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फिल्म समारोह में वृत्तचित्र निर्माताओं की समस्या पर सार्थक चर्चा

मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दुसरे दिन भारतीय डाक्यूमेंट्री प्रोडूसर एसोसिएशन ने डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्मातातओं को शूटिंग के दौरान अनुमति सम्बंधित समस्याओं पर चर्चा का आयोजन किया। चर्चा में मुख्य अतिथि फिल्म प्रभाग की डाइरेक्टर जनरल स्मिता शर्मा के अलावा डाक्यूमेंट्री फ़िल्मकार विभा बक्शी, सुरेश शर्मा, तरनजीत सिंह, आदित्य सेठ (दूरदर्शन) व सन्देश सालुंके (महाराष्ट्र फिल्म विभाग, फिल्म सिटी) ने इस मुद्दे पर कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ साझा की। वहीँ डाक्यूमेंट्री फिल्मकारों ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को भी लोगों के सामने रखा और बहुत से सुझावों की ओर ध्यान आकर्षित किया।

आदित्य सेठ ने चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि डाक्यूमेंट्री फिल्मों को हमारे देश में कोई खास वर्ग निर्धारित नहीं है जिसके चलते हम लोगों को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। परमीशन ना मिल पाने के चलते हमें ज्यादातर दौड़ भाग कर अपनी फिल्म शूट करनी पड़ती है ताकि कोई हमें पकड़ ना ले। साथ ही बजट का भी मसला होता है तो हम हर जगह परमिशन लेकर काम नहीं कर पाते। पहले मैं कई बार शूट के दौरान यह कह कर बच जाता था कि मैं दूरदर्शन से हूँ तो मुझे छोड़ देते थे लेकिन अब बहुत से चैनल होने की वजह से वहां भी कोई नहीं सुनता।

उसी क्रम में फ़िल्मकार विभा बक्शी ने बताया की जब वह अपनी डाक्यूमेंट्री सन राइज की शूटिंग हरियाणा में कर रही थीं तो उन्हें बहुत ही डर लगा रहता था क्योंकि उनकी फिल्म एक बलात्कार पीड़िता की कहानी पर आधारित है और रियल जगह पर शूट करने में खतरा था क्योंकि आरोपी बहुत ही सशक्त लोग थे और उनको शूटिंग के लिए किसी भी तरह की सुरक्षा नहीं मिली थी। अपनी बात को समेटते हुए उन्होंने कहा कि डाक्यूमेंट्री फिल्म कारों को अपना रास्ता खुस बनाना पड़ता है।

वहीँ फ़िल्मकार तरनजीत सिंह नामधारी ने श्रोताओं के बीच अपना अनुभव बांटते हुए कई महत्वपूर्ण बातें साझा की। उनकी फिल्म ग्रेट इंडियन एस्केप – खुले आसमां की ओर के निर्माण के दौरान जब वो उन लोगों से परमीशन लेने गए जिनके जीवन पर फिल्म आधारित थी तो वो लोग बहुत उत्साहित नहीं थे. फिर उनका कहना था कि डोक्यू – ड्रामा फिल्म बना रहे हो तो हीरो अक्षय कुमार को लो, वगैरह वगैरह. उसके बाद उनको परमिशन के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ी क्योंकि उनकी फिल्म डिफेंस सेवा के इतिहास पर आधारित है। तरनजीत सिंह ने बताया कि हमारे यहाँ डोक्यू – ड्रामा फिल्मों का चलन अभी भी विस्तृत रूप नहीं ले पाया है और उसको लेकर लोगों मेंइन बहुत सी भ्रांतियां हैं।

सुरेश शर्मा फिल्मकार ने चर्चा में अपनी भागीदारी देते हुए कहा कि मैंने बहादुरशाह जफ़र के ऊपर फिल्म बनायीं जो कि फिल्म विभाग से स्वीकृत फिल्म थी लेकिन फिर भी मुझे परमिशन के लिए बहुत मुश्किल आयी कई संस्थाओं के अलग अलग चक्कर लगाने पड़े, और जब परमिशन मिली तो बहुत सी जगहों पर बड़ी मोटो रकम फीस के रूप में देनी पड़ी। तो जब एक सरकारी प्रोजेक्ट के लिए हमें इतनी दिक्कत होती है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम फिल्मकारों को अपनी फिल्म बनाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते होंगे। सुरेश जी ने आगे आई डी पी ए और फिल्म विभाग से अनुरोध किया कि वो डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने वालों के लिए एक ऐसा मॉडल तैयार करें जिसमें एक ही जगह से सभी परमिशन मिल सकें और एक सीमित धनराशि में काम किया जा सके क्योंकि हम सभी इस बात से परिचित हैं कि डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकिंग में पैसे का बहुत अभाव रहा है।

