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कश्मीर के महान आयुर्वेदाचार्य महाश्री शिर्य भट्ट जिन्होंने मुस्लिम शासक जैनुल-आबदीन को झुका दिया

कालावधि में कुछ समय ऐसे होते हैं जिनका आकलन करना अत्यन्त कठिन होता है । इतिहास में ऐसा ही एक समय काश्मीर मंडल के महाश्री शिर्य भट्ट (15 वीं शताब्दी) का है । महाश्री शिर्य भट्ट का समय कश्मीर के मुस्लिम शासक जैनुल-आबदीन (1420-1470 ई.) का शासनकाल है ।

कल्हण विरचित “राजतंरगिणी” काश्मीर मंडल के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक साक्ष्यों का प्रथम प्रमाणभूत इतिहास ग्रन्थ है । कालगणना के विविध सिद्धान्तों का विमर्श करते हुए आचार्य कल्हण अपने इस ग्रन्थ में अभिलेख, दानपत्रों, प्रशस्तिपत्रों के साथ-साथ पूर्ववर्ती ग्रन्थों की सहायता से काश्मीर का महाभारत काल से लेकर राजा जयसिंह (1128 ई.) पर्यन्त एक क्रमबद्ध ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करते हैं । इसके पश्चात् कश्मीर में इतिहास ग्रन्थ लिखने की परम्परा टूट गई। यह परम्परा पुनः 15 वीं शताब्दी में महाकवि जोनराज के द्वारा स्थापित हुई । जोनराज द्वारा दूसरी “राजतरंगिणी” रूपी इतिहास ग्रन्थ लिखने की प्रेरणा महाश्री शिर्य भट्ट से ही मिली थी । जोनराज स्पष्ट रूप से कहता है कि शिर्य भट्ट की आज्ञा से ही उसने पुनः कश्मीर के राजाओं का इतिहास लिखना प्रारम्भ किया ।

सर्वाधिकारेषु नियुक्तस्य दयावतः ।
मुखात् श्रीशिर्यभट्टस्य प्राप्याज्ञामनवज्ञया ॥ 11॥

महाश्री शिर्य भट्ट के के विषय में जानने के लिए हमें जोनराज विरचित “राजतरंगिणी”, श्रीवर रचित “जैन राजतरंगिणी” एवं “तबकाते अकबरी” ग्रन्थों का सहारा लेना पड्ता है । महाश्री शिर्य भट्ट भारतीय ज्ञानपरम्परा में स्वीकृत 18 विद्याओं में से एक आयुर्वेद विद्या के विशारद थे । इस विद्या का विकास अथर्ववेद के उपवेद के रूप में हुआ है । आयुर्वेद विद्या प्रारम्भ में एक लक्ष श्लोकों एवं हजार अध्यायों में विभक्त था, कालान्तर में यह आठ अंगों – शल्य तन्त्र (चीर-फाड), शालाक्य तन्त्र, काय तन्त्र, भूतविद्या तन्त्र, कौमारभृत्य तन्त्र, अगद तन्त्र, रसायन तन्त्र, एवं वाजीकरण तन्त्र – में निबद्ध हुआ । इसीकारण, इस विद्या को अष्टांगी विद्या भी कहते हैं । आयुर्वेदीय परम्परा के आचार्यों में सुश्रुत, चरक, वाग्भट्ट एवं शिर्य भट्ट अग्रगण्य हैं । जोनराज रचित “राजतरंगिणी” के अध्ययन से यह पता चलता है कि महाश्री शिर्य भट्ट सुश्रुतीय परम्परा अर्थात् शल्य तन्त्र एवं गरुडशास्त्र (विष उतारने वाली विद्या अर्थात् अगद तन्त्र) के महनीय आचार्य थे ।

शिर्य का वास्तविक अर्थ शत्रुओं को तीतर-बीतर करने वाला होता है । इस सन्दर्भ में, शिर्य भट्ट के विलक्षण चरित्र एवं बुद्धिमत्ता से हिन्दुओं से शत्रुभाव रखने वाले मुस्लिम समाज छिन्न-भिन्न हो गये ।

