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हिंदी साहित्य को एक नई पहचान दी दूधनाथ सिंह ने

हिंदी के वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह का गुरुवार देर रात इलाहाबाद के फीनिक्स अस्पताल में निधन हो गया. दूधनाथ काफी लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थे. दूधनाथ सिंह की मौत के बाद पूरे साहित्य जगत के चेहरों पर उदासी छा गई है. उसने जुड़ा हर कवि, कथाकार और साहित्यकार उन्हें याद करके अपने तरीकों से श्रद्धांजलि दे रहे हैं. कोई मीडिया को संबोधित करके दूधनाथ को याद कर रहा है तो कोई सोशल मीडिया पर उनके साथ गुजारे पल को याद कर रहा है. श्री दूधनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश के सर्वोच्च साहित्य सम्मान भारत भारती, मध्य प्रदेश सरकार के मैथिलीशरण गुप्त सम्मान से भी सम्मानित किया गया था। मूलतः जनपद बलिया के रहने वाले श्री दूधनाथ सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सन् 1994 में अवकाश प्राप्त कर लेखन क्षेत्र में सक्रिय रहे। उन्होंने कई कालजयी रचनाएं देकर हिन्दी साहित्य जगत की अतुलनीय शुरुआत की।

दूधनाथ सिंह उन कथाकारों में शामिल हैं जिन्होंने नई कहानी आंदोलन को चुनौती दी और साठोत्तरी कहानी आंदोलन का सूत्रपात किया। ‘हिन्दी के चार यार’ के रूप में ख्यात ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह और रवीन्द्र कालिया ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में हिन्दी लेखन को नई धार दी। लेखकों की पीढ़ी तैयार की और सांगठनिक मजबूती प्रदान की। चार यार में अब सिर्फ काशीनाथ सिंह और ज्ञानरंजन ही बचे।

दूधनाथ सिंह ने हिंदी में कई कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचना समेत लगभग सभी विधाओं में पारंगत थे. साहित्य और उपन्यास में आखिरी कलाम, निष्कासन, नमो अंधकारम जैसे कई और नाम है. दूधनाथ ने ना सिर्फ कविता और कहानियों में बल्कि एक आम इंसान के मन को भी छूया. दूधनाथ की कविता संग्रह ‘एक और भी आदमी है’, ‘अगली शताब्दी के नाम’ और ‘युवा खुशबू’ हैं ने एक आम इंसान के जीवन को छुआ.

अपने लेखन के प्रति समर्पण को देखते हुए दूधनाथ को कई पुरस्कार से सम्मानित किया था. दूधनाथ सिंह को भारतेंदु सम्मान, शरद जोशी स्मृति सम्मान, कथाक्रम सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान और कई राज्यों का हिंदी लेखक का शीर्ष सम्मान मिला था. गौरतलब है कि मूल रूप से बलिया के रहने वाले दूधनाथ सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया और यहीं वह हिंदी के अध्यापक नियुक्त हुए. 1994 में सेवानिवृत्ति के बाद से लेखन और संगठन में निरंतर सक्रिय रहे। निराला, पंत और महादेवी के प्रिय रहे दूधनाथ सिंह का आखिरी कलाम ‘लौट आओ घर’ था.

सोशल मीडिया पर शोक की लहर
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने अपने शिक्षक रहे दूधनाथ सिंह को याद करते हुए अपनी फेसबुक वॉल पर पोस्ट लिखा है. उर्मिलेश ने अपने पोस्ट में लिखा, उन्हें थोड़ी देर पहले पता चला कि हमारे लेखक और अध्यापक दूधनाथ सिंह जी का निधन हो गया है. उनके स्वास्थ्य को लेकर पूरा हिंदी जगत परेशान था. सभी साहित्यकार प्रार्थना कर रहे थे कि वो सकुशल अपने अस्पताल से घर लौट आए, लेकिन कैंसर ने एक महान साहित्यकार को हमसे हमेशा के लिए छीन लिया.

उपन्यास : आखिरी कलाम, निष्कासन, नमो अंधकारम्
कहानी संग्रह : सपाट चेहरे वाला आदमी, सुखांत, प्रेमकथा का अंत न कोई, माई का शोकगीत, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे, तू फू, जलमुर्गिर्यों का शिकार
कविता संग्रह : अगली शताब्दी के नाम, एक और भी आदमी है, युवा खुशबू, सुरंग से लौटते हुए (लंबी कविता), तुम्हारे लिए, एक अनाम कवि की कविताएँ
नाटक : यमगाथा
आलोचना : निराला : आत्महंता आस्था, महादेवी, मुक्तिबोध : साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ
संस्मरण : लौट आ ओ धार, सबको अमर देखना चाहता हूँ
साक्षात्कार : कहा-सुनी
संपादन : तारापथ (सुमित्रानंदन पंत की कविताओं का चयन), एक शमशेर भी है, दो शरण (निराला की भक्ति कविताएँ), भुवनेश्वर समग्र, पक्षधर (पत्रिका – आपात काल के दौरान एक अंक का संपादन, जिसे सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया)

सम्मानः भारत भारती सम्मान, भारतेंदु सम्मान, शरद जोशी स्मृति सम्मान, कथाक्रम सम्मान, साहित्य भूषण



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