आप यहाँ है :

महाराज पांडु : कथा एक अभिशप्त जीवन की

महाभारत की अनेक कथाओं में से महाराजा पांडु की कथा, जहाँ उनको एक महर्षि द्वारा एक श्राप दिया जाता है, काफी प्रसिद्ध हैं। इस श्राप को महाभारत का एक महत्वपूर्ण केंद्रबिंदु समझा जाता है। इस श्राप के कारण ही महाराजा पांडु की मृत्यु हो जाती है तथा महाभारत कुरु राजकुमारों के बीच संघर्ष में डूब जाता है। तथापि इस प्रकरण में छिपे परिप्रेक्ष्य के बारे जनमानस को भलीभांति ज्ञात नहीं है।

ये भी पढ़िये- हमें महाभारत क्यों पढ़ना चाहिए?

अपने अनेक सैन्य अभियानो की सफलता के बाद, राजा पांडु अपनी पत्नियों के साथ हिमालय के वनों को प्रस्थान करते हैं। सर्वप्रथम एक शिष्य के रूप में, तत्पश्चात एक राजकुमार के रूप में एवं एक राजा के रूप में तथा अंत में विराट सैन्य अभियान के नायक के रूप में महाराज पांडु अथाह परिश्रम कर चुके थे। अतः स्वाभाविक रूप से, यह प्रवास महाराज हेतु उनकी ऊर्जा एवं विचारशीलता को जीवंतता प्रदान हेतु अत्यंत आवश्यक था। महाराज पांडु जीवन पर्यंत अत्यंत अनुशासन में रहे था किन्तु वनप्रवास के समय एक जागरूक पारिस्थितिकी तंत्र की अनुपस्थिति में वह अपने को उन सभी अनुशासनों तथा चिंताओं से बंधनमुक्त कर देते है।

परिणामस्वरुप महाराज आखेट क्रीड़ा में अतिलिप्त हो जाते हैं। आखेट क्रीड़ा आपको व्यसनी होने के अतिरिक्त जीवन के प्रति एक निश्चित असंवेदनशीलता से भर देती है। किन्तु जब आप एक मर्यादा की रेखा को लांघते हैं तो यह विनाशकारी भी हो सकता है। इस क्रीड़ा में आपको निरंतर तीव्र गति से अग्रसर होना होता है एवं उसी तीव्रता द्वारा लक्ष्य पर ध्यान भी केंद्रित करना होता है। अधिकांशतः, गति वास्तविक उद्देश्यों के अतिरिक्त आपको अन्य वास्तविकताओं से भी विमुख कर देती है।

एक दिवस, राजा पांडु अपने धनुष तथा बाण के साथ आखेट हेतु प्रस्थान करते हैं। शीघ्र ही उनका मृगों के झुंड से सामना होता है जिसमे एक नर तथा मादा सांसारिक वास्तविकताओं से अनभिज्ञ, अपने परम प्रेम लीलाओं में लिप्त हैं। आखेट, आखेट की गति, आखेट का रोमांच तथा शक्तिशाली तथा अपरिजित होने की भावना, महाराज पांडु को विचारशून्य कर देती है। महाराज के मष्तिष्क में यह विचार उत्पन्न भी नहीं होता कि प्रेम क्रीड़ारत पशुयों पर लक्ष्य साधना उचित है या अनुचित।

महाभारत में इस प्रकरण का सजीव वर्णन है कि महाराज पांडु उत्तेजित होकर अपने सुनहरे पंखों से सुज्जजित पांच सुंदर तीर उठाते हैं तथापि उनको इस बात का कदापि अनुमान नहीं कि प्रेमलिप्त युगल आने वाली विपदा से बेखबर है। संभवतः उन्ही भावुक क्षणों के दृश्यों ने उस आखेट के रोमांच को उच्चतम स्तर पर स्थापित होने दिया किन्तु महाभारत में इसका वर्णन नहीं है।

