आप यहाँ है :

बांग्लादेश से सीखिये, बकवास सिखाने वाले स्कूल बंद कीजिए और स्किल सेंटर खोलिये

आप दुनिया के किसी भी मॉल में जाइए, अच्छी क्वालिटी के कपड़े “मेड इन बांग्लादेश” ही मिलेंगे.

भारत में चाहे M&M हो या पैंटालून हो या कोई भी बड़ा फैशन ब्रांड हो उसके भी कपड़े मेड इन बांग्लादेश मिलेंगे.

हमें बांग्लादेश से यह सीखने की जरूरत है. अपनी बढ़ती हुई जनसंख्या का इस्तेमाल किस तरह से किया जाए खासकर महिलाओं का…

बांग्लादेश में टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज में 95% कारीगर महिलाएं हैं और बांग्लादेश के 70% टेक्सटाइल कंपनियां महिलाएं चलाती हैं उसमें सबसे बड़ा रोल #नोबेल_पुरस्कार_विजेता_मोहम्मद_यूनुस का है, जिन्होंने बांग्लादेश में महिलाओं को छोटी बचत करने के लिए प्रोत्साहित किया। उसके बाद उन्होंने जगह-जगह सिलाई केंद्र बनवा कर महिलाओं को मुफ्त में सिलाई सिखाने का प्रशिक्षण दिलवाया।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इंडस्ट्रियल सिलाई मशीन बनाने वाली जापान की दो सबसे बड़ी कंपनी ब्रदर और जुकी की 80% सप्लाई बांग्लादेश को जाती है।

बांग्लादेश में कॉटन होता है। बांग्लादेश में पानी की भी कमी नहीं है और बांग्लादेश की महिलाओं ने सिलाई सीख लिया। यानी कि किसी भी टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए जितने रा मटेरियल चाहिए, वह बांग्लादेश में इंतजाम कर लिया।

उसके बाद शुरुआत में स्वयं सहायता समूह बनाकर ढाका के बाहरी इलाकों में और बांग्लादेश के दूसरे बड़े शहरों में सरकार ने टेक्सटाइल पार्क बनाए। कुछ महिलाओं ने वहां अपने टेक्सटाइल हाउस और एक्सपोर्ट हाउस बनाए।

बांग्लादेश ने शुरू से अपने कपड़ों की क्वालिटी पर ध्यान दिया।

दरअसल बांग्लादेश में सर्वे करके देखा गया तो दो बातें पता चलीं ..पहली बात यह कि भारत का कपड़ा विश्व बाजार में बहुत महंगा है, चीन का कपड़ा विश्व बाजार में बेहद सस्ता है लेकिन चीन के कपड़े में क्वालिटी नहीं है। यानी बांग्लादेश ने यह सोचा कि अगर उसे विश्व के टेक्सटाइल मार्केट पर कब्जा करना है तब उसे भारत जैसी क्वालिटी और चीन जैसा सस्ता बनाना होगा।

उसके बाद बांग्लादेश की सरकार ने बड़े पैमाने पर स्किल्ड वर्कर का इंतजाम किया। सब्सिडी रेट पर सिलाई मशीन सप्लाई की गई। टेक्सटाइल हाउस को कम रेट पर बिजली दी गई। धीरे धीरे बांग्लादेश ने पूरे विश्व के टेक्सटाइल मार्केट पर कब्जा कर लिया। भारत और चीन जैसे बड़े देश देखते ही रह गए …

आज वॉलमार्ट हो या यूरोप का कोई बड़ा माल हो, आप अगर कपड़े के सेक्शन में जाएंगे तब वहां पर मेड इन बांग्लादेश ही मिलेगा।

भारत में एक अलग तरह का कल्चर है। यहां चाहे महिला हो या पुरुष हो, अगर वह ग्रेजुएट या पोस्टग्रेजुएट कर लेता है फिर वह यही कहेगा मोदी हमें कलेक्टर बनाएं। मोदी हमें सरकारी नौकरी दें। मोदी हमें भारत का प्रमुख सचिव बना दें। उसके बाद धीरे-धीरे वह एक फ्रस्ट्रेशन की तरफ बढ़ता जाएगा।

बांग्लादेश में यही मानसिकता नहीं है। बांग्लादेश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में ऐसी मानसिकता नहीं है। वहां हर व्यक्ति रोजगार के लिए खुद के हुनर पर निर्भर करता है। भारत में बीए और एमए को ही लोग हुनर यानी स्किल मारने मानने की भूल कर लेते हैं। यह भूल जाते हैं की ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन रोजगार दिलाने का हुनर नहीं है, बल्कि एक शैक्षणिक योग्यता है।

बांग्लादेश में टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज में काम करने वाली लगभग सभी महिलाएं अनपढ़ हैं, लेकिन उनके अंदर हुनर है यानी कौशल है यानी स्किल है।

शायद मनमोहन सिंह और इंदिरा गांधी राजीव गांधी तथा नेहरू के राज में एक कानून रहा होगा…?? यदि कोई व्यक्ति बीए या MA कर लेगा तब उसे कलेक्टर की नियुक्ति का प्रमाण पत्र दे दिया जाएगा…???

यदि भारत भी पढ़ाई के बजाय स्किल डेवलपमेंट पर ज्यादा फोकस करे.. नए-नए कॉलेज खोलने के बजाय यदि नए-नए स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोले जाएं.. लोगों को टेक्निकल काम की ट्रेनिंग दी जाए… तब भारत की स्थिति बदल सकती है.. और बांग्लादेश ने यही किया…

आज बांग्लादेश की कुल जीडीपी में 20% योगदान टेक्सटाइल का है और पूरे विश्व के टेक्सटाइल सप्लाई में बांग्लादेश की 70% है, जो दुनिया के बड़े-बड़े देशों को हैरान कर दिया है। दूसरी बांग्लादेश की खूबी ये है कि वहां भारत जैसा विनाशकारी विपक्ष नहीं है। बांग्लादेश के स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम को वहां के विपक्ष ने भी पूरा समर्थन दिया।

और भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बर्बाद करने का दूसरा एक कदम कपास की कीमतें हैं। भारत में कपास की न्यूनतम समर्थन मूल्य है.. बांग्लादेश में ऐसा कुछ नहीं है।

टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज को कपास बहुत महंगा पड़ता है । इसलिए कपड़ों की कीमतें बढ़ जाती हैं, लेकिन बांग्लादेश में कपास की कीमत बाजार के हवाले है। वहां सरकार का कोई ऐसा न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं है।

मैं फिर से कह रहा हूं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य एक पल के लिए किसानों को बेहद फायदा नजर आता है लेकिन लंबे समय में यह किसानों के लिए ही नुकसानदेह है। आज स्थिति ऐसी हो गई कि जब धीरे-धीरे सारे टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज बंद हो गए। तब बाजार में कपास की मांग भी घट गई। फिर यदि सरकार किसी चीज की कीमत तय भी कर दे लेकिन यदि बाजार में डिमांड नहीं रहेगी तब उसे कोई खरीदेगा नहीं।

साभार- https://www.facebook.com/LaurelHighConventSchool/ से

image_pdfimage_print


Leave a Reply
 

Your email address will not be published. Required fields are marked (*)

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

सम्बंधित लेख
 

Back to Top