ओपन फोरम के मंच पर मौजूद सन्देश सालुंके जो कि महाराष्ट्र फिल्म सेल, फिल्म सिटी की तरफ से भागीदारी कर रहे थे, ने अपनी बात शुरू करते हुआ कहा मुझे आप सब को यह बताते हुए ख़ुशी है कि महाराष्ट्र सरकार ऐसी एक एकल (सिंगल) खिड़की के मॉडल को तैयार कर चुकी है जो कि सफल रूप से शुरू हो चूका है और लोगों के बीच प्रचलित भी हो रहा है।

22 मई 2018 को महाराष्ट्र सरकार ने इस दिशा में तय किया था कि महाराष्ट्र में फिल्मों की शूटिंग के दौरान मिलने वाली परमिशन के लिए हम एक व्यस्था करेंगे और अगस्त 2019 में वह खिड़की लोगों के सेवा में शुरू हो चुकी है। इतना ही नहीं पिछले 4 महीनों के दौरान हम करीब 150 फिल्मों को इस माध्यम से परमिशन भी दे चुके हैं जिनमें 6 डाक्यूमेंट्री फिल्में भी शामिल हैं। महाराष्ट्र फिल्म सेल अभी सिर्फ मुंबई में ही सक्रिय है, जल्दी ही इसके क्षेत्र को और विस्तार दिया जाएगा। यह पूरी तरह से एक ऑनलाइन प्रक्रिया है जिसमें मात्र 15 दिनों के भीतर आप को जरूरत की परमिशन मिल जाती है। जिसके चलते विभिन्न सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने से लेकर लिखित आवेदनों से भी फिल्मकारों को राहत मिलेगी। महाराष्ट्र फिल्म सेल के अंतर्गत ऍम सी जी ऍम, पुलिस, पुरातत्व विभाग, बेस्ट, मुंबई महानगर बिजली सप्लाई बोर्ड, संजय गाँधी नेशनल पार्क, और इसी तरह की सभी सम्बंधित संस्थाएं संलग्न हैं। करीब 450 विभिन्न लोकेशनों को हम इसमें लिस्ट कर चुके हैं, जिनका विवरण पोर्टल पर मौजूद है। साथ ही फीस भी आपको ऑनलाइन ही भरनी होती है। सड़क पर शूटिंग के लिए 8000/- प्रति 12 घंटे के लिए भरना होता है जबकि लाइसेंस मिलने की फीस 7140 /- रूपये है। इसके अलावा एक सिक्योरिटी डिपोसिट 25000 /- का भी लिया जाता है जो कि बाद में वापस दे दिया जाता है।

महाराष्ट्र फिल्म सेल की फीस के बाबत सुनने के उपरांत मंच पर आसीन अतिथिओं और श्रोताओं ने कहा कि डाक्यूमेंट्री मेकर्स के लिए यह फीस बहुत ज्यादा है इसमें रियायत होनी चाहिए और विभिन्न प्रकार की फिल्मों के लिए अलग अलग फीस का ढांचा होना चाहिए। जिसपर सन्देश सालुंके जी ने लोगों को आशवस्थ करते हुए कहा कि वह इसका संज्ञान अपने अधिकारिओं को देंगे और कोशिश करेंगे कि लोगों के सुझाव के अनुसार उसमें यथा संभव परिवर्तन हो।

फोरम की चर्चा को अंतिम रूप देते हुए अपने संक्षिप्त व्याख्यान में डाइरेक्टर जनरल स्मिता जी ने कहा कि सरकार कुछ समय पहले से फिल्मकारों की परमिशन सम्बंधित समस्याओं को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यस्था कर चुकी है जो कि आसान भी है और सहूलियत से लोगों को समझ में भी आ जाता है, मैं आशा करती हूँ कि ऐसे कई मुद्दों पर हमें सरकार से सहयोग मिलता रहेगा।

 

 

 

 

 

(चारु शर्मा वृत्त फिल्म निर्माता हैं और फिल्म से जुड़े विषयों पर लिखती हैं)

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