किन्तु अंत में उस आखेट का परिणाम महाराज पांडु को रोमांच से वंचित कर देता है। प्रेमलिप्त युगल मृगों में से एक वन की ओर पलायन कर जाता है किन्तु जो धराशायी होता है वह मृग नहीं, बल्कि एक महर्षि का पुत्र था। राजा तथा मुनिपुत्र के मध्य संवाद अंततः एक अविस्मरणीय संभाषण में परिवर्तित हो जाता है है जो धर्म तथा अधर्म की परिभाषा की व्याख्या करता है। तीर से पीड़ित, प्रेम रस से अपूर्ण एवं आहत, तथा अपने जीवन के अंत के दुख से आच्छादित मुनिपुत्र अत्यधिक कठोर शब्दों में महाराज पांडु को उलाहना देते हैं।

“हे राजन, आप इस प्रकार के निंदनीय कार्य में कैसे लिप्त हो सकते हो जिसे एक निम्नस्तरीय, अशिक्षित एवं अमर्यादित पुरुष भी करने में संकोच करेगा। मुझे ज्ञात है कि मनुष्य अपने भाग्य से अछूता नहीं रह सकता एवं मेरा यह अंत भी मेरे पूर्व कर्मों का बोझ ही है। मुझे इस बात का भी बोध है कि आप चाहे जितने भी शिक्षित तथा दूरदर्शी हो किन्तु भाग्य की रेखाओं को परिवर्तित करना आपके नितंत्रण में नहीं है। मैं आश्चर्यचकित हूँ कि आप ऐसे उच्च वंश में जन्मोपरांत भी, जिसने धर्म की मर्यादा को स्थापित किया, अपनी अनैतिक आकांक्षाओं तथा लोलुपता द्वारा इतना अनियंत्रित कैसे हो सकते हैं कि परिप्रेक्ष्य बोध आपके भीतर लुप्त हो जाए?”

संभवतः आज तक महाराजा पांडु पर, क्रोध तथा उनके धर्म पालन पर, कभी किसी ने आक्षेप नहीं लगाया था। तथापि वर्तमान में एक मृग, एक मनुष्य के स्वर में उनसे अकल्पनीय वार्तालाप में लीन था। पांडु ने आघात से उबरते हुए उत्तर दिया कि हे मृग आखेट एक क्रीड़ा थी जिसे राजाओं हेतु अनुमति प्रदान की गयी है। आखेट क्रीड़ा राजाओं हेतु धर्म द्वारा स्वीकृत एक अनुमोदित प्रथा है। इसके अतिरिक्त महाराजा पांडु अपने प्रतिवाद में, मुनि पुत्र को, अतीत के संदर्भों का उद्धरण भी स्मरण कराते हैं तथा किसी भी लक्ष्मण रेखा का उलंघन किस प्रकार हुआ, ये समझ पाने में अपने को असमर्थ बताते हैं।

महाराज पांडु के उत्तरों को सुन, मृग धैर्यपूर्वक, उत्तम एवं अलंकारिक उत्तर देता है,

“हे राजन, आप अपने शत्रु पर उस समय प्रहार नहीं करते जब आपका शत्रु पहले से ही किसी अनिष्ट की स्थिति में हो, संकट में हो, या युद्ध हेतु उद्धत न हो। नियमानुसार, एकमात्र प्रत्यक्ष में ही शत्रु का वध किया जा सकता है। युद्ध में पृष्ठभूमि से शत्रु पर प्रहार कर उसका वध करना अधर्म है अतः आप मेरा वध किस प्रकार कर सके?”