कश्मीर का पहला विदेशी शासक रिंचन (1320 ई.) एवं जैनुल आबदीन (1420 ई) के मध्य 100 वर्षों के अन्तराल में ही कश्मीर का सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो चुका था । कश्मीर के हिन्दु समाज की स्थिति दयनीय हो चुकी थी । धर्म-परिवर्तन सामान्य-सी बात हो गई थी । सिकन्दर बुतसिकन के काल में उसका मंत्री भट्ट सूहक ने अपना धर्म परिवर्तन करते सैफुद्दीन हो चुका था । लद्दराज, प्रसिद्ध वैद्य शंकर भी मुस्लिम धर्म अपना चुके थे । मुस्लिम शासकों के दुराचार से काश्मीर मंडल में मंदिर, प्रतिमाओं के ध्वंस होने से ब्राह्मणों की शारीरिक व मानसिक शक्ति दुर्बल हो गई ।

कश्मीरमण्डले म्लेच्छदुराचारेण दूषिते ।
महिमा ब्राह्मणैर्मन्त्रैर्देवैश्च स्वः समुज्झितः ॥ 591॥

कश्मीर में ऐसी शक्ति का उदय नहीं हो रहा था जो हिन्दु समाज का उद्धार कर सके । यह सर्वविदित है कि 1329 के आस-पास सिकन्दर बुतसिकन के शासनकाल में कश्मीर में व्यापक स्तर पर संहार हुए जिसका उल्लेख १५वीं शताब्दी का इतिहासकार जोनराज अपने “राजतरंगिणी” में करते हुए स्पष्ट रूप से कहता है कि “जिसप्रकार मरुत् (वायु) से वृक्ष एवं शलभों (कीट समूह) से शालि (खेत में लगे फसल) नष्ट कर दिये जाते हैं उसी प्रकार से यवनों द्वारा कश्मीर के आचार-विचार ध्वस्त कर दिये गये ।“
मरुद्भिरिव वृक्षाणां शालिनां शलभैरिव ।

कश्मीरदेशाचाराणां ध्वंसोऽथ यवनैः कृतैः ॥575॥

यहाँ ध्यातव्य है कि “आचार” का अर्थ सभ्यता से है एवं “विचार” से संस्कृति । इस प्रकार यवनों ने कश्मीर की पुरातन सभ्यता व संस्कृति को नष्ट कर दिया । सिकन्दर बुतसिकन ने कश्मीर के कई प्राचीन मन्दिरों मार्तण्ड, विजयेश, चक्रभृत्, त्रिपुरेश्वर आदि को तोड डाला । उसका काल एक प्रकार से कश्मीर का विप्लव काल था । जोनराज ने इसके लिए “विप्लव” शब्द का प्रयोग किया है जो उचित है । कश्मीर की यह सामाजिक व धार्मिक क्रान्ति थी । प्रायः क्रान्तियों से राज-परिवर्तन होता है किन्तु इस विप्लव ने कश्मीर की पुरातन संस्कृति, सभ्यता, धर्म व राजनीतिक ढाँचे को नष्ट कर दिया ।

“बहारिस्तान शाही” में वर्णित है कि सिकन्दर ने एक तालाब बनवाया एवं इसे हिन्दु ग्रन्थों से भरवाकर उसके ऊपर मिट्टी भरवा दिया । सिकन्दर बुतसिकन ने कश्मीर में विद्यमान ग्रन्थागारों को नष्ट कर दिया । उसने कश्मीर को एक अवशेषों के संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया। इस विप्लव के पूर्व कश्मीर की कला, संस्कृति व दर्शन अत्यन्त समृद्ध थी । कल्हण का कश्मीर जहाँ हिन्दु राष्ट्र भावना से ओत-प्रोत था जबकि जोनराज का कश्मीर मलेच्छों का देश बन चुका था। कश्मीर में केवल ब्राह्मण ही शेष बच गये थे जिन्होंने अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया था ।

