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लैटिन अमेरिका ने कोविड-19 से कई सबक सीखे हैं

लैटिन अमेरिका के अधिकतर देश बाक़ी दुनिया से अलग-थलग हैं. इसका मतलब ये है कि एक तरफ़ तो उन्हें सिर्फ़ अपने देश की जनता की फ़िक्र करनी है. तो, दूसरी तरफ़ इसका एक मतलब ये भी है कि वो इस महामारी से निपटने के लिए अतिरिक्त संसाधन बाहर से नहीं मंगा सकते.

कुछ अभूतपूर्व महीने गुज़रने के बाद, दुनिया ने तीव्र गति से होते हुए परिवर्तन को देखा है. इस दौरान हमने नए कोरोना वायरस के बारे में बहुत सी नई बातें जानी हैं. हमें पता चला है कि ये वायरस कैसे इंसान को निशाना बनाता है. इंसान के शरीर के भीतर जाकर ये कैसा बर्ताव करता है. हमारी अपनी ज़िंदगी और हमारे आस-पास के लोगों पर ये वायरस कैसा प्रभाव डालता है.

एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बाद, लैटिन अमेरिका की वो महाद्वीप था, जहां पर हमने कोरोना वायरस का प्रकोप व्यापक स्तर पर फैलते हुए देखा था. इसी महाद्वीप में हमने लोगों की ज़िंदगियों पर इस वायरस के दुष्प्रभावों को भी देखा. जो देश कोरोना वायरस से पहले प्रभावित हुए थे. उन्होंने इसके क़हर से निपटने के लिए क्या क़दम उठाए, उन्हीं उपायों ने लैटिन अमेरिका के देशों के लिए मार्ग दर्शक का काम किया. लैटिन अमेरिका में जैसे ही कोरोना वायरस, आबादी के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में लेने लगा, वैसे ही कुछ देशों ने बड़े आक्रामक क़दम उठाकर इस वायरस को फैलने से रोकने की कोशिश की. कुछ देशों ने बहुत सख़्ती से सोशल डिस्टेंसिंग के उपाय लागू किए. उन लोगों को क्वारंटीन किया गया, जो वायरस के शिकार हो चुके थे, या जो लोग संक्रमित व्यक्तियों के संपर्क में आए थे. चूंकि, इस महामारी के साथ दुनिया के सामने कई आर्थिक चुनौतियां भी आईं. इसलिए कई देशों की सरकारों ने आम नागरिकों, छोटे और मझोले कारोबारियों के लिए वित्तीय मदद के पैकेज का एलान किया. इसके अलावा सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का भी विस्तार किया गया.

लैटिन अमेरिका में जैसे ही कोरोना वायरस, आबादी के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में लेने लगा, वैसे ही कुछ देशों ने बड़े आक्रामक क़दम उठाकर इस वायरस को फैलने से रोकने की कोशिश की

आँकड़े क्या कहते हैं…
अगर हम लैटिन अमेरिका के तमाम देशों के सूचकांकों का विश्लेषण करें, तो हमें इन देशों द्वारा वायरस की रोकथाम के लिए उठाए गए क़दमों के प्रभावी या अप्रभावी होने का पता चलता है. हालांकि, आंकड़ों की ये व्याख्या निरपेक्ष नहीं होती. क्योंकि, जो भी आंकड़े या सूचकांक होते हैं वो अलग-अलग माहौल की सामूहिक तस्वीर पेश करते हैं. जैसे कि घनी बसी आबादी वाले इलाक़े यानी शहर, स्वास्थ्य व्यवस्था की अच्छाई या कमज़ोरी, अलग-थलग किए गए लोगों की सामान्य गतिविधियां चलाने की क्षमता, और सबसे अहम बात ये कि वास्तविक आंकड़े बताने में पारदर्शिता का ख़याल रखना.

कोरोना वायरस से जुड़े आंकड़ों को जुटाने की शुरुआत संक्रमित लोगों की संख्या और इस विषाणु से मरने वालों की संख्या बताने से हुई थी. आगे चलकर कोविड-19 के आंकड़ों से कई और बातों के संकेत निकाले जाने लगे. जैसे कि महामारी के दौरान होने वाली अधिक मौतों से ये पता चला कि दबाव में किसी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था कैसे काम करती है. फाइनेंशियल टाइम्स का कोरोना वायरस ट्रैकिंग नंबर– जो तमाम देशों में लॉकडाउन से दी जा रही रियायतों और संक्रमण के आंकड़ों का अच्छा स्रोत है. उससे पता चलता है कि महामारी के कारण कितने लोगों की मौत हुई. महामारी किस तरह से फैल रही है और सरकारों ने उससे निपटने के लिए क्या क़दम उठाए. ये विश्लेषण और इनके स्रोतों की जांच से स्वास्थ्य के विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों को ये अंदाज़ा होता रहा कि मौजूदा हालात कैसे बदल रहे हैं और चुनौती कितनी बड़ी है.

