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प्नाचीन भारत के मौसम वैज्ञानिक घाघ और भड्डरी

घाघ भड्डरी को प्राचीन भारत का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है। सैकड़ों सालों से घाघ और भड्डरी की कहावतें हमारे देश के किसानों के लिए मौसम की भविष्यवणी का काम करती आ रही है। दुर्भाग्य से आधुनिकता के मोह में नई पीढ़ी घाघ और भड्डरी के खगोलीय और मानसून संबंधी ज्ञान को नहीं समझ पाई। सैकड़ों साल बाद आज भी घाघ और भड्डरी की ये कहावतें खरी उतर रही है। घाघ और भड्डरी ने मौसम की भविष्यवाणी के साथ किस फसल के साथ कौनसी फसल कब और कैसे बोना चाहिए इसका भी बहुत सटीक वर्णन अपने दोहों के माध्यम से किया है।

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में बरसात के मौसम में चले वाला पानी पतरे का सट्टा घाघ और भड्डरी की कहावतों और दोहों के दम पर ही चलता था। पनी पतरे के सटोरिये इन दोहों और कहावतों के आधार पर सट्टा लगाते थे और ये किसी जमाने में उज्जैन और इन्दौर के सराफा क्षेत्र में लाखों रुपये का पानी पतरे का सट्टा होता था।

घाघ और भड्डरी के बारे में कई तरह की मान्यताएँ हैं। कोई उनको राजा भोज के काल का मानता है तो कोई अकबर के समय का। कई लोग घाघ और भड्डरी को अलग अलग जगहों का मानते हैं। लेकिन घाघ ने अपनी कहावतों और दोहों में सुन भड्डरी का उल्लेख कई बार किया है इससे लगता है कि दोनों या तो पति पत्नी थे या भाई बहन। ये जोे भी रहे हों और जिस काल में भी रहे हों लेकिन उन्होंने अपने खगोलीय और ज्योतिषीय ज्ञान से मौसम के मिजाज को जानने का एक ऐसा खजाना हमें सौंपा है जिस पर व्यापक शोध होना चाहिए ताकि इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि हो सके और लोक मान्यताओं में प्रचलित उनके इस ज्ञान का लाभ समाज के हर वर्ग को मिल सके।

उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान, खेती करै बनिज को धावै, ऐसा डूबै थाह न पावै। लिखकर खेती को श्रेष्ठ,व्यापार को मध्यम और नौकरी को निकृष्टबताने वाले घाघ भड्डरी की कहावतों और दोहों का एक एक शब्द हमें जीवन की उन वास्तविकताओं से परिचित कराता है जिन्हे हम आधुनिकता के पाखंड में भूल चुके हैं।

हमारी बोलचाल में घाघ शब्द आजकल किसी शातिर दिमाग व्यक्ति के लिए काम में लिया जाता है, इसकी वजह शायद यही है कि घाघ एक तेज दिमाग वाले व्यक्ति रहे होंगे जो अपने आसपास होने वाले मौसमीय परिवर्तनों को तिथियों और ग्रह नक्षत्रों की चाल से तुलना कर सटीक आकलन कर देते थे।

घाघ और भड्डरी की इन मजेदार कहावतों सो पढ़कर आप भी उनके बुध्दि चातुर्य पर गर्व किए बिना नहीं रह सकेंगे।

सर्व तपै जो रोहिनी, सर्व तपै जो मूर।
परिवा तपै जो जेठ की, उपजै सातो तूर।।
यदि रोहिणी भर तपे और मूल भी पूरा तपे तथा जेठ की प्रतिपदा तपे तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होंगे।

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।
यदि शुक्रवार के बादल शनिवार को छाए रह जाएं, तो भड्डरी कहते हैं कि वह बादल बिना पानी बरसे नहीं जाएगा।

भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय।
ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।।
यदि भादो सुदी छठ को अनुराधा नक्षत्र पड़े तो ऊबड़-खाबड़ जमीन में भी उस दिन अन्न बो देने से बहुत पैदावार होती है।

अद्रा भद्रा कृत्तिका, अद्र रेख जु मघाहि।
चंदा ऊगै दूज को सुख से नरा अघाहि।।
यदि द्वितीया का चन्द्रमा आर्द्रा नक्षत्र, कृत्तिका, श्लेषा या मघा में अथवा भद्रा में उगे तो मनुष्य सुखी रहेंगे।

सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय।
घर घर बजे बधावनो, दुखी न दीखै कोय।।
यदि पूस की अमावस्या को सोमवार, शुक्रवार बृहस्पतिवार पड़े तो घर घर बधाई बजेगी-कोई दुखी न दिखाई पड़ेगा।

सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय।
महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।।
यदि श्रावण कृष्ण पक्ष में दशमी तिथि को रोहिणी हो तो समझ लेना चाहिए अनाज महंगा होगा और वर्षा स्वल्प होगी, विरले ही लोग सुखी रहेंगे।

पूस मास दसमी अंधियारी। बदली घोर होय अधिकारी।
सावन बदि दसमी के दिवसे। भरे मेघ चारो दिसि बरसे।।
यदि पूस बदी दसमी को घनघोर घटा छायी हो तो सावन बदी दसमी को चारों दिशाओं में वर्षा होगी। कहीं कहीं इसे यों भी कहते हैं-‘काहे पंडित पढ़ि पढ़ि भरो, पूस अमावस की सुधि करो।

पूस उजेली सप्तमी, अष्टमी नौमी जाज।मेघ होय तो जान लो, अब सुभ होइहै काज।।
यदि पूस सुदी सप्तमी, अष्टमी और नवमी को बदली और गर्जना हो तो सब काम सुफल होगा अर्थात् सुकाल होगा।

अखै तीज तिथि के दिना, गुरु होवे संजूत। तो भाखैं यों भड्डरी, उपजै नाज बहूत।।
यदि वैशाख में अक्षम तृतीया को गुरुवार पड़े तो खूब अन्न पैदा होगा।

सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।बरसै तो झुरा परै, नाहीं समौ सुकाल।।
यदि सावन सुदी सप्तमी को आधी रात के समय बादल गरजे और पानी बरसे तो झुरा पड़ेगा; न बरसे तो समय अच्छा बीतेगा।

असुनी नलिया अन्त विनासै। गली रेवती जल को नासै।। भरनी नासै तृनौ सहूतो।
कृतिका बरसै अन्त बहूतो।।
यदि चैत मास में अश्विनी नक्षत्र बरसे तो वर्षा ऋतु के अन्त में झुरा पड़ेगा; रेवती नक्षत्र बरसे तो वर्षा नाममात्र की होगी; भरणी नक्षत्र बरसे तो घास भी सूख जाएगी और कृतिका नक्षत्र बरसे तो अच्छी वर्षा होगी।

आसाढ़ी पूनो दिना, गाज बीजु बरसंत।
नासे लच्छन काल का, आनंद मानो सत।।
आषाढ़ की पूणिमा को यदि बादल गरजे, बिजली चमके और पानी बरसे तो वह वर्ष बहुत सुखद बीतेगा।

रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय।
कहै घाघ सुने घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।।
यदि रोहिणी बरसे, मृगशिरा तपै और आर्द्रा में साधारण वर्षा हो जाए तो धान की पैदावार इतनी अच्छी होगी कि कुत्ते भी भात खाने से ऊब जाएंगे और नहीं खाएंगे।

उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि।
भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि।।
उत्तर नक्षत्र ने जवाब दे दिया और हस्त भी मुंह मोड़कर चला गया। चित्रा नक्षत्र ही अच्छा है कि प्रजा को बसा लेता है। अर्थात् उत्तरा और हस्त में यदि पानी न बरसे और चित्रा में पानी बरस जाए तो उपज अच्छी होती है।

