उसे इतिहास के डस्टबिन में डाल कर समाज भूल जाता है। इसी कारण मानव सभ्यता के आरंभिक काल से जीवन के अंतिम 15-20 वर्षो के प्रति लोग डरे रहते हैं। माना जाता है कि जीवन के अंतिम वर्षो में हमारे दिल-ओ-दिमाग में क्रिएटिविटी की धधकती आग बुझने लगती है। रचनाकारों की वास्तविक मौत से पहले सृजनात्मक मौत हो जाती है। यह बात ज्यादातर लोगों के बारे में सच हो सकती है, लेकिन एक व्यक्ति ने इसे झुठला दिया है। इनका नाम खुशवंत सिंह है।

बहरहाल मैं समझता हूँ कि इतिहासकार,लेखक,स्तम्भकार या चाहे जिस नाम से भी पुकारें,सच तो यह है कि वे जिंदा ज्वालामुखी की तरह हैं,जो हमेशा ऊर्जावान रहते हैं। 1950 में उनका पहला कथा संकलन छपा था। तब से उन्होंने द हिस्ट्री ऑफ सिख समेत दर्जनों किताबें लिखी हैं।अधिकतर लोग नहीं जानते कि खुशवंत सिंह पत्रकारिता में अपने जीवन के छठे दशक में आए। एक इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया था, मेरा सबसे बडा पाप यह है कि मैं स्थिर बैठना नहीं जानता। किसी बेचैन नदी की तरह हैं वे। बेचैन नदी बहती है और करोडों व्यक्तियों को जिंदगी देती है। इस रहस्यमय कलमकार की बेचैन आत्मा लिखती रही और करोड़ों पाठकों को इस जटिल दुनिया को समझने की अंतर्दृष्टि देती रही।

खुशवंत जी ने 1969 में इलस्ट्रेटेड वीकली की कमान संभाली थी।उ सके पहले वे अमेरिका में तुलनात्मक धर्म और समकालीन भारत का अध्यापन करते थे। उन्होंने वीकली का सर्कुलेशन 60000 से बढाकर चार लाख तक पहुंचा दिया। आलोचक भी मानते हैं कि उनमें वह सब करने की हिम्मत थी, जिनके बारे में बाकी संपादक सपने में भी नहीं सोच सकते थे। उन्होंने खुल कर लिखा और जीवन के सूर्यास्त में भी वही काम करते रहे।

खुशवंत जी ने सामान्य पाठकों तक पहुंचने की अद्भुत क्षमता का परिचय दिया। वे समकालीन विषयों पर सूचना देते रहे और पाठकों का मनोरंजन भी करते रहे. वे हंसाते और हंसीं-हंसीं में विवादों को जन्म भी देते तथा मुद्दों पर बेबाकी से राय देते रहे. अपने पाठकों से गहरे जुड़ाव के कारण वे देश में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले स्तंभकार बने रहे. अनेक पाठक उन्हें पत्र लिखते रहे लेकिन उन्हें सुखद आश्चर्य होता था जब उन्हें उनके द्वारा हस्तलिखित जवाबी पोस्टकार्ड मिलता था. उनमें इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल है.खुशवंत जी का कहना था,‘मैं उस हर पत्र का जवाब देने का प्रयास करता हूं जो मुझे भेजा जाता है।’ इसे बड़े आदमी का बड़प्पन नहीं तो और क्या कहेंगे आप ?

लोग कहते हैं कि जिंदगी परफेक्ट नहीं हो,तभी चकित करती है। आरोपों के बावजूद इसमें शक नहीं कि खुशवंत जी बेहद विशेष हैं,एक तरह की धरोहर हैं। उनकी जिंदगी में झांकने पर पता चलता है कि सही चैंपियन वही है,जो अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने की सदियों पुरानी धारणा को नहीं मानता। खुशवंत जी जैसे व्यक्ति सैकडों लक्ष्यों को छूना चाहते हैं, लेकिन उनकी कोई मंजिल नहीं है। वे जज्बे-जुनून के साथ जीते व काम करते हैं। बस यही कहना मुनासिब मालूम पड़ता है –

लायी हयात आए,कज़ा ले चली चले
अपनी खुशी से आए न अपनी खुशी चले
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(लेखक राजनांदगाँव में शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापक हैं और सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यक व सांस्कृतिक विषयों पर लिखते हैं)

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