शाहमीरी वंश के सुल्तान सिकंदर बुतशिकन का स्केच

इसी पृष्ठभूमि में 1420 ई में कश्मीर का शासक जैनुल-आबदीन बनता है । उसने शस्त्र एवं मन्त्र के प्रयोग से शासन प्रारम्भ किया । उसकी नीति धर्मिक थी, किन्तु हिन्दु विरोधी नहीं थी । कश्मीर की कलात्मक, सृजनात्मक, रचनात्मक शक्तियाँ जो पूर्व के मुस्लिम शासकों के द्वारा विखंडित की जा चुकी थी, वो अब पुनः चेतना को प्राप्त करने लगी थीं । हिन्दुओं की क्रियात्मक एवं संकल्प शक्ति का पुनः उदय हो रहा था।

जोनराज अपनी “राजतरंगिणी” में लिखते हैं कि किसी समय शासक जैलुन-आबदीन के शरीर में एक व्याधि (फोडा) हो गई । उसका उपशमन करना दुर्लभ-सा हो गया था । कश्मीर में पूर्व के मुस्लिम शासकों की नीतियों के परिणामस्वरूप भारतीय ज्ञान-परम्परा की विविध शाखायें लुप्त हो चुकी थीं । बहुत प्रयास करने पर राजा के सेवकों ने एक आयुर्वेद विद्या के विशारद् एक व्यक्ति को ढूढ निकाला । उस व्यक्ति का नाम शिर्य भट्ट था । वे गरुडशास्त्रज्ञ भी थे । सर्प आदि का विष का उपशमन करने हेतु गरुड का आवाहन करना पडता है जो सर्प का परम्परागत शत्रु है । इसीकारण इस विद्या को गरुडशास्त्र कहते हैं ।
यज्वा गारुडशास्त्रज्ञः शिर्यभट्टो नृपानुगैः । 812 ।

चिकित्सा विद्या में सिद्धहस्त होने पर भी मुस्लिम शासक के भय से शिर्य भट्ट राजभवन जानें में विलम्ब कर रहे थे । यह उस समय की स्थिति को दर्शाता है कि किस प्रकार का भय सामान्य जनमानस में व्याप्त था । शासक द्वारा अभय प्राप्त कर लेने के बाद ही शिर्य भट्ट वहाँ गये एवं राजा के व्याधि का उपशमन किया l उस व्याधि के उपशमन से शिर्य भट्ट का यश चतुर्दिक दिशाओं में प्रवाहित हुआ । जैनुल आबदीन ने उसे अपार सम्पत्ति देने का निश्चय किया । किन्तु शिर्य भट्ट ने यह सम्पत्ति लेने से मना कर दिया । यह त्याग की भावना उनके विराट् चरित्र को उद्घाटित करता है । एक ओर जहाँ भट्ट सूहक जैसे लोगों ने पद, अर्थ, स्वार्थ हेतु स्व-धर्म का त्याग कर दिया, वहीं शिर्य भट्ट ने स्व-धर्म की रक्षा के लिए पद, अर्थ, का भी त्याग कर दिया । शिर्य भट्ट के उदात्त चरित्र में हमें उत्सर्ग की भावना एवं कष्ट-सहिष्णुता की पराकाष्ठा देखने को मिलता है। तबकाते अकबरी के अनुसार, शिर्य भट्ट की प्रार्थना पर जैनुल आबदीन ने पूर्व में पलायन कर चुके अन्य हिन्दु ब्राह्मणों, विद्वानों को पुनः कश्मीर में बुला लिया । उन्हें सम्यक् वृत्ति प्रदान की । पूर्व के शासकों ने जो जो हिन्दु प्रथाओं पर रोक लगा दी थी, वे सभी पुनः लागू कर दिये गये । शिर्य भट्ट ने कश्मीर में नागों की यात्रा को पुनः प्रारम्भ करवाया। कश्मीर में उस समय मुस्लिम शासकों ने हिन्दु समाज पर तीन प्रकार के दण्ड निर्धारित कर रखे थे – वाक् दण्ड, मनो दण्ड, एवं काय दण्ड अर्थात् शारीरिक, आर्थिक एवं मानासिक दण्ड । शिर्य भट्ट ने इन सबकों को खत्म करवाया । सिकन्दर बुतसिकन के समय जाजिया कर 192 मासा था, शिर्य भट्ट ने उसे घटवाकर 1 मासा करवा दिया । अपने त्याग, विद्या व मानवीय गुणों के कारण वह शिर्य भट्ट तत्कालीन शासक जैनुल आबदीन का स्नेहपात्र बन गया । शिर्य भट्ट के कारण ही ब्राह्मण व्यक्ति भी अब राजकीय पदों पर आसीन होने लगे । उसने जगह-जगह पर मठों, धर्मशालाओं का निर्माण करवाया ।

