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भुले-बिसरे इतिहास को एक नई पहचान देने वाले ललित शर्मा

राजस्थान पुरातत्व की दृष्टि से काफी समृद्ध है। खास कर हाड़ोती क्षेत्र में मूर्तिकला, अभिलेख, शिलालेख, मुद्रा और मंदिरों पर अनुसंधान की व्यापक संभावनाएं हैं। यह क्षेत्र में लेखन तक ही सीमित रहा है, अनुसंधान से अछूता है। अनुसंधान करने को उत्सुक युवाओं के लिए इसमें व्यापक संभावनाएं हैं।

झालावाड़ के पुरातत्ववेत्ता ललित शर्मा के इन विचारों और संदेश के साथ देखते हैं उनके पुरातत्ववेत्ता बनने के सफर को।
बचपन में झालावाड़ के पूर्व महाराणा हरीश चंद्र जी के निवास पर पिता चंदा लाल जी शर्मा
के साथ आना – जाना रहने से एतिहासिक प्रसंगों को सुन कर झालावाड़ के ललित शर्मा का रुझान ऐतिहासिक लेखन की ओर हो गया। इतिहास और इससे जुड़ी घटनाओं, मूर्तियों,शिलालेखों, मुद्राओं आदि से आप पुरातत्व की तरफ खींचते चले गए। यही वजह रही की आपने पुरातत्व में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।

ललित बताते हैं कि अध्ययन काल के दौरान ही आपका संपर्क विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में विश्व में विख्यात पुरातत्ववेत्ता पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के संपर्क में आए। उनके साथ अनेक पुरातत्व स्थलों की यात्रा करने का सौभाग्य आपको मिला।पुरातत्व के प्रति इनकी लगन और परिश्रम को देखते हुए वाकणकर जी ने इन्हें मुद्रा,
शिलालेख,मंदिर,मूर्तिकला पर गहराई से अध्ययन कराया और पुरातत्व पर प्रामाणिक अध्ययन के लिए आपको डेढ़ वर्ष के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय भेज दिया। वहां इन्होंने पुरातत्व के महत्व को गहराई से जाना और कई अन्य पुराविदों के संपर्क में आए। पुरातत्व ज्ञान प्राप्ति का क्रम आगे बढ़ा और आपने राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग के तत्कालीन निदेशक प्रसिद्ध पुरावेत्ता रत्न चंद अग्रवाल से अपने ज्ञान की अभिवृद्धि की।

पुरातत्व अध्यन के ये सब आधार ही जीवन में हाड़ोती – मालवा के केंद्र झालावाड़ क्षेत्र की पुरासम्पदा के गहन अध्ययन का प्रमुख माध्यम बनें। मौलिकता से पुरातत्व सामग्री पर खोज करते रहे और लिखते रहे। पुरातत्व में दक्ष और प्रशिक्षित ललित ने मंदिर स्थापत्य, मूर्ति,प्राचीन मुद्रा और अभिलेख पर वर्ष 1979 से अपना शोध लेखन प्रारंभ किया और आज तक निरंतरता बनाए हुए हैं।

आपके खोजपूर्ण शोध आलेख समाचारों, शोध पत्रिकाओं और जर्नल्स में प्रकाशित होने लगे। लगभग 1750 शोध लेख राष्ट्रीय एवम राज्य स्तर की शोध पत्रिकाओं और जर्नल्स में अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। आपने झालावाड़ के साथ – साथ हाड़ोती और मालवा क्षेत्र के अनछुए पहलुओं पर लिखा और झालावाड़ को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। लंबे समय तक किए गए अनुसंधान और प्रकाशन की जानकारी जब उदयपुर के महाराणा मेवाड़ फाउण्डेशन तक गई तो इसका परिणाम ” महाराणा कुम्भा इतिहास अलंकरण” सम्मान के रूप में सामने आया। इन्होंने इस सम्मान को प्राप्त कर अपना और झालावाड़ का नाम पुरातत्व के क्षेत्र में राजस्थान में रोशन किया। आपको इसके साथ – साथ विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में भी मध्य प्रदेश के ” वाकणकर स्मृति सम्मान” से सम्मानित किया गया।

पाठ्यक्रम में स्थान: यह हमारे लिए भी गर्व का विषय है कि आपकी कृति और पाठ “राजऋषि संत पीपा जी” कोटा विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग ( पूर्वार्ध) तथा स्नातक कला संकाय के ( द्वितीय वर्ष) के राजस्थान इतिहास का सर्वेक्षण में लागू किया गया है। पाठ “जल दुर्ग गागरोन” भी लागू हुआ है। राज्य माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने कक्षा 10 वीं की पुस्तक क्षितिज में इनका लिखित एवम संपादित पाठ “संत पीपा जी” को शामिल किया है।