महाराज पांडु अपना मत प्रस्तुत करते हैं, “हे मृग, आपका कथन सत्य है किन्तु वह तो किसी शत्रु पर ही प्रयुक्त होता है। आप एक मृग हैं अतः यह आप पर कैसे प्रयुक्त हो सकता था? यदि मैंने आपको चेतावनी भी दी होती तो आप इस स्थान से द्रुत गति से पलायन कर जाते एवं मुझे आप पर पृष्ठभूमि से ही प्रहार करना पड़ता”

महाराज पांडु को उस समय तक भी अपनी त्रुटि का भान नहीं हो पाया था। मृग महाराजा पांडु को संबोधित करता है,

“हे राजन, न तो मैं आपको पशुओं के आखेट हेतु दोषी ठहराता हूँ, न ही मुझे कष्ट पहुँचाने तथा पीड़ा देने हेतु दुखी हूँ। किन्तु क्या आपने यह ध्यान भी नहीं दिया कि हम दोनों प्रगाढ़ प्रेम में लीन थे, एवं अपने अत्यंत कोमल तथा संवेदनशील क्षणों के समीप थे। क्या आप से इतनी भी प्रतीक्षा नहीं हुई कि हम अपने परम सुख की प्राप्ति कर सकें? एक शासक इतना क्रूर तथा असंवेदनशील कब से बन गया कि वह पशुओं को उन परमानंद क्षणों से विहीन कर दे जिसका अनुदान प्रकृति सभी पशुओं को समान रूप से प्रदान करती है? क्या आपको यह अनुभूति नहीं है कि यह सभी पशुओं का समान अधिकार है? आपका यह कृत्य निश्चित रूप से उस शक्तिशाली कुरु वंश का महान राजा होने के योग्य नहीं है,जिसने हमेशा धर्म की स्थापना एवं उद्धार किया है। आपको सभी वेदों तथा संबंधित शास्त्रों का ज्ञान है किन्तु आपको उन विशेष क्षणों के महत्व से भी परिचित होना चाहिए था। आपका कृत्य अत्यधिक क्रूर, निंदनीय एवं अधर्म की पराकाष्ठा है। यह एक अत्यंत अपमानजनक कार्य, हे राजा पांडु!”

यह सुन महाराज पांडु चैतन्य हुए। विचलित नेत्रों, दुखी मन तथा आत्म ग्लानि से परिपूर्ण महाराज पांडु निशब्द थे एवं प्रतिवाद की स्थिति में नहीं थे। तत्पश्चात मनुष्य के स्वर में मृग ने अब अपना परिचय दिया।

“ओह राजन, मैं मृग नहीं हूँ। मैं एक महर्षि पुत्र, किन्दमा हूँ, मैं और मेरी संगिनी ने प्रणय लीला हेतु मृग रूप धारण किया था और वनों में भ्रमण कर रहे थे। आपने मुझे उस समय कष्ट एवं पीड़ा दी जब मैं अत्यंत संवेदनशील ,भेद्य एवं आनंदमय अवस्था में था। आपने मेरा उस समय वध किया जब मैं गहन प्रेम के आलिंगन में था। मैं आपको श्राप देता हूं कि आप उसी क्षण मृत्यु ग्रहण करेगे, जिस क्षण आप कामभावना के वशीभूत हो अपनी पत्नी का स्पर्श करेंगे”।

अपने दुःख को व्यक्त करते हुए अंत में मुनिपुत्र ने अंतिम सांस ली एवं अपने शरीर को त्याग दिया।

अंततः महाराज पांडु को त्रासदी की व्यापकता का आभास होता है। अत्यधिक विषमता से तथा अवसाद से परिपूर्ण, पांडु गहन वन से अपने शिविर की और प्रस्थान करते हैं। अपने शिविर में कुंती तथा माद्री के समक्ष महाराज पांडु घोर विलाप करते हुए अपनी मूर्खता के कारण आखेट के आवेश में किये गए प्रमाद को अपना ही दोष मानते हैं । यधपि, जिस तरह से वह अपने आवेग एवं आवेश के मूल कारण का वर्णन करते हैं, वह चित्ताकर्षक है।

