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संस्कार, सेवा, अनुशासन, परंपरा, भावना और रिश्तों की मासूमियत से महकी 151 जोड़ों की शादी

दृश्य एकः आप किसी शादी में जाते हैं, शानदार कपड़े पहने लोगों के बीच आप भी अपने महंगे से महंगे कपड़े, जूते सब दिखाते हुए आपसे भी बढ़कर और महंगं ब्रांडेड कपड़े पहने दूसरे मेहमान आपको अपनी औकात दिखा देते हैं, उसे उसकी औकात कोई दूसरा दिखा देता है। शादियों में वर और वधू दोनों ही पक्षों के लोग, उनके रिश्तेदार भी शानदार से शानदार कपड़ों में आत्मीय मुस्कराहट के साथ आपका स्वागत करते हैं। लेकिन इस स्वागत में आपको आत्मीयता कम औपचारिकता ज्यादा लगती है, क्योंकि आप उसकी मुस्कराहट का जवाब दें इसके पहले ही वह अगले मेहमान की आवभगत में लग जाता है।

इसके बाद आप किसी मेले में घूमने आएँ हों ऐसे अलग अलग तरह के व्यंजनों के स्टाल पर जाकर पंजाबी, चाईनीज़, मारवाड़ी, गुजराती, देसी विदेशी, हर तरह का खाने में से अपनी पसंद का खाना, मिठाई आईसक्रीम और फलों से लेकर वो हर चीज देख लेते हैं जिनका नाम भी आपने पहली बार सुना होता है। कई समझदार लोग उतना ही लेते हैं, जितना उनको खाना होता है, कुछ लोग खाने पर टूट पड़ते हैं और उतना लेते हैं कि जी भरकर जूठा छोड़ सकें। कुछ माताएँ अपने उन छोटे बच्चों को ठूँस-ठूँसकर उसकी पसंद की चीजें खिलाने की कोशिश करती है, लेकिन बच्चा उतना ही खा पाता है जितनी उसके पेट में जगह होती है, जाहिर है इस बच्चे के नाम पर लिया गया खाना भी जूठा ही छोड़ा जाएगा। आए दिन ऐसी शादियों में जाने के बाद आप अगली ऐसी ही शादी में जाने की किसी और दिन का इंतजार करने लगते है।

दृश्य दोः मुंबई से मात्र 200 किलोमीटर दूर जव्हार जैसे आदिवासी क्षेत्र में सौ-डेढ़ सौ से ज्यादा गाँवों के हजारों आदिवासी युवक युवतियाँ जिनकी उम्र 18 से लेकर 35 साल तक की हो गई है, वो अपनी पसंद से शादी तो कर लेते हैं लेकिन उनकी शादी को उनके समाज की पंचायत या उनका आदिवासी समाज तब तक स्वीकार नहीं करता जब तक कि ये जोड़ा शादी के बाद गाँव के लोगों को सामूहिक भोजन न करा दे। और ये सामूहिक भोजन कोई महंगे खाने या हजार दो हजार रु. की प्लेट वाला नहीं बल्कि मात्र चावल और आलू-बैंगन की सब्जी का होता है। लेकिन इस जोड़े की ये हैसियत नहीं होती कि अपने समाज के लोगों को वो ये ‘महंगा’ खाना खिला सके। अगर वो खिलाना चाहे तो इस पर खर्च भी मात्र 5-7 हजार रुपये ही आएगा। ये खाना नहीं खिला पाने की वजह से उस जोड़े को हर दिन अपमानित होना पड़ता है। उसके घर में किसी भी शुभ प्रसंग से लेकर मौत हो जाने तक में गाँव का आदिवासी समाज उसके यहाँ नहीं जाता। यानी शादी के बाद उसे दिन प्रतिदिन अपमान का घूँट पीकर रहना पड़ता है। गाँव के लोग उनके राम राम का भी जवाब नहीं देते। ऐसे जोड़े या तो अपमान का घूँट पीकर अपने ही गाँव और समाज में जीने को मजबूर हो जाते हैं या चर्च के पादरियों के शिकंजे में पड़कर धर्मपरिवर्तन करने को मजबूर हो जाते हैं।