खनिके काटै घनै मोरावै। तव बरदा के दाम सुलावै।।
ऊंख की जड़ से खोदकर काटने और खूब निचोड़कर पेरने से ही लाभ होता है। तभी बैलों का दाम भी वसूल होता है।

हस्त बरस चित्रा मंडराय। घर बैठे किसान सुख पाए।।
हस्त में पानी बरसने और चित्रा में बादल मंडराने से (क्योंकि चित्रा की धूप बड़ी विषाक्त होती है) किसान घर बैठे सुख पाते हैं।

हथिया पोछि ढोलावै। घर बैठे गेहूं पावै।।
यदि इस नक्षत्र में थोड़ा पानी भी गिर जाता है तो गेहूं की पैदावार अच्छी होती है।

जब बरखा चित्रा में होय। सगरी खेती जावै खोय।।
चित्रा नक्षत्र की वर्षा प्राय: सारी खेती नष्ट कर देती है।

जो बरसे पुनर्वसु स्वाती। चरखा चलै न बोलै तांती।
पुनर्वसु और स्वाती नक्षत्र की वर्षा से किसान सुखी रहते है कि उन्हें और तांत चलाकर जीवन निर्वाह करने की जरूरत नहीं पड़ती।

जो कहुं मग्घा बरसै जल। सब नाजों में होगा फल।।
मघा में पानी बरसने से सब अनाज अच्छी तरह फलते हैं।

जब बरसेगा उत्तरा। नाज न खावै कुत्तरा।।
यदि उत्तरा नक्षत्र बरसेगा तो अन्न इतना अधिक होगा कि उसे कुते भी नहीं खाएंगे।

दसै असाढ़ी कृष्ण की, मंगल रोहिनी होय।
सस्ता धान बिकाइ हैं, हाथ न छुइहै कोय।।
यदि असाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी को मंगलवार और रोहिणी पड़े तो धान इतना सस्ता बिकेगा कि कोई हाथ से भी न छुएगा।

असाढ़ मास आठें अंधियारी।जो निकले बादर जल धारी।।
चन्दा निकले बादर फोड़। साढ़े तीन मास वर्षा का जोग।।
यदि असाढ़ बदी अष्टमी को अन्धकार छाया हुआ हो और चन्द्रमा बादलों को फोड़कर निकले तो बड़ी आनन्ददायिनी वर्षा होगी और पृथ्वी पर आनन्द की बाढ़-सी आ जाएगी।

असाढ़ मास पूनो दिवस, बादल घेरे चन्द्र। तो भड्डरी जोसी कहैं, होवे परम अनन्द।।
यदि आसाढ़ी पूर्णिमा को चन्द्रमा बादलों से ढंका रहे तो भड्डरी ज्योतिषी कहते हैं कि उस वर्ष आनन्द ही आनन्द रहेगा।

रोहिनी जो बरसै नहीं, बरसे जेठा मूर। एक बूंद स्वाती पड़ै, लागै तीनिउ नूर।।
यदि रोहिनी में वर्षा न हो पर ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र बरस जाए तथा स्वाती नक्षत्र में भी कुछ बूंदे पड़ जाएं तो तीनों अन्न (जौ, गेहूं, और चना) अच्छा होगा।

गहिर न जोतै बोवै धान। सो घर कोठिला भरै किसान।।
गहरा न जोतकर धान बोने से उसकी पैदावार खूब होती है।

गेहूं भवा काहें।
असाढ़ के दुइ बाहें।। गेहूं भवा काहें। सोलह बाहें नौ गाहें।। गेहूं भवा काहें।
सोलह दायं बाहें।। गेहूं भवा काहें। कातिक के चौबाहें।।
गेहूं पैदावार अच्छी कैसे होती है ? आषाढ़ महीने में दो बांह जोतने से; कुल सोलह बांह करने से और नौ बार हेंगाने से; कातिक में बोवाई करने से पहले चार बार जोतने से।