शोध ग्रंथ : आपके 15 शोध ग्रंथ प्रकाशित हो चुके है। और 14 विशिष्ठ स्तरीय समारिकाओं का संपादन,प्रबंधन और प्रकाशन कराया हैं। आपके शोध ग्रंथों को राजस्थान और मालवा के इतिहासकारों द्वारा मान्यता प्रदान करना और पाठ्यक्रम में शामिल होना आपके शोध कार्य की श्रेष्ठता का स्वयं प्रमाण है। आपका ” श्रीराम” नामक ग्रंथ इस दृष्टि से अद्भुत है कि इसमें राम की कोई कथा नहीं है वरन श्रीराम की मूर्तियां,चित्रण एवम सिक्कों पर गहन अनुसंधान किया गया है। झालावाड़ जिले की रूपरेखा, गागरोन:इतिहास, पुरातत्व और पर्यटन, रामानंद परंपरा के उदगायक: संत पीपाजी, झालावाड़ इतिहास,संस्कृति और पर्यटन, झालावाड़ की मूर्ति परंपरा, राजर्षी संत पीपाजी, संत शिरोमणि सेनजी, झालावाड़ के प्रमुख शिलालेख, जल दुर्ग गागरोन, हाड़ोती की जैन मूर्ति कला एवं शिलालेख, राजराना झाला जलीमसिंह, झालावाड़ क्षेत्र की प्रमुख मुद्राएं और संस्कृति के पथ पर आपके विशेष शोध ग्रंथ हैं।

पुरस्कार : ललित को उनके शोध कार्य और लेखन पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा अब तक दो दर्जन से अधिक पुरस्कार और सम्मान से नवाजा जा चुका है। प्रमुख पुरस्कारों में मध्य प्रदेश शासन के भोपाल स्थित तुलसी मानस संस्थान 2014 में सुखरानी देवी द्वितीय राष्ट्रीय सम्मान, 2017 में उदयपुर के मेवाड़ महाराणा फाउंडेशन द्वारा महाराणा कुम्भा इतिहास अलंकरण से सम्मानित, 2018 में कला साहित्य एवम संस्कृति परिषद ( मेवाड़ ) का हल्दीघाटी मेवाड़ गौरव सम्मान, 2018 में साहित्य मंडल नाथद्वारा के भगवती प्रसाद देवीपुरा स्मृति इतिहास सेवा सम्मान, 2019 में भोपाल का पुरातत्वविद डॉ.वाकणकर रजत अलंकरण सम्मान एवम 2021 में विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के प्राचीन इतिहास विभाग का पद्म डॉ. विष्णुघर वाकणकर स्मृति सम्मान शामिल है।

परिचय : पद्मश्री डॉ.वाकणकर से प्रभावित उनके शिष्य ललित शर्मा का जन्म 2 जुलाई1963 को राजस्थान के झालावाड़ शहर
में हुआ। आपकी शिक्षा झालवाड़ में हुई। आपने 1991 में शिक्षा विभाग में अध्यापक के रूप में सेवा शुरू की और वर्तमान में आप राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय अकलेरा में सेवा रत हैं। स्कूली विद्यार्थियों को चित्रों, माडल और ऐतिहासिक स्थलों के भ्रमण द्वारा ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में और उनकी सुरक्षा के बारे में प्रेरित करते हैं। आप निरंतर पुरातत्व संबंधी शोध कार्य और लेखन में रत हैं। वर्तमान में आप अभी राजगढ़ मालवा जिले की प्राचीन मूर्ति कला पर शोध कार्य कर रहे हैं। साथ ही देश की दो विशिष्ठ शोध पत्रिका के सह – संपादन का कार्य और ” हिंदी की सांस्कृतिक विरासत” समुह्नकी वार्षिक शोध पत्रिका ” संस्कृति वैभव” के संपादन का दायित्व संभाल रखा है।
संपर्क सूत्र मो. 90790 87965
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( टिप्पणी : हाड़ोती में इनकेअलावा किसी अन्य ने पुरातत्व पर मौलिक शोध कार्य किया है तो वह अपने कार्य का विवरण मेरे whatapp no 9413350242 पर भेज सकते हैं। उनका भी स्वागत है।)
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