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भूतपूर्व प्रेमिकाओं को पत्र

(वर्ष 2016 स्वर्गीय शरद जोशी की 85वीं सालगिरह का वर्ष है. वे आज होते तो मुस्कराते हुए अवश्य कहते, देखो, मैं अभी भी सार्थक लिख रहा हूं. यह अपने आप में कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि अर्सा पहले जो वे लिख गये, वह आज की स्थितियों पर मार्मिक टिप्पणी लगता है. शरदजी के पाठक-प्रशंसक इस वर्ष को उन्हें लगातार याद करते हुए मना रहे हैं. वर्ष के पहले महीने में ‘नवनीत’ उन्हें याद करके यादों की इस शृंखला की शुरूआत कर रहा है.)

देवियो, माताओ और बहनो,

अब मात्र यही सम्बोधन शेष बचे हैं जिनसे इस देश में एक पुराना प्रेमी अपनी अतीत की प्रेमिकाओं को पुकार सकता है. वे सब कोमल मीठे शब्द, जिनका उपयोग मैं प्रति मिनट दस की रफ़्तार से नदी-किनारों और पार्क की बेंचों पर तुम्हारे लिए करता था, तुम्हारे विवाह की शहनाइयों के साथ हवा हो गये. अब मैं तुम लोगों को एक भाषण देने वाले की दूरी से माता और बहन कहकर आवाज़ दे सकता हूं. वक्त के गोरखनाथ ने मुझे भरथरी बना दिया और तुम्हें माता पिंगला. मैं अपनी राह लगा और तुम अपनी. आत्महत्या न तुमने की, न मैंने. मेरे सारे प्रेमपत्रों को चूल्हे में झोंक तुमने अपने पति के लिए चाय बनायी और मैंने पत्रों की इबारतें कहानियों में उपयोग कर पारिश्रमिक लूटा. ‘साथ मरेंगे, साथ जियेंगे’ के वे वचन, जो हमने एक-दूसरे को दिये थे, किसी राजनीतिक पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र के किये गये वायदों की तरह खुद हमने भुला दिये. वे तीर, जिनसे दिल बिंधे थे, वक्त के सर्जन ने निहायत खूबसूरती से ऑपरेशन कर निकाल दिये और तुम्हारी आंखें, जो अपने ज़माने में तीरों का कारखाना रही थीं, अब शांत और बुझी हुई रहने लगीं, मानो उनका लाइसेंस छिन गया. मेरी आंखों पर अब मायनस पांच का चश्मा लग गया है, यानी अब मेरे-तेरे प्रेम के सभी खोके खाली हो गये, बांसुरिया बिक गयी. और इश्क का झंडा, जो हमने वायदों की डोर से खींचकर ऊपर चढ़ाया था, पुत्र-जन्म के बिगुल के साथ नीचे उतार दिया गया.

मेरी एक्स-प्राणेश्वरी कुंतला (मैं तुम्हारा वास्तविक नाम शकुंतला नहीं लिखता क्योंकि तुम्हारे उस झक्की पति को पता लग जायेगा), तुम मेरी ज़िंदगी में तब आयी थीं, जब मुझे ‘प्रेम’ शब्द समझने के लिए डिक्शनरी टटोलनी पड़ती थी. पत्र-लेखन मैं एक्सरसाइज़ के बतौर करता था. घर की देहरी पर बैठा मैं मुगल साम्राज्य के पतन के कारण रटता और तुम सामने नल पर घड़े भरतीं या रस्सियां कूदतीं. मानती हो कि मैंने अपनी प्रतिभा के बल पर तुम्हें आंखें मिलाना और लजाना सिखाया. दरवाज़े के पीछे छिप तुमने पहली बार कोमल निगाहों से बंदे को ही देखा था. ताश की गड्डी छीनने के बहाने मैंने तुम्हारा हाथ पहली बार पकड़ा और नोचने के लिए गाल पहली बार छुआ. उन दिनों तुम्हारे-मेरे बीच जो गुज़रा वह किसी घटिया फिल्म से कम नहीं था, पर फिर भी अपने-आपमें बॉक्स ऑफिस था. मेरी जान, मैंने ही तुम्हें आईने का मतलब समझाया, मेरी वजह से तुमने दो चोटियां कीं और रिबन बांधे. मैंने तुम्हें ज्योमेट्री सिखाते वक्त बताया था कि यदि दो त्रिभुजों की भुजाएं बराबर हों तो कोण भी बराबर रहते हैं और सिद्ध भी कर दिखाया था. पर वह गलत था. बाद में तुम्हारे पिताजी ने मुझे समझाया कि अगर दहेज बराबर हो तो कोण भी बराबर हो जाते हैं और भुजाएं भी बराबर हो जाती हैं. मैं अपने बिंदु पर परपेंडिक्यूलर खड़ा तुम्हें ताकता रहा और तुम आग के आसपास गोला बना चतुर्भुज हो गयीं.