गेहूं बाहें। धान बिदाहें।।
गेहूं की पैदावार अधिक बार जोतने से और धान की पैदावार विदाहने (धान का बीज बोने के अगले दिन जोतवा देने से,यदि धान के पौधों की रोपाई की जाती है तो विदाहने का काम नहीं करते, यह काम तभी किया जाता है जब आप खेत में सीधे धान का बीज बोते हैं) से अच्छी होती है।

गेहूं मटर सरसी। औ जौ कुरसी।।
गेहूं और मटर बोआई सरस खेत में तथा जौ की बोआई कुरसौ में करने से पैदावार अच्छी होती है।

गेहूं गाहा, धान विदाहा। ऊख गोड़ाई से है आहा।।
जौ-गेहूं कई बांह करने से धान बिदाहने से और ऊख कई बार गोड़ने से इनकी पैदावार अच्छी होती है।

गेहूं बाहें, चना दलाये। धान गाहें, मक्का निराये। ऊख कसाये।
खूब बांह करने से गेहूं, खोंटने से चना, बार-बार पानी मिलने से धान, निराने से मक्का और पानी में छोड़कर बाद में बोने से उसकी फसल अच्छी होती है।

पुरुवा रोपे पूर किसान। आधा खखड़ी आधा धान।।
पूर्वा नक्षत्र में धान रोपने पर आधा धान और आधा पैया (छूछ) पैदा होता है।

पुरुवा में जिनि रोपो भैया। एक धान में सोलह पैया।।
पूर्वा नक्षत्र में धान न रोपो नहीं तो धान के एक पेड़ में सोलह पैया पैदा होगा।

कन्या धान मीनै जौ। जहां चाहै तहंवै लौ।।
कन्या की संक्रान्ति होने पर धान (कुमारी) और मीन की संक्रान्ति होने पर जौ की फसल काटनी चाहिए।

कुलिहर भदई बोओ यार। तब चिउरा की होय बहार।।
कुलिहर (पूस-माघ में जोते हुए) खेत में भादों में पकने वाला धान बोने से चिउड़े का आनन्द आता है-अर्थात् वह धान उपजता है।

आंक से कोदो, नीम जवा। गाड़र गेहूं बेर चना।।
यदि मदार खूब फूलता है तो कोदो की फसल अच्छी है। नीम के पेड़ में अधिक फूल-फल लगते है तो जौ की फसल, यदि गाड़र (एक घास जिसे खस भी कहते हैं) की वृद्धि होती है तो गेहूं बेर और चने की फसल अच्छी होती है।

आद्रा में जौ बोवै साठी। दु:खै मारि निकारै लाठी।।
जो किसान आद्रा में धान बोता है वह दु:ख को लाठी मारकर भगा देता है।

आद्रा बरसे पुनर्वसुजाय, दीन अन्न कोऊ न खाय।।
यदि आर्द्रा नक्षत्र में वर्षा हो और पुनर्वसु नक्षत्र में पानी न बरसे तो ऐसी फसल होगी कि कोई दिया हुआ अन्न भी नहीं खाएगा।

आस-पास रबी बीच में खरीफ। नोन-मिर्च डाल के, खा गया हरीफ।।
खरीफ की फसल के बीच में रबी की फसल अच्छी नहीं होती।

तीतर बरनी बादरी, बिधवा काजर रेख |
वे बरसैं वे घर करें, कहें भड्डरी देख ||
तीतर के पंख की तरह बदली हो और विधवा की आँखों में काजल की रेखा हो तो भड्डरी कहते हैं कि बदली बरसेगी और विधवा दूसरा घर करेगी |

पुरबा बादर पच्छिम जाए, वासे वृष्टि अधिक बरसाए |
जो पच्छिम से पूरब जाए, वर्षा बहुत न्यून हो जाए ||
पूर्व दिशा से यदि बादल पश्चिम की ओर जा रहे हों तो वर्षा अधिक होगी | यदि पश्चिम से बादल पूर्व की ओर जा रहे हों तो वर्षा बहुत ही कम होगी |