लैटिन अमेरिका ने कोविड-19 से क्या सबक सीखे
लैटिन अमेरिका के तमाम देशों ने कोरोना वायरस के प्रकोप से निपटने के लिए अलग-अलग रणनीतियों पर अमल किया. जैसे कि कुछ देशों ने शुरुआत में ही लॉकडाउन लगाया और अपने देश की जनता के लिए भारी-भरकम वित्तीय मदद दी, जैसे कि पेरू. वहीं, ब्राज़ील जैसे देश ने शुरुआत में हल्के फुल्के प्रतिबंधों से ही काम चलाने की कोशिश की. हालांकि, ऊपरी तौर पर भले ही ऐसा दिखता हो कि सख़्त क़दम उठाने से कोरोना वायरस का प्रकोप सीमित किया जा सकता है. लेकिन, कई देशों ने चतुराई भरे क़दम उठाकर अधिक प्रभावशाली ढंग से इस वायरस की रोकथाम करने में सफलता प्राप्त की. जैसे कि सरकार और प्राइवेट सेक्टर के बीच सहयोग, तकनीक का बेहतर इस्तेमाल और रोकथाम के लिए किए जा रहे उपायों पर सख़्ती से अमल.

कौन से उपाय बेअसर रहे?
लैटिन अमेरिका के सभी शहरों की मिली-जुली तस्वीर देखें, तो पता चलता है कि पेरू की राजधानी लीमा में इस महामारी के दौरान औसत से कहीं ज़्यादा लोगों की मौत हुई. अप्रैल महीने में पेरू की अर्थव्यवस्था में चालीस प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी, जो पिछले सौ वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट थी. पेरू, पिछले दो दशकों से दुनिया में सबसे तेज़ी से तरक़्क़ी करने वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है. पेरू ने अपने यहां के लिए जिस आर्थिक पैकेज का एलान किया था वो इस क्षेत्र का सबसे बड़ा स्टिमुलस था. पेरू ने 16 करोड़ डॉलर के वित्तीय पैकेज की घोषणा की थी, जो उसकी अर्थव्यवस्था का 12 प्रतिशत है. पेरू ने अपने यहां दुनिया का सबसे लंबा लॉकडाउन भी लगाया था और अपने यहां सबसे अधिक 15 लाख कोरोना टेस्ट भी किए थे. जो लैटिन अमेरिका में ब्राज़ील के बाद दूसरे सबसे अधिक कोरोना टेस्ट थे. इसका अर्थ ये होता है कि पेरू ने अपने यहां की आबादी के लिहाज़ से सबसे अधिक टेस्ट किए, जो लगभग उसके पड़ोसी देश चिली के ही बराबर हैं. चिली भी कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित हुआ था.

पेरू ने अपने यहां दुनिया का सबसे लंबा लॉकडाउन भी लगाया था और अपने यहां सबसे अधिक 15 लाख कोरोना टेस्ट भी किए थे. जो लैटिन अमेरिका में ब्राज़ील के बाद दूसरे सबसे अधिक कोरोना टेस्ट थे.

अगर संस्थागत तरीक़े से देखें, तो कोरोना वायरस के दो बड़े जोखिमों को ऊपर उल्लिखित क़दमों से कम नहीं किया जा सकता है. क्योंकि वायरस की प्रकृति ही ऐसी है. पहली बात तो ये है कि पेरू में असंगठित क्षेत्र बहुत बड़ा है और देश के कुल रोज़गार के अवसरों में से सत्तर प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र का ही है. इसका मतलब ये है कि देश में लॉकडाउन को तब तक प्रभावी तरीक़े से लागू नहीं किया जा सकता है, जब तक सभी आर्थिक गतिविधियों की वैल्यू चेन को तोड़ा ना जाए. इसीलिए, अगर आर्थिक गतिविधियां जारी रहती हैं, तो लोग आपस में संपर्क से बच नहीं सकते. अगर ऐसा होता है तो लॉकडाउन के बावजूद वायरस का संक्रमण फैलता रहता है. दूसरी बात ये है कि देश की कमज़ोर स्वास्थ्य व्यवस्था सामान्य हालात में ही लोगों की ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाती. ऐसे में महामारी के दौरान जब उस पर दबाव बढ़ा तो वो बुरी तरह से चरमरा गई. इसकी एक वजह ये है कि स्वास्थ्य व्यवस्था की संरचनात्मक कमियों को रातों रात सिर्फ़ पैसे ख़र्च करके ठीक नहीं किया जा सकता. तो, दबाव बढ़ने पर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की बुरी स्थिति होनी ही थी.