तुम चली गयीं तो बंदा कविता पर उतर आया. सोचता था छपेंगी तो तुम पढ़ोगी और पढ़ोगी तो रोओगी. पर ऐसा नहीं हुआ. वे सब सम्पादक के अभिवादन व खेद सहित लौट आयीं. उन दिनों हिंदी साहित्य छायावाद छोड़ चुका था और मायावाद में फंस चुका था. कौन पूछता मेरे विरह-गीतों को! खैर, बीत गयीं वे बातें. अब तो तुम्हारे उन सुर्ख गालों पर वक्त ने कितना पाउडर चढ़ा दिया! जिन होंठों के अचुंबित रहने का रिकार्ड बंदे ने पहली बार तोड़ा था, उन पर तुम्हारे पातिव्रत्य की आज ऐसी लिपस्टिक लगी है, जैसे मेरी कविता की कॉपी पर धूल की तहें. सुना है, अब तुम बहुत मुटा गयी हो, तुम्हारी पीठ में दर्द रहने लगा है. आज जब अपने बच्चों को स्कूल और अपने ठेकेदार पति को पुल का निर्माण देखने रवाना कर तुम सोफे पर लेटी यह पत्रिका पढ़ रही हो, मैं तुमसे पूछूं कि क्या तुम्हें याद है ओ ठेकेदारनी कि, कभी एक पुल बनाने का, दो किनारे जोड़ने का ठेका तुमने भी लिया था. कभी याद आये तो ‘रतन’ फिल्म के पुराने गानों का रिकार्ड सुन लिया करो, जिन्हें कभी तुम मुझे सुनाते हुए गाती थीं.

और फिर नलिनी तुम आयी. प्रथम वर्ष कला में जमा हुई छब्बीस लड़कियों में तुम अलग ही नज़र आती थीं. सारी क्लास तुम पर मरती थी और चूंकि मैं छात्र-सभा के लिए कक्षा का प्रतिनिधि चुना गया था, अतः मैं प्रतिनिधि रूप से तुम पर मरता था. कॉलेज के लम्बे आम के वृक्षों वाले रास्ते पर तुम्हारी साइकिल के पीछे साइकिल चलाना, कक्षा में ऐसे कोण पर बैठना, जहां से तुम्हारा प्रोफाइल आंखों को भाये, ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रोफेसर से उल्टे-सीधे प्रश्न करना, बस-स्टॉप पर तुम्हारी राह देखना, किताब मांगना आदि सब नुस्खे आज़माकर मैंने तुम्हें बता दिया कि मैं प्रेम के लिए इस वक्त बिल्कुल अधीर हूं. बड़ी मुश्किलों से तुमने मुझे देख मुस्कराना मंजूर किया और ऐतिहासिक था वह दिन, जब पहली बार तुमने मेरे साथ चाय पी. तुम वे सब हथकंडे जानती थीं, जिनसे लड़के लट्टू की तरह चक्कर खाते हैं और मैं कहानी-उपन्यासों में पढ़े सारे दांव-पेच तुम पर फिट करने की सोचता था. तुम अधिक व्यावहारिक थीं. मैं इसलिए प्रेम करता था कि मुझे एक जीवन-साथी को खुद तलाश करना बड़ा ज़रूरी लगता था और तुम मुझे यों उलझाये थीं कि कोई आशिक बना रहे तो बुरा क्या है! तुम तो सदैव अपने सौंदर्य का प्रदर्शन किया करती थीं, मेरे प्रेम को एक सर्टीफिकेट की तरह कमरे में टांगकर खुश थीं. अपनी सहेलियों को शान से बताती थीं कि हम पर भी लोग कुर्बान हैं. मेरी उम्मीदवारी ने तुम्हारे अहं की तुष्टि की. इसलिए जब मैं रात-भर जागकर तुम्हारे लिए नोट्स बनाता था, तुम कोई पिक्चर देखती रहती थीं. तुम अपने पिताजी के पैसों से साड़ियां खरीदतीं और मैं अपने पिताजी के पैसों से तुम्हारे लिए किताबें. हर बार तुमने बिल मुझसे चुकवाया और इतमीनान से घूमती रहीं. मैं प्रेम करने आया था, तुमने मुझे नौकरी करना सिखा दिया. उसी लगन से पढ़ता तो फर्स्ट क्लास लाता और कहीं बड़ी नौकरी मिल जाती. जल्दी ही मैं समझ गया कि आदर्श प्रेमी का जो चित्र तुम्हारे दिमाग में है वह आदर्श नौकर के चित्र से कम नहीं है.