रात निर्मली दिन को छाहीं, कहैं भड्डरी पानी नाहीं ||
रात निर्मल हो और दिन में बादलों की छाया दिखाई दे तो भड्डरी कहते हैं कि अब वर्षा नहीं होगी |

उतरे जेठ जो बोलें दादुर , कहैं भड्डरी बरसैं बादर ||
यदि जेठ उतारते ही मेढक बोलने लगें तो वर्षा जल्दी होगी |

आभा पीला | मेह सीला ||
आकाश पीला हो तो वर्षा कम होती है |

मंगल सोम होए सिवराती , पछियाँ बाय बहे दिन राती |
घोडा रोड़ा टिड्डी उड़ें, राजा मरें कि पार्टी पड़ें ||

यदि शिवरात्री मंगल या सोमवार को पड़े और रातदिन पश्चिम की हवा बहे, तो समझना चाहिए कि घोडा (एक प्रकार का पतिंगा), रोड़ा और टिड्डी उडेंगी; तथा राज की मृत्यु होगी या सूखा पड़ेगा, जिस से खेत परती पड़ा रहेगा |

कातिक सूद एकादसी, बादल बिजुली होय |
तो असाढ़ में भड्डरी, बरखा चोखी होए ||
कार्तिक शुक्ल एकादशी को यदि बादल हों और बिजली चमके, तो भड्डरी कहते हैं कि आषाढ़ में निश्चय वर्षा होगी |

सूरज तेज सुतेज, आड़ बोले अन्याली |
यदि माटी गल जाए, पवन फिर बैठे छाली ||
कीड़ी मेले इंड, छिड़ी रेट में नहावे |
कांसी कामन दौड़, आभलीलो रंग आवे ||
देब्रो डहक बाड़ा चढ़े, विसहर चढ़ बैठे बड़ाँ|
पांडिया जोतिस झूठा पड़ें, धन बरसैं इतर गुणाँ||

यदि धूप की तेजी बढ़ जाए, बत्तख चिल्लाने लगें, घी पिघल जाए, बकरी हवा के रुख पर पीठ करके बैठे, चींटियाँ अंडे लेकर चलें, गोरैया धुल में नहाए, कांसे का रंग फीका पद जाए, आकाश का रंग गहरा नीला हो जाए, मेढक काँटों की बाड़ में घुस जाएँ और सांप वृक्ष के ऊपर चढ़ कर बैठें, तो घनी वर्षा होगी | ज्योतिष का कथन झूठा हो सकता है, पर ये लक्षण मिथ्या नहीं हो सकते |

परिवा तपै जो रोहिनी, सर्व तपै जो मूर।

परिवा तपै जो जेठ की, उपजै सातो तूर।।

यदि रोहिणी भर तपे और मूल भी पूरा तपे तथा जेठ की प्रतिपदा तपे तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होंगे।

भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय।

ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।।

यदि भादो सुदी छठ को अनुराधा नक्षत्र पड़े तो ऊबड़-खाबड़ जमीन में भी उस दिन अन्न बो देने से बहुत पैदावार होती है।

अद्रा भद्रा कृत्तिका, अद्र रेख जु मघाहि।

चंदा ऊगै दूज को सुख से नरा अघाहि।।

यदि द्वितीया का चन्द्रमा आर्द्रा नक्षत्र, कृत्तिका, श्लेषा या मघा में अथवा भद्रा में उगे तो मनुष्य सुखी रहेंगे।

सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय। घर घर बजे बधावनो, दुखी न दीखै कोय।।

यदि पूस की अमावस्या को सोमवार, शुक्रवार बृहस्पतिवार पड़े तो घर घर बधाई बजेगी-कोई दुखी न दिखाई पड़ेगा।

सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय। महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।।

यदि श्रावण कृष्ण पक्ष में दशमी तिथि को रोहिणी हो तो समझ लेना चाहिए अनाज महंगा होगा और वर्षा स्वल्प होगी, विरले ही लोग सुखी रहेंगे।

पूस मास दसमी अंधियारी। बदली घोर होय अधिकारी।

सावन बदि दसमी के दिवसे। भरे मेघ चारो दिसि बरसे।।

यदि पूस बदी दसमी को घनघोर घटा छायी हो तो सावन बदी दसमी को चारों दिशाओं में वर्षा होगी।

काहे पंडित पढ़ि पढ़ि भरो, पूस अमावस की सुधि करो।

पूस उजेली सप्तमी, अष्टमी नौमी जाज। मेघ होय तो जान लो, अब सुभ होइहै काज।।

यदि पूस सुदी सप्तमी, अष्टमी और नवमी को बदली और गर्जना हो तो सब काम सुफल होगा अर्थात् सुकाल होगा।

अखै तीज तिथि के दिना, गुरु होवे संजूत। तो भाखैं यों भड्डरी, उपजै नाज बहूत।।

यदि वैशाख में अक्षम तृतीया को गुरुवार पड़े तो खूब अन्न पैदा होगा।

सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात। बरसै तो झुरा परै, नाहीं समौ सुकाल।।

यदि सावन सुदी सप्तमी को आधी रात के समय बादल गरजे और पानी बरसे तो झुरा पड़ेगा; न बरसे तो समय अच्छा बीतेगा।

असुनी नलिया अन्त विनासै। गली रेवती जल को नासै।।

भरनी नासै तृनौ सहूतो। कृतिका बरसै अन्त बहूतो।।

यदि चैत मास में अश्विनी नक्षत्र बरसे तो वर्षा ऋतु के अन्त में झुरा पड़ेगा; रेतवी नक्षत्र बरसे तो वर्षा नाममात्र की होगी; भरणी नक्षत्र बरसे तो घास भी सूख जाएगी और कृतिका नक्षत्र बरसे तो अच्छी वर्षा होगी।

आसाढ़ी पूनो दिना, गाज बीजु बरसंत। नासे लच्छन काल का, आनंद मानो सत।।

आषाढ़ की पूणिमा को यदि बादल गरजे, बिजली चमके और पानी बरसे तो वह वर्ष बहुत चैते वर्षा आई और सावन सूखा जाई।

एक बूंद जो चैत में परे सहसबूंद सावन की हरै।

घाघ कहते हैं यदि चैत के महीने में वर्षा होगी तो सावन के महीने में कम वर्षा होगी। यदि एक बूंद भी वर्षा की पड़ती है, तो वह सावन की हजार बूंदों को समाप्त कर देती है।

माघ के ऊमष जेठ के जाड़, पहिला वर्षा भरिगे ताल। कहैंघाघ हम होई बियोगी, कुआ खोदि के धोईहैं धोबी।

यदि माघ के महिने में जाड़े के बजाय गर्मी पड़े और जेठ में गर्मी के जगह जाड़ा पड़े व पहली वर्षा से तालाब भर जाये तो समझ लेना चाहिए कि इस वर्ष इतना सूखा पड़ेगा कि धोबियों को भी कपड़े धोने के लिए जल कुएं से खींचना पड़ेगा।

मंगल रथ आगे चलै, पीछे चले जो सूर। मन्द वृष्टि तब जानिये, पडती सगले धूर।।

यदि ग्रह-गौचर में मंगल आगे और सूर्य पीछे हो निश्चित ही सूखा पड़ता है।

आगे रवि पीछे चले, मंगल जो आषाड़। तौ बरसे अनमोल हो, पृथ्वी आनन्द बाढ़।

जिस वर्ष गौचर में सूर्य के पीछे मंगल रहते हैं उस साल वर्षा खूब होती है और पृथ्वी पर आनन्द होता है।

