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प्रचारकों की नई पीढ़ी आसान बना रही सत्ता की सीढ़ी

पिछले एक-डेढ़ साल से भारत में चुनाव प्रचार अभियान में खासा बदलाव देखने को मिला है। इस परिवर्तन पर समाज विज्ञानियों का समुचित ध्यान नहीं गया है। देश के राष्टï्रीय राजनीतिक दल भी इसे पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं। पिछले कुछ चुनावों के दौरान भारत में स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं का एक ऐसा समूह उभरा है, जिसने किसी राजनीतिक दल या उसके प्रमुख नेता के संदेश को विभिन्न मीडिया माध्यमों का उपयोग कर जनता तक सक्षम रूप से पहुंचाया है। ये समूह उस राजनीतिक दल या नेता के लिए काम करते हैं, जिसका वे समर्थन करना चाहते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि इन अभियानों को अंजाम देने के लिए उन्हें राजनीतिक दल से हरसंभव मदद हासिल होती है। 

इस नए रुझान से पता चलता है कि किसी राजनीतिक दल या उसके नेता को केवल स्थानीय कार्यकर्ताओं या पेशेवर कार्यकर्ताओं के अलावा ऐसे समूहों का समर्थन भी हासिल होता है जो अपने विश्वास और निजी प्रतिबद्घता के साथ देश में राजनीतिक बदलाव के मकसद से ही एकजुट होकर अभियान चलाते हैं। उनका अभियान सामान्य पार्टी कार्यकर्ताओं की तुलना में कम पक्षपाती लगता है। न ही पार्टी के पक्ष में मतदान की उनकी अपील पेशेवर पार्टी कार्यकर्ताओं की तरह सुनाई पड़ती है, जिन्हें मतदाता तुरंत ताड़ लेते हैं कि इस काम के लिए उन्हें पैसे दिए गए हैं। 

ऐसा ही एक संगठन है इंडिया फाउंडेशन, जिसने भारतीय राजव्यवस्था के समक्ष मौजूद चुनौतियों और मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर वर्ष 2014 के आम चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए अथक रूप से काम किया। फाउंडेशन का काम मुख्य रूप से शहरों और कस्बाई इलाकों में ऐसे सम्मेलन आयोजित करने तक सीमित था, जहां मोदी ऐसे माहौल में अपने आर्थिक दर्शन को पेश कर सकें, जहां ऐसी कवायद का व्यापक प्रभाव और विश्वसनीयता होगी। 

भाजपा और मोदी की जमीनी स्तर पर मदद के लिए सिटीजन ऑफ अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) नाम की संस्था काम कर रही थी। सीएजी राजनीतिक अभियान और उसका खाका खींचने के साथ ही उभरते हुए सियासी समीकरणों को साधने के लिए प्रचार अभियान की रणनीति भी निर्देशित करती थी। आम आदमी पार्टी (आप) और उसके नेता अरविंद केजरीवाल को भी पेशेवरों के समूह की भागीदारी का फायदा मिला। 

अब बिहार विधानसभा चुनावों की तैयारी के बीच राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) की संभावनाओं को चमकाने के लिए एक नया संगठन सामने आया है। इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी (आईपीएसी) नाम के इस संगठन के लोगों में भी बिहार में राजनीतिक परिवर्तन को लेकर वैसा ही जोशोखरोश है और उनमें से तमाम लोगों ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों की अपनी मोटी पगार वाली नौकरियां छोड़ी हैं। वास्तव में जो लोग सीएजी के सदस्य थे और 2014 में मोदी के लिए ताल ठोक रहे थे, उनमें से से कुछ अब भाजपा के खिलाफ ही नीतीश कुमार की जीत सुनिश्चित करने में लगे हुए हैं।  

इनमें से अधिकांश समूह मुख्य रूप से ऐसे पेशेवरों ने गठित किए हैं, जिनकी राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर संगठित राजनीति में पहले ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी लेकिन अब उन्हें लगता है कि एक मजबूत राजनीतिक दल और उसके नेता की मदद के जरिये शासन के स्तर पर उन्हें बदलाव लाना चाहिए और इसके लिए वे चुनाव पूर्व अभियान में उतरते हैं। इनमें से अधिकांश समूह भारतीयों द्वारा संचालित हैं, जो या तो कामकाज के लिए विदेश गए हैं या फिर बहुराष्टï्रीय कंपनियों या बहुस्तरीय संगठनों के साथ काम कर रहे हैं। वे बेहद कामयाब पेशेवर हैं लेकिन अपनी जिंदगी के अधिकांश दौर में सियासी तिकड़मों से दूर ही रहे हैं। इस तरह अपनी पसंद के राजनीतिक दल के लिए चुनाव प्रचार में उनके कूदने में दुर्लभ जोश और प्रतिबद्घता नजर आती है। वे सभी मतदाताओं से बेहतर संवाद स्थापित करने में अपनी पार्टी और नेता की मदद के लिए तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। चूंकि अपने अंतरराष्ट्रीय अनुभव के चलते स्वाभाविक रूप से उनका नजरिया अधिक तकनीकी और वैज्ञानिक होता है। संभवत: केवल इसी कारण से वे मतदाताओं पर ज्यादा प्रभाव उत्पन्न कर पाते हैं। उनकी अपील इस वजह से भी असर करती है कि पार्टी की जीत में निजी तौर पर उनका कुछ दांव पर नहीं लगा होता, जैसा कि परंपरागत राजनीतिक कार्यकर्ता का होता है। पार्टी के लिए काम करने की उनकी इकलौती वजह उनका वही विश्वास है कि उनकी पसंद की पार्टी राजनीति और शासन का स्तर सुधारेगी। 

यह स्पष्टï नहीं है कि राजनीतिक अभियानों में लगातार अहम भूमिका अदा कर रहे पेशेवरों के इन नए समूहों का रुझान भारतीय लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है। यह भी स्पष्टï नहीं है कि अगर पेशेवरों के ये समूह इतने पेशेवर हैं कि भारतीय राजनीति की हकीकत को देखते हुए उनकी अनुभवहीनता और परिवर्तन में कमी को लेकर उनकी बेचैनी और उसमें बदलाव को लेकर सुस्ती के साथ सहजता से उनका तेजी से मोहभंग हो सकता है। संभवत: यही वजह कि 2014 में भाजपा के अभियान की कमान संभालने वाले अब आगामी विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की मदद के लिए आगे आए हैं। 

निश्चित रूप से राजनीतिक दल ऐसे पेशेवर समूहों को पसंद करते हैं। अपनी बहुप्रचारित निस्वार्थता और पेशेवर प्रतिबद्घता से वे जहां ग्रामीण मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं, वहीं अपनी पश्चिमी ढर्रे वाली शिक्षा से अपने पेशेवर दर्जे और अंदाज से शहरी मतदाताओं में भी पैठ बना सकते हैं। मगर जहां पहले से ही इतनी अस्थिरता कायम है, ऐसे में यह स्पष्टï नहीं है कि राजनीतिक दलों के मुख्य प्रचारकों के तौर पर इन पेशेवर समूहों का उभार भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और तंत्र में मतदाताओं के भरोसे को किस तरह प्रभावित करेगा।

साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से 

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