मैं भाग खड़ा हुआ. बिला वजह तुमसे नाराज़ हो लिया. मैंने ठीक किया. कहीं तुमसे शादी हो जाती तो मेरा हाल भी वही होता जो आज आपके प्रोफेसर पति महोदय का है. दिन-भर ट्यूशनें करता है, रात को जागकर नोट्स लिखता है, विश्वविद्यालयों के ‘हेड ऑफ दि डिर्पामेंट्स’ की खुशामद करता है कि कापियां जांचने को मिल जायें और अपनी किताब कोर्स में लगाने को दौड़-धूप करता है. यह नकेल जो तुमने उसको डाली है तुम मुझे डालतीं और मुझे कहीं का नहीं रखतीं. मैं आज तुम्हारे पति होने की कल्पना से कांप उठता हूं, यद्यपि पहले मैं समझता था कि तुम मिल जाओ तो सुखों की लॉटरी खुल जाये. तुमने उस क्रिकेट-खिलाड़ी को भी खूब बुद्धू बनाया. वह तुम्हारे प्रेम के पिच पर रन करता रहा और एक दिन तुम उसका भी स्टंप उखाड़कर चल दीं.

मेरी निहायत अस्थायी प्रेमिका, तुमने कुछ ही दिनों में मुझे बता दिया कि शेरो-शायरी का प्रेम से कोई सम्बंध नहीं. यह एक व्यवस्था है और न हो सके, तो निराशा की कोई वजह नहीं. इंसान को कोशिश नहीं छोड़नी चाहिए. वास्तविक प्रेम जीवन में एक बार ही नहीं, बार-बार तथा हर बार होता है. एक दफ्तर में नौकरी न मिले तो उम्मीदवार हताश नहीं होता, वह दूसरी जगह एप्लाई कर देता है. तुम्हारे दफ़्तर से अपना आवेदन हटा मैंने चंद्रा झा के दफ़्तर में लगा दिया. वहां भी मंजूर न होता तो कहीं और लगा देता. एक शहर में गुच्छा-गुच्छा सुंदर लड़कियां होती हैं. हर लड़की एक फार्मूले की ज़िंदगी जीती है. चुस्त कपड़े, कान में बाली, लटें, धीरे-धीरे चलना और उड़ती नज़र से देखना, घुटनों पर हाथ बांध बैठना, सब एक-सा है. सभी जगह लड़कियां एक ही फार्मूले पर चलती हैं, पर फिर भी लड़के उसे समझ नहीं पाते और हर एक को अलग देखते हैं. यही फार्मूले गालिब के ज़माने में भी चलते होंगे और कालिदास के भी. वास्तव में हम एक फार्मूले से उलझ जाते हैं और प्रेम की महामारी के शिकार होते हैं.

चंद्रा झा रवींद्र-साहित्य पढ़े बैठी थी, अतः चार दिन में समझ गयी कि मैं उस पर निछावर हूं. मैंने सबसे पहले उसे मॉडर्न बनाया. अज्ञेय पढ़ाया, ‘गुनाहों का देवता’ की प्रति भेंट की, कृश्नचंदर की चाशनी चटायी, अमृता प्रीतम की कविताएं सुनायीं, बच्चन को कवि-सम्मेलन में बुलवाया, ‘तार सप्तक’ पर बहसें कीं और इलाहाबादी पत्रिकाओं की फाइल सौंपकर कहा- ‘चंद्रा रानी, छायावाद का चक्कर छोड़ और प्रयोगवाद में आ, क्या खयाल है मेरे विषय में. हिंदी का भविष्य मेरी जेब में है और तेरा वर्तमान मेरे हृदय में.’ नलिनीदेवी, जब आप टेबल-टेनिस खेलती थीं, ठीक उसी वक्त मैं लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर चंद्रा से बात करता रहता था और तुम देखती रहीं कि मैं एकाएक तुम्हारी साइकिल के पीछे साइकिल चलाना छोड़, चंद्रा के साथ सिटी-बस से जाने लगा.