इसके अलावा, आम जनता को पैसे की सीधी मदद देने का उपाय भी उल्टा क़दम ही साबित हुआ. चूंकि, देश की ज़्यादातर आबादी असंगठित क्षेत्र में काम करती है और उसके पास डिजिटल वॉलेट की सुविधा नहीं थी. तो सरकार से मिलने वाली नकद मदद लेने के लिए लोगों को लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा. जिसके कारण धन वितरण के ये केंद्र संक्रमण का गढ़ बन गए. बाज़ार और दूसरे सार्वजनिक स्थान भी संक्रमण के बड़े अड्डे बन गए. और ये समस्या सिर्फ़ पेरू तक नहीं सीमित थी. मेक्सिको और ब्राज़ील को भी इन चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

ब्राज़ील में जब राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो ने तमाम चेतावनियों को दरकिनार करते हुए अर्थव्यवस्था को दोबारा खोलने का फ़ैसला किया, तो देश के स्वास्थ्य मंत्री ने इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद केंद्रीय कैबिनेट में भी संघर्ष छिड़ गया. इस वजह से ब्राज़ील के हालात और भी बिगड़ गए. राजनैतिक तनाव और घने बसे शहरों की चुनौती तो पहले से ही थी. वायरस की रोकथाम के लिए किए गए उपायों के साथ साथ अर्थव्यवस्था को भी तबाही से बचाने की कोशिश, ब्राज़ील को बहुत महंगी पड़ी. अमेरिका के बाद ब्राज़ील, कोरोना वायरस संक्रमण के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर है.

कौन सी तरकीब काम आई?
लैटिन अमेरिकी देश पराग्वे ने लॉकडाउन को सबसे अधिक सख़्ती से लागू किया था. क्योंकि, उसे पता था कि महामारी बढ़ी, तो देश की कमज़ोर स्वास्थ्य व्यवस्था उसके मरीज़ों का बोझ नहीं उठा पाएगी. वहीं, पड़ोसी देश उरुग्वे ने सबको स्वास्थ्य सेवा की अपनी नीति के चलते बहुत जल्द देश में राजनीतिक आम सहमति बना ली. इसी वजह से उरुग्वे ने अपने यहां क्वारंटीन को स्वैच्छिक बनाया. दोनों ही देशों ने कोरोना वायरस के प्रकोप को असरदार तरीक़े से रोक पाने में सफलता प्राप्त कर ली. मगर, पराग्वे या उरुग्वे की आबादी, ब्राज़ील के मुक़ाबले बहुत कम है. अगर हम पराग्वे और उरुग्वे की आबादी को जोड़ दें, तो भी ये सख्या पेरू की राजधानी लीमा या ब्राज़ील के साओ पाउलो शहर की कुल आबादी से कम ही है.

जो देश इस वायरस का संक्रमण रोकने में सफल रहे, उन्हें अपनी ताक़त और कमज़ोरियों के बारे में अच्छे से पता था. उनकी आबादी भी अन्य देशों की तुलना में कम थी. और इसी वजह से उनके द्वारा उठाए गए क़दम कोरोना की रोकथाम में प्रभावी साबित हुए.

कौन से उपाय कारगर हो सकते हैं?
एक को व्यवस्थित तरीक़े से वायरस की रोकथाम के उपायों को योजनाबद्ध तरीक़े से लागू करना. और इसके साथ साथ नए आंकड़ों के आधार पर नए उपायों को प्रायोगिक तौर पर लागू करना. कोरोना वायरस के प्रकोप की रोकथाम के लिए दोनों ही तरीक़े अपनाने की ज़रूरत होती है. तभी, रोकथाम की प्रगति की निगरानी सही तरीक़े से की जा सकती है.