पांडु वर्णन करते हैं कि यधपि उन्होंने महर्षि व्यास की दिव्यता से जन्म लिया था, किन्तु यह आसक्ति तथा अतिभोग उनके पिता महाराजा विचित्रवीर्य का पांडु पर अप्रत्यक्ष प्रभाव था। संक्षेप में, महाराज पांडु किसी मनुष्य के जन्म पर, अप्रत्यक्ष प्रभाव हेतु पारिस्थितिकी तंत्र में उपस्थित मनुष्य के चरित्र पर अधिक दोष डालते हैं। महाराज पांडु महर्षि व्यास,अपनी माता तथा मातामही पर भी, जिनका जन्म राजकुल में नहीं हुआ था, दोषारोपण नहीं करते है।

महाभारत में काव्य प्रभाव हेतु मनुष्य के चरित्र का कारण अतीत है। यह महाभारत के परिप्रेक्ष्य में मानव चरित्र के महत्व को प्रदर्शित करता है। माद्री तथा कुंती से अपनी व्यथा के वर्णन तथा विलाप उपरान्त महाराज पांडु अपना शेष जीवन सन्यासी के रूप व्यतीत करने का प्रण लेते हैं।

यधपि एक प्रश्न उत्त्पन्न होता है कि क्या राजा पांडु, जो कि स्वयं अति विद्वान तथा प्रशिक्षित शासक थे, को यह ज्ञात नहीं था कि ऐसी विकट स्थिति में किसी पशु का वध करना अनैतिक है, वह भी जब मानव सभ्यता इस कार्य को अभिशाप समझती थी? संभावना यह है कि महाराज पांडु को इस कृत्य का ज्ञान था। किंदमा के प्रश्नों के उत्तर में जिस प्रकार महाराज पांडु निशब्द और निस्तेज प्रतीत होते हैं उस से इसी संभावना को बल मिलता है। किन्तु उन क्षणों में महाराज पांडु ने किस प्रकार का कृत्य साधा? यह प्रकरण उस विवेक शून्यता की और भी संकेत करता है जिसमे मनुष्य आवेश के फलीभूत होकर अत्यधिक संकट भरे कार्य, विशेष रूप से आखेट में लीन हो जाता है, जहाँ अत्यधिक गति एवं लक्ष्य को सिद्ध करने की चिंता में वह विवेकहीन तथा विचार शून्य हो जाता है ।

यह आपको मूलभूत तथा स्पष्ट वास्तविकता के प्रति भी अंधा बना देता है। इन क्षणों में अत्यधिक बुद्धिमान तथा विद्वान मनुष्य भी जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण भुला देता है एवं शमन जीवन की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

राजा पांडु का जन्म महर्षि व्यास की दिव्य कृपा से हुआ था तथापि वह पूर्ण रूप से देवत्व को प्राप्त नही हुए थे। महर्षि व्यास को अपने सम्मुख पाकर उनकी माँ अम्बालिका का मुख श्वेतपीत वर्ण सदृश हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप पांडु पीतवर्ण पैदा हुए। अम्बा ने अपने नेत्रों को बंद किया जिसके परिणामस्वरूप धृतराष्ट्र ने नेत्रहीन तथा विवेकहीन बालक के रूप में जन्म लिया। दूसरी ओर एक दासी ने व्यास की पूर्ण कृपा प्राप्त की एवं विदुर ने उनसे जन्म लिया था।

इस महाकाव्य में विदुर एकमात्र मनुष्य हैं, जो परिप्रेक्ष्य की पूर्ण स्पष्टता के साथ कार्य करते हैं। महाभारत में विदुर सदैव एक स्पष्टता तथा दृढ़ विश्वास का प्रदर्शन करते हैं जो अन्य पात्र नहीं करते। वृद्ध भीष्म भी धृतराष्ट्र तथा पांडु विवाह बंधन हेतु विदुर से, जो आयु में कृपाचार्य एवं पितामह से भी छोटे थे, विचार विमर्श करते है। विदुर की माता द्वारा पूर्णता में दिव्यता प्राप्त करने की क्षमता उनके वर्ण, समुदाय या कार्य की प्रकृति से अप्रभावित है- महाभारत इसके पक्ष में मनुष्यगत क्षमताओं को महतवपूर्ण मानता है।

धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से निश्चित होता है जो उस समय की श्रेष्ठ स्त्रियों से में से एक हैं तथा बृहत दृष्टिकोण धारण करती हैं। तथापि धृतराष्ट्र गांधारी की बुद्धिमत्ता को प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं एवं गांधारी पर धृतराष्ट्र के नेत्रहीन होने का विपरीत प्रभाव पड़ता है।

वह अपने नेत्रों पर आवरण रखना चुनती है जिसका रूपात्मक अर्थ यह दर्शाता है कि धृतराष्ट्र की निर्बल वैचारिक क्षमता, परिपेक्ष्य के अभाव में, भविष्य में कार्रवाई हेतु, गांधारी से किसी भी प्रकार का वैचारिक परामर्श एवं सहयोग प्राप्त नहीं कर पायेगी।

कुंती भी महान ज्ञानी तथा अनुभवी महिला हैं जिन्होंने कुन्तिभोज के राज्य में राजकीय अतिथियों की आवभगत का दुष्कर कार्य संभाला हुआ था। किन्तु कुंती की बुद्धिमत्ता भी पांडु के आखेट में पर अंकुश नहीं लगा पाती है।

आगे के कथानक में पांडु, अपनी भूल से शिक्षा लेकर फिर एक महान सन्यासी का जीवन व्यतीत करते हैं तथा त्याग में ही सौन्दर्य की अनुभति करते हैं। यह कुंती ही हैं जो परिवार को संभाले रहती हैं तथा यह सुनिश्चित करती है कि पांडु हर समय, अभिशाप की पहुंच से दूर रहते हुए सुरक्षित रहें। किन्तु हमारे कर्म तथा भाग्य जीवन पर्यंत साथ रहते हैं और समय-समय पर हमको हमारे पूर्व कर्मो का स्मरण कराते हैं ।

परंपरा हेतु स्वीकार्य प्रणाली से, पांडवों के जन्म पश्चात, पांडु के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। पूर्ण रूप से यह अवगत होते हुए भी कि, मन्मथा हेतु आरक्षित माह में मन्मथा प्रणय लीला से सिद्ध पुष्पों के बाण से प्रहार हेतु तत्पर रहते हैं, पांडु एक ऐसे स्थान पर प्रवेश करते हैं जहां मन्मथा अपने पुष्प बाणों सहित सक्रिय है। स्व-नियंत्रण हेतु माद्री का निरंतर अनुरोध भी पांडु को नियंत्रित नहीं कर पाता, तथा माद्री के स्पर्श के साथ ही, वह घातक अभिशाप से प्रभावित होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

इस प्रकार, किस भी दिव्य अनुग्रह को मात्र प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। यदि आपको उस दैवीय कृपा से पूर्ण रूप से अनुग्रहित होना है तो आपको उस दिव्य अनुग्रह को चित्त,देह एवं विचार के साथ पूर्ण रूप से प्रतिग्राहित करना आवश्यक होता है। पांडु का जन्म एक अपूर्ण देवत्व था तथा इसी अपूर्णता ने राजा पांडु के एकमात्र मूर्खतापूर्ण कार्य द्वारा अपने आवेग को अपनी बुद्धिमत्ता से विजयी हो जाने दिया। अतः अंत में इसी अपूर्णता के द्वारा कुरु वंश का सम्पूर्ण नाश हुआ।

साभार – https://www.indictoday.com/ से

image_pdfimage_print


सम्बंधित लेख
 

Back to Top