चंद्रा देवी, मेरे जीवन का अंतिम क्लासिक किस्म का प्रेम आपसे हुआ. मुझे माताओं, बहनों और देवियों को आवाज़ लगाते समय आज आपको भी जोड़ते हुए बड़ी पीड़ा हो रही है. मुझे लगता है कि तुम जैसी लड़की का जन्म स्मिार्फ़ प्रेम के लिए ही होता है. ऐसी लड़कियां प्रेम को एक पीड़ा की तरह ग्रहण करने की आदी होती हैं. जब भी मिली, शिकायत करती मिली. ‘देर से क्यों आये’, ‘आज मैंने यह साड़ी पहनी तुमने कुछ कहा भी नहीं’, ‘आज हम हिंदी क्लास से बाहर आ रही थीं तो देखा नहीं मेरी तऱफ और सीधे चले गये’ वगैरह.

हर क्षण मुझे परीक्षा में बैठना पड़ता था. प्रतिदिन मार्क्स मिलते थे और मैं फेल होता था. तुमने मुझसे बड़ा साहित्य रचवाया. मुझे लूटा और हिंदी साहित्य समृद्ध किया. अगर मैं तुमसे नहीं मिलता तो हिंदी का पिछला दशक कैसा सूना-सूना रहता! प्रतिदिन डाक आती, प्रतिदिन कार्ड डाले जाते. तुम्हारे घर का वह ऊपर का कमरा प्रेम और साहित्य, दोनों के इतिहास में महत्त्व रखता है. वहीं पर मैंने आंसू बहाये और तुमने दर्द की कविताएं लिखीं. वहीं दरवाज़े से टिककर नये साहित्य के गूढ़ प्रश्न सुलझाये और उंगलियां उलझायीं. वहीं पर हमने दुप्रवृत्तियों को कोसा और एक-दूसरे को चाहा. वहीं पर तुम ऊपर उठीं और मैं खिड़की से नीचे गिरा. तुम अपने चाचा की मदद से स्कॉलरशिप ले विदेश चल दीं और मैं सह-सम्पादक हो गया एक दैनिक अखबार में. पत्र तुम मुझे कम लिखने लगीं. फिर मुझे पता लगा कि दूतावास के एक कल्चरल अटैची से तुम अटैच हो गयीं और मैं इसी शहर में घूमता रहा.

माताओ और बहनो, प्रेम शब्द अब मेरे लिए एक मार्केट वेल्यू रखता है. मैं प्रेम पर लिखता हूं, जिसे लोग प्रेम से पढ़ते हैं और सम्पादक प्रेम से पारिश्रमिक देता है. प्रेम पर उपन्यास लिखो तो पॉकेट बुक में छप जाता है. यह सिक्का है, जिसकी साख है. इसे रोज़ चलाता हूं. आप देवियों के पावन सम्पर्क से जो प्राप्त हुआ, वह मैंने साहित्य को भेंट चढ़ा दिया. अब बार-बार उसी को दोहराता हूं. ताज़गी लाने के लिए लड़कियां घूर लेता हूं. दूसरों के साथ गुज़री घटनाओं को रस ले-लेकर पीता हूं. शादी हो गयी है, दो बच्चे हैं. दफ़्तर जाता हूं और आता हूं. कुछ बाल यहां-वहां सफेद हो रहे हैं, अतः अब डिमॉरलाइज़ भी होने लगा हूं. प्रेमकांड करने का मूड जा रहा है. समाज में प्रतिष्ठा बढ़ गयी है, उसके गिरने का भय है. आज महिलाओं की सभा में रामायण पर बोलने का निमंत्रण है और वहां मैं आदर्श प्रेम की व्याख्या करूंगा. उन्हें प्रभावित करूंगा और वे मेरा सम्मान करेंगी. एक तुष्टि होगी उससे. कुंतला जब पानी भरते हुए मुझे देखती थी या चंद्रा जब कॉपी पर बच्चन की एकाध पंक्ति लिख देती थी, मुझे मीठा संतोष होता था. तब मैं प्रेमी था और आज प्रेम का विशेषज्ञ, जो मार्गदर्शन देता है.

कई बार अनुभव करता हूं, मेरा ईमान कहता है कि अपनी लिखी प्रेम-कथाओं के पारिश्रमिक का अंश मुझे आप लोगों को भेजना चाहिए, पर नहीं भेजता. आपसे प्रेम कर जो लाभ मुझे मिला वह यही है.

मैं मानता हूं कि प्यार अमर है और अगर नहीं है, तो बराबर इंजेक्शन लगा अमर रखा जाना चाहिए. खाल में भूसा भरकर कमरे में लटका देने से जैसे शेर अमर हो जाता है, वैसे ही प्यार भी अमर रहता है. मेरा आप तीनों से प्यार बिलकुल नहीं मर सकता. आज भी आप लोग चाहें तो इस प्यार को अमर बनाये रखने के लिए कुछ कर सकती हैं.

