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नेता चमचा दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय!

कबीर दास ने जब ये पंक्तियाँ “गुरू गोविंद दोउ खड़े काके लागूँ पाय, बलिहारी गुरू आपकी गोविंद दियो बताय”- लिखी होंगी तब उनको ये भान ही नहीं रहा होगा कि इस देश में एक दिन ऐसा भी आएगा कि गुरू और गोविंद से बढ़कर नेता और चमचों की महिमा गाई जाएगी।

एक विद्यालय में शिक्षक हजार बार कोशिश करके भी बच्चों को गुरू और गोविंद का महत्व नहीं समझा पाया। वो जितना समझाता बच्चे उसे उतना उलझा देते। बच्चों की बाल सुलभ जिज्ञासा यही होती थी कि जब गली-गली में, हर मोहल्ले में, हर घर में इतने नेता हैं तो फिर कोई किसी गुरू के पैर क्यों पकड़ेगा और फिर गुरू का क्या भरोसा कि परमात्मा से मिलवा ही दे। और परमात्मा से मिलकर भी क्या होगा? जो काम नेता और उसका चमचा करवा सकता है वो काम तो परमात्मा सात जनम तक नहीं करवा सकता। अपनी इसी नाकामी की वजह से परमात्मा ने मनुष्य को सात जन्मों की सुविधा दे रखी है कि इस जनम में नहीं तो अगले जनम में, और अगले में नहीं तो फिर अगले जनम में तुझे राशन कार्ड, आधार कार्ड, बैंक एकाउंट, मुफ्त चिकित्सा कार्ड जैसी सरकारी सुविधा मिल ही जाएगी। ये भी हो सकता है कि हर जन्म में एक-एक सुविधा मिलती जाए, इससे तो आदमी के कई जनम ही बेकार हो जाएंगे।

थक हार कर शिक्षक ने आसान रास्ता अपनाया और शिक्षक का ये नवाचार सोशल मीडिया से लेकर सरकारी दफ्तरों तक में वायरल हो रहा है। ये भी संभव है कि राजा अपने मन की बात में इस धाँसू नवाचार की चर्चा करे और शिक्षक को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाए। चैनल वालों ने ये खबर दबा रखी है वो इंतज़ार कर रहे हैं कि राजा इसकी चर्चा करे और वो 24 घंटे टीवी पर इसको लेकर बकवास करें।

शिक्षक ने समझाया कि आज के दौर में नेता और चमचा ही ईश्वर से बढ़कर है। चमचा है तो नेता है और नेता है तो चमचा है। दोनों नाग-नागिन के जोड़े हैं।

शिक्षक ने एक बार फिर इस दोहे को जोर से बोला,

नेता चमचा दोऊ खड़े काके लागूँ पाय,
बलिहारी चमचे की नेता दियो बताय।
शिक्षक ने समझाया, इसमें कवि कहना चाहता है कि चमचा और नेता ही सर्वस्व हैं। अगर नेता और चमचा दोनों खड़े हों तो लोगों को सबसे पहले चमचे का पैर छूने की बजाय उसके पैर ही पकड़ लेना चाहिए। जैसे ही आप चमचे के पैर पकड़ते हैं आप नेता की निगाह में चढ़ जाते हैं और आसपास के लोगों के लिए सम्माननीय बन जाते हैं। चमचा आपको किसी भी समय नेता से मिलवा सकता है और यहाँ तक कि आपके चमचों को भी नेता से मिलवा सकता है। चमचे के पैर पड़ते ही आपके चमचों की संख्या भी चमत्कारिक रूप से बढ़ जाती है।

चमचे की महिमा अपरंपार है। शास्त्रों में हमारे ऋषि-मुनियों ने जानबूझकर चमचों की महिमा का वर्णन नहीं किया क्योंकि वो चमचों से चिढ़ते थे। उस जमाने में ऋषि-मुनियों की चलती थी, अब चमचों की चलती है। इस युग में चमचा होना सौभाग्य की बात है उस युग में चमचों की कोई पूछ ही नहीं थी। उस युग में राजा -महाराजा अपनी प्रजा का हाल जानने और धर्म रक्षा के लिए ऋषि-मुनियों की सेवा लेते थे, आज के दौर के राजा महाराजा, मंत्री, मुख्य मंत्री सब सत्ता चलाने, कमीशन खाने, नियुक्तियाँ करने, टेंडर पास करने, विरोधियों के खिलाफ खबरें चलवाने, ट्रांसफर करवाने जैसे राष्ट्रीय संवैधानिक दायित्वों के लिए चमचों की सेवाएँ लेते हैं।

चमचों का सबसे बड़ा गुण ये होता है कि वे निःशुल्क सेवा देते हैं। अपने शुल्क की वसूली वो नेता और मंत्री की बजाय जनता से कर लेते हैं। इस लेन-देन का फायदा ये होता है कि बगैर किसी कर चोरी के मंत्री से लेकर संतरी तक पैसा पहुँच जाता है। न सरकारी खजाने पर बोझ पड़ता है न कोई हिसाब-किताब रखना पड़ता है। आत्मनिर्भरता का संदेश यहाँ सफल होता दिखाई देता है।

चमचा सर्वगुण संपन्न होता है। नेता में जितने भी दुर्गुण होते हैं, चमचा अपने सद्रुणों से उसको गुणों की खान बना देता है। अगर तुम चमचे को ओवरटेक करके सीधे नेता से मिल भी लोगे तो उसकी आँखें रहस्यमयी तरीके से तुमसे ये सवाल करती रहेगी कि तुम चमचे की परमिशन के बगैर मुझ तक कैसे आ गए। चमचा भारतीय राजनीति का चाणक्य है। चाणक्य को राजाओँ से राष्ट्र हित के जो काम कराने में पसीने छूट गए थे, चमचा बेईमानी और भ्रष्टाचार से जुड़ा कोई भी काम किसी भी मंत्री से झटके में करवा देता है। नेता के जीवन में चमचे का स्थान पत्नी से भी ऊपर होता है। हाल ही में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जिसमें नेताओँ ने चमचों की वजह से पत्नी छोड़ दी, मगर आज तक ऐसा उदाहरण नहीं मिला कि किसी नेता ने पत्नी के लिए चमचे को छोड़ दिया हो।

चमचा सर्वगुण संपन्न होता है। उसे सरकारी टेंडर से लेकर सरकारी खरीदी, ट्रांसफर आदि में विशेषज्ञता हासिल होती है। इस मामले में मंत्री और नेता गूगल से ज्यादा भरोसा चमचे पर ही करते हैं।

शिक्षक द्वारा चमचे की महिमा सुनकर बच्चों ने जोर से ताली बजाई और स्कूल से छूटते ही अपने-अपने मोहल्ले के चमचों की खोज में लग गए।

कार्टून साभार http://cloudninetalks.blogspot.com/ से

साभार – दैनिक अमर उजाला से

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