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संघर्ष और सफलता की खुली पुस्तक है गीतकार संदीप नाथ

ऐसा बहुत कम होता है जब सफलता के शिखर पर स्थापित कोई व्यक्ति सहजता, सरलता और पूरी आत्मीयता से गिनती के सुधी श्रोताओं के बीच पूरे धैर्य, शालीनता और विनम्रता से अपने संघर्ष से लेकर सफलता की दास्तान सुनाता है। फिल्मी गीतकार संदीप नाथ को सुनना एक ऐसा ही विरल व रोमांचक अनुभव था। उनके संघर्ष और सफलता की गाथा इतनी रोचक और रोमांचक थी कि बीच बीच में श्रोताओं द्वारा उठाए जा रहे सवाल और जिज्ञासा भी बाधा बन रहे थे।

बचपन में फिल्मी गीतों की धुन पर गीत लिखना और उनको गाने के शौक ने संदीप नाथ को आज एक स्थापित गीतकार के रूप में स्थापित कर दिया है।

चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई की साप्ताहिक बैठक में सिने गीतकार संदीप नाथ ख़ास तौर से पधारे। केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट गोरेगांव के सभागार में मौजूद साहित्यकारों, कलाकारों और काव्य प्रेमियों की मौजूदगी में उन्होंने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और अपनी सिने यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला। अपनी फ़िल्मों पेज़ थ्री, फ़ैशन, पान सिंह तोमर आदि से जुड़े उन्होंने रोचक संस्मरण सुनाए। स्वर कोकिला लता मंगेशकर से अपनी मुलाकात का उन्होंने हृदयस्पर्शी चित्रण किया।

उत्तर प्रदेश के बंगाली परिवार में जन्मे संदीप नाथ ने 8 साल की उम्र में डायरी में गीत लिखना शुरु कर दिया था। बिजनौर में उन्होंने शेरों शायरी की बारीकियाँ सीखी। वहाँ शायरों की महफिल होती थी जिसमें आसपास के रईसों से लेकर गरीब से गरीब व्यक्ति तक अपनी शेरो शायरी सुनाता था और सभी सुनते भी थे। वकालात की पढ़ाई के बाद दिल्ली चले गए और वहाँ वकालात करने के साथ साथ जेवीजी टाईम्स में पत्रकारिता भी करने लगे। फिर बड़ौदा आ गए और यहाँ से क दिन अचानक मुंबई चले आए। मुंबई में न किसी से जान पहचान थी न कोई ठिकाना था। चलती गाड़ी में एक यात्री ने रहने के लिए आर्य निवास लॉज का पता दिया जहाँ 100 रुपये दो समय खाना और चाय की व्यवस्था थी। लेकिन इसके लिए किसी ऐसे व्यक्ति की चिठ्ठी जरुरी थी, उन्होंने कहा कि चिठ्ठी तो थी मगर गुम गई।

खैर, जैसे तैसे रहने की व्यवस्था हो ही गई। कुछ दिन मुंबई में भटकते रहे और एक दिन एक परिचिनत ने उन्हें एक विज्ञापन एजेंसी में एक गीत लिखने का काम दिलवाया। संयोग से उनका गीत एजेंसी को पसंद आ गया। उसकी रेकॉर्डिंग भी हो गई और इसके 15 हजार रुपये भी मिले। इससे उनको एहसास हो गया कि एक पेन में कितनी ताकत होती है। इसी बीच मनीषा कोईराला के भाई से पहचान हो गई और उससे मिलना जुलना चलता रहा। गाँव के किसी परिचित का भांजा रामगोपाल वर्मा के यहाँ काम करता था, उसके माध्यम से लंबी जद्दोजहद के बाद उससे मुलाकात हुई और उसके माध्यम से रामगोपाल वर्मा तक जा पहुँचे।रामगोपाल वर्मा ने तीन प्लॉट सुझाए और कहा कि इनमें से किसी एक पर गीत लिखना है, सबसे कठिन वाला प्लॉट चुना और इसके लिए रामगोपाल वर्मा ने उन्हें 11 हजार का चैक भी दे दिया। एक दिन अचानक समीर टंडन से मुलाकात हो गई। उनके माध्यम से मधुर भंडारकर तक जा पहुँचे और उनकी फिल्म पेज 3 के लिए गीत लिखा। ये गीत लता मंगेशकर को गाना था और इसी बहाने लताजी से भी मुलाकात हो गई।