दृश्य तीनः जव्हार के गाँव के एक स्कूल के प्रांगण में शमियाना लगा है। जो चारों तरफ से खुला है और ऊपर कपड़ा लगा है। इस शमियाने में रविवार की सुबह जव्हार सहित आस-पास के गाँवों से दुल्हा-दुल्हन की तरह सजे हुए युवक और युवती और कुछ तो तीस चालीस की उम्र पार कर चुके दुल्हा-दुल्हन सुबह से आना शुरु कर देते हैं। सुबह 8-9 बजे से इन दुल्हा-दुल्हन के आने का सिलसिला शुरु होता है और 10.11 बजे तक पूरा पंडाल 151 ऐसे जोड़ों से भर जाता है। सभी जोड़ों को नंबर का बैज दिया गया है और सभी अपनी अपनी जगह पर आकर बैठ जाते हैं।

बैठ जाते हैं इसका मतलब ऐसे बैठ जाते हैं कि पूरे समय किसी तरह की कोई हलचल नहीं, न चेहरे पर किसी तरह के निराशा के भाव, न गर्मी से किसी तरह की परेशानी का कोई भाव सभी पंक्तिबध्द ऐसे बैठ जाते हैं जैसे दुल्हा दुल्हन के वेश में फौजी लोग बैठे हैं। अगर आप गौर से देखेंगे तो इन सबके चेहरे पर ऐसी निस्तब्धता, शांति और गहराई दिखाई पड़ती है जो ध्यानस्थ गौतम बुध्द या महावीर स्वामी की किसी मूर्ति में दिखाई पड़ती है। तीन घंटे तक इऩ सभी जोड़ों के सामूहिक विवाह की प्रक्रिया चलती है। पंडितजी माईक पर मंत्रोच्चार करते हैं और साथ में मराठी में निर्देश देते जाते हैं, हर जोड़ा यंत्रवत उनके निर्देशों का पालन करता जाता है। न कोई हँसी-न ठिठोली, न आपस में कोई बातचीत न किसी तरह के कोई व्यवधान पैदा करने की कोशिश। कुछ जोड़े हवन वेदी पर बैठकर हवन की प्रक्रिया पूरी करते हैं। तीन घंटे गुजर जाते हैं, इसी बीच इन जोड़ों में से किसी ने न तो पानी की माँग की न अपनी तरफ से कोई सवाल उठाया। इस दृश्य की गंभीरता और इन आदिवासियों के चेहरों की भावनाओं को आप तभी समझ सकेंगे जब आप अपनी आँखों से ये दृश्य देखेंगे।

इसके बाद मंच पर मुंबई और सूरत से आए अतिथियों को स्वागत होता है। ये स्वागत मात्र औपचारिकता भर है क्यों कि किसी को भी अपने स्वागत में कोई रुचि नहीं, ये लोग तो यहाँ इसलिए आए हैं कि इन आदिवासी जोड़ों का वैवाहिक और सामाजिक जीवन सुखमय हो सके। कार्यक्रम में महाराष्ट्र के वनवासी कल्याण मंत्री श्री विष्णु सांवरा, जो इसी क्षेत्र के विधायक भी हैं, मौजूद रहते हैं।


इऩ आदिवासी जोड़ों के सामूहिक विवाह के इस आयोजन के सूत्रधार हैं श्री संजय पटेल। अगर उनका प्रोफेशनल परिचय दिया जाए तो मुंबई के एक बहुत बड़े कारोबारी परिवार से हैं, खुद इंजीनियर हैं और इंजीनियर के रुप में देश भर में बड़े बड़े प्लांट लगाए हैं, कई बड़ी देसी-विदेशी कंपनियों के साथ काम किया है। लेकिन एक दिन मन अचानक उचट गया और विगत 25 साल से आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासियों के लिए काम ही नहीं करते हैं, अपना पूरा जीवन इन्हें ही समर्पित कर दिया है। शानदार गाड़ी और शानदार बंगले के मालिक होने पर भी किसी साधु की तरह इन आदिवासियों के बीच रहते हैं। दिन भर में केवल देसी गाय का एक गिलास दूध पीते हैं, और कुछ भी खाते-पीते नहीं, अगर देसी गाय का दूध नहीं मिले तो अपना दिन ऐसे ही गुजार देते हैं। वो मंच पर इन आदिवासियों का दर्द बयान करते हैं कि कैसे सरकारी अधिकारी, पटवारी, सरपंच से लेकर तहसीलदार इनका शोषण करते हैं। सरकारी योजनाओं का जो लाभ इन आदिवासियों को मिलना चाहिए वो कैसे सरकारी मशीनरी हड़प जाती है। वो बताते हैं कि आज भी आदिवासी महिलाएँ सुबह 6 बजे घर से निकलकर रोज 45 किलोमीटर तक जंगल में भटकती है और लकड़िया लाकर बेचती है, फिर अपने घर के लिए लकड़ियाँ लाकर खाना बनाती है। उनके साथ उनके छोटे-छोटे बच्चे भी रोज इतना ही भटकते हैं।