माघ में जो बादर लाल घिरै, सांची मानो पाथर परै।

यदि माघ के महीने में लाल रंग के बादल दिखाई दे तो निश्चय ही ओले पडते हैं।

जेठ चले पुरवाई, सावन सूखा जाई।

यदि जेठ के महिने में पुरवा हवा चले तो सावन के महिने में सूखा पड़ेगा, ऐसा मानना चाहिए।

रात दिन घम छाहीं, घाघ कहै अब बरखा नाही। पूनों पड़वा गाजै, दिना बहत्तर बाजै।।

रात दिन धूल छाई रहे तो वर्षा नहीं होगी, यदि जेठ के महिने में पूनो और परवा का बादल गर्जे तो समझ लो कि दो माह तक वर्षा नहीं होगी।

सवन शुक्ला सप्तमी, उगत न दीखै भान। तब तक वर्षा होइगी, जो लगि देवउठान।।

यदि सावन सुदी की सप्तमी को सूर्य बादल से ढका रहे तो देवउठान तक वर्षा होती है।

माघ पूस जो दखिना चले, तो सावन में लक्षन भले।

यदि माघ तथा पूस के महीने में दक्षिण दिशा की हवा चले तो सावन में अच्छी वर्षा होती है।

दिन में गर्मी रात को ओस, कहै घाघ वर्षा सौ कोष।

यदि दिन में गर्मी और रात को ओस पड़े तो वर्षा की कोई आशा नहीं है।

करिया बादल डरवावे, भुवरा बादल पानी लावे।

काला बादल केवल वर्षा का भय दिखाता है, जबकि भूरा बादल अच्छी वर्षा करता है।

उत्तम खेती जो हर गहा, मध्यम खेती जो सँग रहा
जो हल जोतै खेती वाकी, और नहीं तो जाकी ताकी

खाद पड़े तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत
गोबर राखी पाती सड़ै, फिर खेती में दाना पड़ै

सन के डंठल खेत छिटावै, तिनते लाभ चौगुनो पावै
गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दुनी फली

वही किसानों में है पूरा, जो छोड़ै हड्डी का चूरा
छोड़ै खाद जोत गहराई, फिर खेती का मजा दिखाई

सौ की जोत पचासै जोतै, ऊँच के बाँधै बारी
जो पचास का सौ न तुलै, देव घाघ को गारी

सावन मास बहे पुरवइया। बछवा बेच लेहु धेनु गइया।

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय। तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।

रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय। कहै घाघ सुन घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।

उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि।
भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि।

पुरुवा रोपे पूर किसान। आधा खखड़ी आधा धान

आद्रा में जौ बोवै साठी।दु:खै मारि निकारै लाठी।

पूस मास दसमी अंधियारी। बदली घोर होय अधिकारी।

सावन बदि दसमी के दिवसे। भरे मेघ चारो दिसि बरसे।

पूस उजेली सप्तमी, अष्टमी नौमी जाज। मेघ होय तो जान लो, अब सुभ होइहै काज।

अखै तीज तिथि के दिना, गुरु होवे संजूत। तो भाखैं यों भड्डरी, उपजै नाज बहूत।

सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात। बरसै तो झुरा परै, नाहीं समौ सुकाल।

असुनी नलिया अन्त विनासै। गली रेवती जल को नासै।

भरनी नासै तृनौ सहूतो। कृतिका बरसै अन्त बहूतो।

आसाढ़ी पूनो दिना, गाज बीजु बरसंत। नासे लच्छन काल का, आनंद मानो सत।

रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय। कहै घाघ सुने घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।

उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि। भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि।

खनिके काटै घनै मोरावै। तव बरदा के दाम सुलावै।

हस्त बरस चित्रा मंडराय। घर बैठे किसान सुख पाए।

हथिया पोछि ढोलावै। घर बैठे गेहूं पावै।

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