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मिट्टी से सोना बना रहे हैं चंदन

परिवार की आर्थिक स्थिति मिट्टी के बर्तन पर निर्भर थी। घर में दादा की जुबानी अक्सर सुनने को मिलता था कि दाई मरे, दादा मरे, रोजगार मरे… यानी मां-दादा गुजर गए तो रोजगार भी मर गया। दादा का यह दर्द मुझे सालता रहा।

उस वक्त उम्र कम होने की वजह से पुश्तैनी पेशे के लिए कुछ कर नहीं पाया। सीमित आय के चलते बहुत कुछ सोचने-समझने व पढ़ाई करने का अवसर भी नहीं मिला, लेकिन ठान लिया था कि पुश्तैनी पेशे में ही कुछ अलग करूंगा। बारहवीं तक पढ़ाई कर चुके चंदन चक्रधारी ने न केवल पुश्तैनी पेशे को जिंदा रखा, बल्कि समाज के युवाओं के प्रेरक भी बने।

उन्होंने पेशे में पारंपरिक सोच से हटकर मौजूदा डिमांड का समावेश किया। स्वयं की कलाकृति को विभिन्न रूप दिया। इसकी बदौलत सालाना तीन से पांच लाख रुपए तक की आय हो रही है।

पारंपरिक सोच में किया बदलाव
रायपुर स्थित महादेव घाट रायपुरा में काफी संख्या में कुंभकार हैं, लेकिन पुश्तैनी पेशे से बहुत कम युवा जुड़ पा रहे हैं। कुंभकार चंदन का कहना है कि किसी भी व्यवसाय में समय की मांग को समझना बहुत जरूरी है। त्योहार में चीन निर्मित दीयों की मांग होने से कुंभकारों के सामने आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ।

शासन की योजनाएं सिर्फ फाइलों में दौड़ती रहीं, इसलिए हमने सोचा कि सिर्फ कुल्हड़ बनाने से घर का खर्च नहीं चलेगा। पिता अशोक चक्रधारी के साथ मिलकर मिट्टी के दीये, गुल्लक, फ्लावर पॉट आदि बनाना शुरू किया। इन सामग्रियों को बाजार तक पहुंचाने और ऑर्डर पूरा करने का विशेष ध्यान रखा।

कई सामाजिक संगठनों से संपर्क किया ताकि घड़े, बड़े आयोजनों और पूजा-पाठ में लगने वाले मिट्टी के बर्तन की आपूर्ति की जा सके। इससे आमदनी में बढ़ोतरी हुई।

चीन निर्मित सामग्री ने मिट्टी कला के वजूद को खतरे में डाला
चंदन का कहना है कि पुश्तैनी पेशे को भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि वह तन-मन से जुड़ा रहता है। इसीलिए शुरू से ही घर के बड़े लोगों को इस काम में सहयोग करता था। पूरे शरीर पर मिट्टी लग जाती है, लेकिन इसमें जो खुशी है, वह अन्य कार्यों से नहीं मिल सकती।

घर के बुजुर्गों से अब पहले जैसा काम नहीं हो पाता। चीन निर्मित सामग्री ने यहां की मिट्टी कला के वजूद को खतरे में डाल दिया है, इसलिए आज के युवाओं को जागरूक होना होगा। दीपावली के समय पचास हजार दीये महज पंद्रह दिन में तैयार करते हैं और लगभग 40-50 हजार रुपए के सिर्फ दीये बेचते हैं।

सिर्फ कुल्हड़ तक नहीं सीमित
पारंपरिक पेशे में कुल्हड़, घड़े, दीये ही बनाए जाते थे। इसमें उन्होंने बदलाव करते हुए मिट्टी के नक्काशीदार घड़े, डिजाइनर दीये, गुल्लक, तुलसी पॉट, गार्डन पाट, भगवान गणेश, माता दुर्गा की मूर्तियां, टोंटी लगे घड़े आदि पर फोकस किया। इन मिट्टी की सामग्रियों को बनाकर मार्केट तक समय पर पहुंचाने का भी ध्यान रखा। नतीजतन आय बढ़ती गई।
साभारः दैनिक नईदुनिया से



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