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लफ़्जों के फूल, ग़ज़ल और शायरी द्वारा भावभीनि श्रृद्धांजलि

साक्षी-सियेट द्वारा मशहूर शायर निदा फाज़ली व गांधी जी की स्मृति में कार्यक्रम का आयोजन!!

नई दिल्ली। भाषा की सादगी और शब्दों का तालमेल ऐसा समागम है, जो माहौल को एक फूल की खुश्बू की तरह महका देता है। विशेष रूप से जब यह तालमेल हो हिन्दी एवम् उर्दू भाषा में पिरोयी शायरी या ग़ज़ल का। लफ़्ज़ों के फूल की खुश्बू फैलाता कुछ ऐसा नज़ारा देखने को मिला दिल्ली स्थित इंडिया हेबीटेट सेंटर में, जहां साहित्य व संगीत क्षेत्र में एक मुकाम कायम कर चुकी कुछ हस्तियों ने शायरी व ग़ज़ल के माध्यम से गीत-संगीत के शाहकार ‘निदा फाज़ली’ को श्रृद्धांजलि प्रदान की। मौका था गैर-सरकारी संगठन साक्षी-सियेट द्वारा आयोजित संध्या ‘लफ़्ज़ों के फूल’ का।

डाॅ. मृदुला टंडन द्वारा प्रस्तुत इस शायरी व संगीतमयी संध्या का आयोजन गांधी जयन्ती व वर्तमान समय में अशांत माहौल और प्रख्यात शायर व गीतकार निदा फाज़ली को श्रृद्धांजलि अर्पित करने के उद्देश्य से किया गया था। जहां लक्ष्मी शंकर बाजपयी, सुबोध लाल, नाज़िम नक्वी व कवियत्रि ममता किरण एवम् ग़ज़लकार शकील अहमद ने फाज़ली साहब की रचनायें प्रस्तुत करके उन्हें भाव-भीनी श्रृद्धांजलि दी और गांधी जयन्ती की पूर्व संध्या पर संगीत द्वारा शांति का संदेश दिया।

कार्यक्रम की शुरूआत पारम्परिक अंदाज में दीप प्रज्जवलित करके हुई। जिसके बाद डाॅ. मृदुला टंडन के इस आयोजन से उपस्थित श्रोताओं को रूबरू कराया। इसके बाद नाज़िम नक्वी ने निदा फाज़ली के साथ जुड़ी अपनी यादों को साझा किया व उनके सफर से सभी को रूबरू कराया। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम का शीर्षक फाज़ली साहब को श्रृद्धांजलि देने के लिए सवोत्तम है क्योंकि उनके पहले संकलन का नाम ‘लफ़्जो़ के फूल’ ही था। उन्होंने कहा कि लगभग 30-35 सालों के मरासिम रहे हैं हमारे। मुझे लगता है कि एक शख्सियत को समझने के लिए विशेष रूप शायरी या साहित्य जगत के व्यक्तित्व को जानने के लिए उसकी रचनाये व काम सशक्त हैं जिनके माध्यम से महसूस किया जा सकता है। जिसके बाद उन्होनें निदा फाज़ली की रचना ‘एक लड़की’ प्रस्तुति की। ‘जब तलक वह जिया’ व ‘छोटी सी एक शाॅपिंग’ उनकी अन्य प्रस्तुति रहीं।

कवियत्री ममता किरण ने ‘खिलौने’ से शुरूआत करते हुए उनकी दो-तीन रचनायें प्रस्तुत की। उनके बाद कवि सुबोध लाल ने अपने अनुभव साझा किये और ‘लफ़्जों के फूल’ की खुश्बू को और महकाया। सत्र के अंतिम कवि रहे लक्ष्मी शंकर बाजपयी। उन्होंने बताया कि हमेशा जिंदगी की बात करने वाले, दुनिया को बदलने की बात करने वाले शायर व्यक्तित्व थे वे। बाजपयी ने दो नज़्में ‘कितने दिनों के बाद मिले हो..’ व ‘हुआ सवेरा, ज़मीन पर फिर अदब से आकाश अपने सिर को झुका रहा है.. बच्चे स्कूल जा रहे हैं..’ प्रस्तुत की और इस सफर के दौरान दो ग़ज़ल भी प्रस्तुत की।

शायराना महफिल के अंदाज को आगे बढ़ाया ग़ज़ल गायक शकील अहमद ने। उन्होंने फाज़ली साहब की कुछ अनसुनी रचनायें भी प्रस्तुत की। शकील अहमद ने ‘वृंदावन के कृष्ण-कन्हैया अल्लाह हू..’, ‘दिल में ना हो जुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती..’, ‘बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां..’, ‘मंदिर भी था उसका पता, मस्ज़िद भी थी उसकी खबर..’ ‘बदला ना अपने आपको जो थे वही रहे..’ और ‘होशवालों को खबर क्या..’ आदि ग़ज़लें प्रस्तुत की। उनकी शानदार गायकी में साथी कलाकारों शौकत हुसैन, अनीस अहमद व अलीम खान ने बखूबी साथ निभाया।

कार्यक्रम की आयोजक डाॅ. मृदुला टंडन ने कहा कि निदा फाज़ली का जन्मदिवस यूं तो 12 अक्टूबर को होता है लेकिन गांधी जयंती का अवसर है और बापू व निदा दोनों ही शांतिदूत समान थे और वह हमेशा इंसानियत व शांति की पहल को तवज्जो देते थे। वहीं शायरी व ग़ज़ल की तहजीब हमें बहुत कुछ सिखाती है, ऐसे में इससे उम्दा अवसर नहीं था, जहां लफ़्ज़ फूलों के रूप में बरसें और शांति का संदेश भी प्रसारित करें। साक्षी-सियेट द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम आज की तेज-तर्रार जिंदगी में खोती जा रही संस्कृति की महक एवम् गंगा-जमुनी तहजीब के प्रचार-प्रसार का भी प्रयास था।



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