सम्राट ललितादित्य द्वारा बनवाया गया भव्य मार्तण्ड सूर्य मंदिर, जिसको जैन-उल-आबिदीन के पिता सिकंदर बुतशिकन ने तुड़वाया था

विषये विषये चक्रे शिर्य भट्टो मठान् पृथून् । 88

शिर्य भट्ट का उदात्त चरित्र कश्मीर के उस काल में भी नक्षत्र तुल्य है । केवल एक व्यक्ति के त्याग व बलिदान के कारण समस्त हिन्दु समाज में एक नये जीवन का संचार संभव हो पाया । उसने सर्वत्र ही गंभीरता एवं बुद्धिमत्ता का परिचय दिया । जैनुल आबदीन की चिकित्सा करने के पूर्व वह उससे अभय प्राप्त कर लेना चाहता था । चिकित्सा के पूर्व शिर्य भट्ट ने कुछ शर्तें रखीं जिसे शासक ने मान लिया । व्याधि के उपशमन के बाद जैनुल आबदीन उसे अकूत संपत्ति देना चाहता था, किन्तु शिर्य भट्ट ने अपनी विद्या को द्रव्य से तुलना करना उचित नहीं समझा । उसने अपनी सर्वग्राही गुणों से राजा को प्रभावित किया एवं उसे हिन्दु समाज की स्थिति को बेहतर करने के लिए प्रेरित किया । शिर्य भट्ट को ’महाश्री’ को उपाधि जैनुल आबदीन ने ही प्रदान की थी ।

जैनुल आबदीन का काल पूर्व के मुस्लिम शासकों के ध्वंसात्मक युग से भिन्न था । उसका युग हिन्दु समाज के लिए कुछ राहत का युग था । तथापि उसके काल को एक नया मोड देने का श्रेय महाश्री शिर्य भट्ट को जाता है जिन्होंने अपनी त्याग, बलिदान व उदात्त चरित्र के बल पर हिन्दु चेतना को जागृत करते हुए समाज के सभी घटकों को पुनर्व्यवस्थित किया ।

भारतवर्ष के इतिहास में कुछ वर्ष ऐसे होते हैं जब महान् विभूतियों का आविर्भाव होता है। ऐसा ही एक क्षण था जब भारतवर्ष में शिर्य भट्ट का आविर्भाव हुआ था । शिर्य भट्ट का संस्मरण करना हमारा पुण्यतम कर्त्तव्य है । त्याग एवं बलिदान की भावना की पराकाष्ठा का एक अवलोकन शिर्य भट्ट के चरित्र का सम्यक् मूल्यांकन करके किया जा सकता है । शिर्य भट्ट जैसा व्यक्ति, वैसी दृष्टि, परिस्थितियों के साथ समन्वय, उसकी नीतियाँ, कलागुणग्राहिता- इन सभी का एक जगह समन्वय होना अति दुष्कर है । प्रो. त्रिलोकी नाथ गंजू के अनुसार, कश्मीर के स्वर्णिम इतिहास में, विशेषकर मध्यकालीन इतिहास के सन्दर्भ में जिस महत्ता के गौरव के साथ जैनुल आबदीन का यश चिरस्मरणीय बना, संभवतः अगर शिर्य भट्ट का समागम उन्हें नहीं मिलता तो शायद वह भी इतिहास की उसी धारा में बह जाता जिस कलंकित धारा में उसके पूर्वज बह गये थे |

(लेखक जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र, नई दिल्ली के फेलो हैं)

साभार https://www.jammukashmirnow.com/ से

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