इसके बाद तो गीत लिखने का सिलसिला चल निकला। संदीप नाथ बताते हैं। फिल्म के लिए लिखने के लिए आपके अंदर संचेतना होना चाहिए, आप सोचकर फिल्म के लिए नहीं लिख सकते। आप किसी दृश्य और स्थिति को लेकर जितने गहरे डूबते हैं उसी हिसाब से आपकी संचेतना गीत को जन्म देती है।

संदीप नाथ से हुए इस संवाद के सूत्रधार जाने माने शायर गीतकार और मुंबई के हिंदी जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले देवमणि पाण्डेय लिखते हैं –

सिने जगत में गीत लेखन की चुनौतियों पर चर्चा करते हुए संदीप ने कहा कि एक कवि और एक गीतकार में फर्क़ होता है। गीतकार को सिचुएशन, चरित्र और फ़िल्म की कहानी के अनुसार गीत में कविता को पिरोना पड़ता है। इसलिए सिने गीत कविता से आगे निकल जाता है। संदीप नाथ से श्रोताओं की रोमांचक चर्चा हुई। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया की इजी और ऑर्डिनरी यानी सरल और साधारण में फर्क़ होता है। सरल भाषा में अच्छा गीत लिखना जो सबकी समझ में आए बड़े हुनर का काम है। चर्चा के बाद कविता पाठ का सत्र चला जिसमें संदीप नाथ ने अपनी चुनिंदा ग़ज़लें और कविताएं सुनाईं। सभागार में मौजूद कुछ प्रमुख कवियों ने भी कविता पाठ किया।

उत्तर प्रदेश के एक बंगाली परिवार में जन्‍मे लोकप्रिय सिने गीतकार, कवि और लेखक संदीप नाथ ने बॉलीवुड की कई हिट फ़िल्मों को अपने ख़ूबसूरत गीतों से सजाया है। नेशनल अवार्ड विजेता फ़िल्म पेज़ थ्री, फैशन, कॉरपोरेट, सांवरिया, पान सिंह तोमर, आशिकी 2 और सिंघम रिटर्न जैसी कई कामयाब फ़िल्मों में उनके गीत शामिल हैं। देश के कई बड़े साहित्यिक आयोजनों में काव्य पाठ कर चुके संदीप नाथ का एक ग़ज़ल संग्रह और एक काव्य संग्रह प्रकाशित है।

बतौर सिने गीतकार ‘भूत’ (2003) संदीप नाथ की पहली फ़िल्म है। पैसा वसूल, एक हसीना थी और रक्त जैसी फिल्मों के बाद मधुर भंडारकर की फ़िल्म ‘पेज़ थ्री’ में संदीप ने पांच गीत लिखे। तीन गीत बहुत लोकप्रिय हुए। वो गीत थे- लता जी का गाया “कितने अजीब रिश्‍ते हैं यहां पे…”, आशा जी का गाया “हुज़ूर हुज़ूरे आला… और सपना अवस्‍थी का गाया “कुवां मां डूब जाउंगी….” बहुत हिट हुए। इस फिल्‍म को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिला।

संजय लीला भंसाली की फिल्‍म ‘सांवरिया’ में संदीप ने एक गीत लिखा-” यूं शबनमी पहले नहीं थी चांदनी”। इसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्‍ठ गीतकार का स्टारडस्ट अवॉर्ड मिला। सरकार, सरकार राज, कॉर्पोरेट, फैशन, जेम्स, साहब बीवी गैंग्‍स्‍टर, पान सिंह तोमर, बुलेट राजा, साहेब बीवी और गैंग्स्टर रिटर्न्स आदि फ़िल्मों में भी संदीप ने बढ़िया गीत लिखे। “फैशन का है ये जलवा”, “ओ सिकंदर”, “लम्‍हा-लम्‍हा जिंदगी”, “रात मुझे कहकर चिढ़ाये” जैसे उनके कई गीत बहुत पसंद किए गए। यूट्यूब पर संदीप नाथ के ऐसे कई गीत मौजूद हैं जिनमें उन्होंने बतौर गीतकार, संगीतकार और गायक अपने फ़न का जलवा दिखाया है।

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