कुंतला, मुझे तुम अपने बच्चों की ट्यूशन पर क्यों नहीं लगा लेती? तुम तीनों बच्चों के लिए अस्सी रुपये उस मास्टर को देती हो. मैं तुम्हारे बच्चे पढ़ा दूंगा, मुझे दिया करो वे रुपये. विश्वास दिलाता हूं कि मेरा प्रेम अब अपनी मजबूरियां समझता है और पवित्र रहेगा. प्राचीन काल में रानियां अपने पुराने प्रेमियों को राजा से कहकर अच्छी नौकरी दिला देती थीं, क्या तुम इतना नहीं कर सकतीं? सच कहता हूं कि एक शांत मास्टर की तरह घर आऊंगा. प्रेम की तीव्रता से अधिक ज़रूरी है कि अस्सी की आमदनी निरंतर बनी रहे. तुम चाहो तो मुझे यह सेवा सौंप दो. तुम्हारे प्रेम की सौगंध, मैं ईमानदारी और लगन से काम करूंगा.

नलिनी, तुमसे क्या कहूं, शायद तुम मानोगी नहीं, मुझे भूल न गयी हो, ऩफरत न करती हो और प्रेम का ज़रा भी अंश, ज़रा भी स्मृति शेष हो तो मुझ पर एक कृपा कर दो. तुम्हारे पति मेरे बॉस के बहुत गहरे दोस्त हैं. तुम्हारे घर अक्सर मेरे बॉस आते हैं और तुम उनके घर जाती हो. (हमारी कम्पनी के कर्मचारियों में इसे लेकर बड़ी अ़फवाह भी है.) क्या तुम मेरे बॉस से कहकर मेरा प्रमोशन नहीं करवा सकतीं? तुम्हारा-मेरा प्यार है और अमर रहेगा. मेरी आर्थिक स्थिति अगर खराब भी रही तो भी मैं तुम्हें सदा याद करूंगा और तुम्हारे सुख की कामना करूंगा, पर यदि मुझे प्रमोशन मिल जाये, तुम्हारे स्नेह के कारण मिल जाये, तो सच मानो मैं तुम्हें सदैव दुआएं दूंगा. आठ साल से उसी पद पर सड़ रहा हूं, पर मेरी कोई स़िफारिश नहीं है. तुमसे सुंदर, तुमसे कोमल और तुमसे अधिक प्रभावशाली स़िफारिश मेरी कम्पनी के मालिक के लिए कोई और नहीं होगी. अपनी स्नेहमयी बांहों से मुझे उबारो नलिनी, तुम्हारा-मेरा प्यार अमर है.

और चंद्रा, तुम चाहो तो क्या नहीं कर सकतीं? तुम्हारी पहुंच विदेश विभाग तक है. मुझे कोई अच्छी-सी नौकरी दिला दो. मेरे साथ बिताये उन सुखद दिनों को यदि भूल नहीं गयीं, यदि तुम्हारा प्रेम झूठा नहीं था, तो मेरे लिए वहां दिल्ली में कोई काम खोज दो. तुम्हारे पति अपने दूतावास से बहुत-सा काम देते हैं, अनुवाद और लेखन आदि का. तुम मेरी लेखनी पर पागल रही हो, क्या तुम्हें खयाल नहीं आता कि तुम मेरी आज मदद कर सकती हो? मैं तुम्हें प्यार करता हूं, चंद्रा! तुम्हारी याद में रात-रात-भर सो नहीं पाता. यदि अनुवाद का काम मिल जाये तो रात को वही कर डाला करूं. चंद्रा, तुम मुझे भूली नहीं होगी.

प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीब की पीड़ा उससे भी गहरी होती है. तुम मेरी एक पीड़ा दूर नहीं कर सकीं, तुम मेरी दूसरी पीड़ा दूर कर सकती हो. मैंने कॉलेज के दिनों में प्रेम किया, पर अब एक बी.ए. पास क्लर्क की कतिपय महत्त्वाकांक्षाएं ही मुझमें शेष हैं कि मैं और मेरे बाल-बच्चे सुखी रहें. तुम्हारे दरवाज़े पर अपनी पुरानी मुहब्बत गिरवी रख मैं यह पत्र लिख रहा हूं.

सदैव तुम सबका

साभार- http://www.navneethindi.com/ से



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