जो देश इस वायरस का संक्रमण रोकने में सफल रहे, उन्हें अपनी ताक़त और कमज़ोरियों के बारे में अच्छे से पता था. उनकी आबादी भी अन्य देशों की तुलना में कम थी. और इसी वजह से उनके द्वारा उठाए गए क़दम कोरोना की रोकथाम में प्रभावी साबित हुए. वहीं, बड़े देश अब भी कोरोना वायरस से निपटने के पेचीदा मसलों को समझने में अटके हुए हैं. वो अब भी इस बात का आकलन कर रहे हैं कि वायरस की रोकथाम के लिए जो उपाय किए जा रहे हैं, उनमें किस तरह के ज़ोखिम हैं. कुछ देश ऐसे हैं जो इस स्वास्थ्य संकट के साथ साथ आर्थिक चुनौतियों का भी सामना कर रहे हैं.

आज, लैटिन अमेरिका के अधिकतर देश बाक़ी दुनिया से अलग-थलग हैं. इसका मतलब ये है कि एक तरफ़ तो उन्हें सिर्फ़ अपने देश की जनता की फ़िक्र करनी है. तो, दूसरी तरफ़ इसका एक मतलब ये भी है कि वो इस महामारी से निपटने के लिए अतिरिक्त संसाधन बाहर से नहीं मंगा सकते. जैसे कि टेस्ट किट, सुरक्षा के उपकरण और दवाएं वग़ैरह.

सरकार, निजी क्षेत्र और उद्यमियों के इरादे भले ही नेक हैं. मगर, वो एक साथ मिलकर एक ही लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम कर रहे हों, ये ज़रूरी नहीं है. इसके कारण, किसी भी देश में इन तीनों की सक्रियता भी देश की संरचनात्मक चुनौतियों से पार नहीं पा सकी है. इसीलिए, आपस में सहयोग और तकनीक का अधिक से अधिक इस्तेमाल ही, कोविड-19 की चुनौती से निपटने के स्मार्ट उपाय मुहैया करा सकते हैं.

कोरोना वायरस के खिलाफ जंग जीतने के लिए निजी और सरकारी क्षेत्र के बीच साझेदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. बहुत सी कंपनियां, सरकार के साथ सहयोग करने के लिए उत्सुक हैं. वो ऐसा सिर्फ़ अपना कारोबार बचाने के लिए ही नहीं करना चाहतीं. बल्कि, इस सहयोग के माध्यम से वो अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का भी निर्वहन करना चाहती हैं.

लैटिन अमेरिका में, प्रति व्यक्ति से ज़्यादा ही मोबाइल फोन हैं. लेकिन, इनमें से अधिकतर मोबाइल फोन, स्मार्टफ़ोन नहीं हैं. इसलिए, ऐप्स के ज़रिए बहुत पेचीदा जानकारी जुटाने से समस्या के एक पहलू का निदान हो सकता है. वहीं, दूसरी ओर जनता को जागरूक करने के लिए टेक्स्ट मैसेज की मदद ली जा सकती है. पेरू ने इस दोहरे उपायों को बड़े असरदार और व्यापक तरीक़े से इस्तेमाल किया था. इसी तरह 35 लाख की आबादी वाले कोलंबिया के शहर मेडेलिन ने भी वायरस के संक्रमण के आंकड़े जुटाने और अच्छे उपायों की पहचान करके उन्हें बढ़ावा देने के लिए ऐसी ही रणनीति पर अमल किया. जिसमें स्मार्टफ़ोन और बेसिक मोबाइल फ़ोन दोनों में उपलब्ध सेवाओं का उपयोग किया गया. इनकी मदद से लोगों को खान-पान और नक़दी जैसे संसाधन उपलब्ध कराए गए. और साथ ही साथ भविष्य के हालात और ज़रूरतों का अंदाज़ा लगाने के लिए आंकड़े भी जमा किए गए. और फिर इन आंकड़ों से लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग के सबसे असरदार उपाय अपनाने के लिए प्रेरित किया गया. ये उपाय, शहर की स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था ने अपनाए थे.

कोरोना वायरस के खिलाफ जंग जीतने के लिए निजी और सरकारी क्षेत्र के बीच साझेदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. बहुत सी कंपनियां, सरकार के साथ सहयोग करने के लिए उत्सुक हैं. वो ऐसा सिर्फ़ अपना कारोबार बचाने के लिए ही नहीं करना चाहतीं. बल्कि, इस सहयोग के माध्यम से वो अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का भी निर्वहन करना चाहती हैं. सरकार और निजी क्षेत्र की इन साझेदारियों से इस समस्या का समाधान खोजने में और आसानी ही होगी. क्योंकि, ये महामारी सिर्फ़ सरकार की समस्या नहीं. इसलिए इससे निपटने में समाज के सभी वर्गों को आगे आकर, आपस में मिलकर इसे हराने का उद्यम करना होगा.

सभार- https://www.orfonline.org/hindi/ से

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