शादी की प्रक्रिया पूरी होती है, इसके बाद मुंबई के श्री भागवत परिवार, और सूरत के भवन निर्माता श्री सूरज पोद्दार और अशोक चांडक, श्री भागवत परिवार मुंबई के श्री वीरेन्द्र याज्ञिक, श्री सुभाष चौधरी, श्री सुरेन्द्र विकल के साथ ही वेलस्पन के निदेशक श्री प्रकाश टाँटिया, मुंबई से ही आई श्रीमती शोभा राव और श्रीमती डेज़ी श्रीमती टाटियाँ, श्रीमती पोद्दार, श्रीमती चांडक आदि सभी महिलाएँ एक लाईन में खड़े हो जाते हैं, और अग्निकुंड के सात फेरे लेकर आने वाले हर एक जोड़े को अपनी कुछ सामान देते हैं, ताकि ये अपना घर सुव्यवस्थित ढंग से चला सकें। इस बार मुंबई के उद्योगपति और लिनेन जैसे उच्च गुणवत्ता वाले कपड़े के देश के दूसरे नंबर के निर्माता लिनेन ऐंड लिनेन के श्री सी.एल. अग्रवाल ने हर आदिवासी दुल्हे के लिए एक शर्ट पीस उपहार दिया।


विवाह में शामिल हुए सभी अतिथि इस हैरतअंगेज, आत्मीय, भावनाओं से सराबोर और अनुशासित आदिवासी समाज के विवाह समारोह को देखकर इस एहसास से भर जाते हैं कि हम मुंबई, सूरत जैसे महानगरों में बैठकर असली हिंदुस्तान से कितने दूर होते जा रहे हैं। श्री प्रकाश टांटिया और उनकी पत्नी का कहना था कि शहरी समाज के जो लोग अपने आपको शिक्षित और संस्कारित कहते हैं, उनको इन लोगों के पास आकर सीखना चाहिए कि संस्कार, शिक्षा और अनुशासन किसे कहते हैं। यहाँ जितने भी जोड़े आए हैं उनमें गज़ब का अऩुशासन तो है ही उनके आचार-व्यवहार में कहीं कोई हड़बड़ाहट और निराशा या हताशा का कोई भाव नहीं हैं, वो जहाँ हैं जैसे हैं अपने आप में आनंदित हैं।


दृश्य चारः दोपहर के लगभग डेढ़ बज चुके हैं…..सभी आदिवासी जोड़े और उनके साथ आए उनके परिवार वाले, गाँव वाले और छोटे-छोटे बच्चे जो सुबह से बगैर कुछ खाए पिये और यहाँ तक कि किसी ने पानी भी नहीं पिया है, भोजन की लाईन में लग जाते हैं, किसी को न तो लाईऩ में लगाना पड़ता है, न कोई लाईन तोड़ता है न कोई ये देखता है कि वह धूप में खड़ा है कि छाँव में। सभी लोग अपना खाना (चावल और सब्जी) लेकर आता है और फिर देखता है कि उसके परिवार वाले कहाँ हैं, जब लवह देखता है कि वो लाईन में लगा है तो वह उन सबका इंतजार करता है और फिर सभी लोग मिलकर जहाँ जगह मिलती है, वहाँ बैठकर खाना खा लेते हैं, जगह से मतलब धरती पर जहाँ न कुछ बिछाया गया है और धूप या छाँव किसी से कोई मतलब नहीं।


क्या हम शहरों में होने वाली शादियों में जहाँ संपन्न, पढ़ालिखा वर्ग शादी में शामिल होने आता है, कभी ऐसा दृश्य देख पाते हैं कि कोई इतने इत्मीनान से, इतने धैर्य से इतनी शांति से और अपने परिवार के सभी सदस्यों जिसमें बुजुर्ग और बच्चे भी शामिल हैं खाना खा रहा हो…..



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