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मोबाईल एप्स का बढ़ता कारोबार

जंग के हालात में जीत केवल हथियार विक्रेताओं की होती है। और वीडियो ऐप की दुनिया के हथियार विक्रेता तो विषय सामग्री तैयार करने वाले लोग ही हैं। व्यूक्लिप के मुख्य कार्याधिकारी निखिल जकतदार जब इन पंक्तियों को दोहराते हैं तो उनका आशय भारत में ऑनलाइन विषय सामग्री के विकास में लगे लोगों की मौज से है। खुद व्यूक्लिप के व्यू, सोनीलिव, प्रेसप्ले, फास्टफिल्म्ज, नेक्सजीटीवी, वूट, स्पल, एमेजॉन प्राइम और नेटफ्लिक्स जैसे दर्जनों ऐसे ऐप हैं जो मोबाइल पर वीडियो सामग्री मुहैया करा रहे हैं। दुनिया भर में भारत को सबसे तेजी से उभरता वीडियो बाजार माना जा रहा है और ये कंपनियां इसका अधिकतम लाभ उठाने के लिए 100 करोड़ से लेकर 500 करोड़ रुपये तक लगा रही हैं। हालांकि अभी भारत का मोबाइल वीडियो बाजार काफी अस्त-व्यस्त हालत में है और इस पर शुरुआती पकड़ बनाने के लिए कड़ी प्रतिस्पद्र्धा देखी जा रही है। हालांकि गूगल का यूट्यूब अब भी 50 फीसदी बाजार हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा वीडियो प्लेटफॉर्म बना हुआ है। भारत में वीडियो प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले करीब 11 करोड़ ग्राहक हैं और इन पर दिए जाने वाले विज्ञापनों से करीब 2,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है।

भारत में इंटरनेट का तेजी से प्रसार होने के साथ ही डेटा शुल्क भी बड़ी तेजी से कम हुए हैं जिसकी वजह से मोबाइल पर वीडियो देखने की प्रवृत्ति में उछाल आया है। डेटा शुल्क कम होने का फायदा उठाते हुए इन वीडियो ऐप ने अब छोटे वीडियो की तुलना में बड़े वीडियो देने शुरू कर दिए हैं। इससे वीडियो देखने में लगने वाला समय बढ़ गया है जिससे विज्ञापनों से होने वाली कमाई भी बढ़त पर है। इसका नतीजा यह हुआ है कि नेटफ्लिक्स पर पेश हाउस ऑफ काड्र्स जैसे बड़े हिट शो की तलाश बढ़ गई है।

अब जरा इस पर नजर डालते हैं कि लोगों के बीच अपनी पहुंच और पहचान बनाने के लिए ये वीडियो प्लेटफॉर्म कैसी रणनीति अपना रहे हैं? स्टार इंडिया के साथ ही रिलायंस जियो और एमेजॉन प्राइम भी देश की सबसे बड़ी खेल स्पद्र्धा इंडियन प्रीमियर लीग के अधिकार के लिए बोली लगाने जा रहे हैं। विश्लेषकों का कहना है कि इन बड़े खिलाडिय़ों के मैदान में उतरने से प्रसारण अधिकार की बोली वर्ष 2008 में सोनी पिक्चर्स की तरफ से दी गई रकम की तिगुनी तक हो सकती है। अंग्रेजी में आने वाले टीवी शो के प्रसारण अधिकार के लिए चुकाई गई रकम से इस प्रतिस्पद्र्धा को समझा जा सकता है। व्यूक्लिप ने हाल में फिल्म निर्देशक विक्रम भट्टï को मौलिक कार्यक्रमों के लिए अपने साथ जोड़ा है। बेहद लोकप्रिय ऑनलाइन सामग्री निर्माता एआईबी इस समय खासकर एमेजॉन प्राइम के लिए मौलिक सीरीज मिनिस्ट्री बना रहा है। एआईबी के सह-संस्थापक तन्मय भट्टï कहते हैं कि ऑनलाइन सामग्री बनाने वाली कंपनियों के लिए यह अद्भुत समय है क्योंकि हर कोई इस पर दांव लगाने के लिए तैयार है।

दर्जनों उदाहरण देखे जा सकते हैं जिनमें बड़ी तकनीकी, प्रसारक कंपनियां या स्टार्टअप मौलिक सामग्री के विकास से खुद को संबद्ध कर रहे हैं। टेलीविजन चैनल किसी काल्पनिक कहानी पर आधारित या रियलिटी शो के निर्माण पर प्रति एपिसोड आठ लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक खर्च करते हैं। ऐसे में ऑनलाइन सामग्री तैयार करना काफी सस्ता पड़ रहा है। टेलीविजन का बाजार वर्ष 2015 में 90 करोड़ दर्शकों के साथ 47,500 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। इस लिहाज से ऑनलाइन सामग्री कारोबार के विकास की असीम संभावनाएं नजर आती हैं।

पैमाना थोड़ा अलग है लेकिन ऑनलाइन के पास विषय सामग्री की विविधता है। भारत में डिजिटल बाजार अभी विस्तार के चरण में है लिहाजा प्रसारकों को सख्त मूल्य नियमन वाले माहौल में अपनी सामग्री पेश करनी पड़ती है। भारत में अब भी अधिकतर घरों में इकलौता टेलीविजन सेट होता है और पूरा परिवार इक_ïे होकर कार्यक्रम देखता है। इस वजह से टेलीविजन की विषय सामग्री में विविधता की संभावनाएं कम हो जाती हैं। प्रोडक्शन हाउस बालाजी टेलीफिल्म्स की संयुक्त प्रबंध निदेशक एकता कपूर ने गत वर्ष टेलीविजन को बड़े जनसमूह वाला माध्यम बताते हुए कहा था कि वह अपने वीडियो प्लेटफॉर्म आल्ट बालाजी पर नई तरह की सामग्री पेश करने जा रही हैं जिनमें वयस्क विषय पर आधारित कार्यक्रम भी होंगे। इस माध्यम में नई विषयवस्तु और विधा के लिए पर्याप्त गुंजाइश नजर आती है। वीडियो ऐप के लिए एक और अनुकूल पहलू यह है कि इसकी सामग्री पर उतनी कड़ी नजर नहीं होती है जितनी किसी फिल्म पर रखी जाती है। हालांकि भारतीय दंड संहिता और अन्य कानून इस पर भी समान रूप से लागू होते हैं।

स्मार्टफोन उपभोक्ता अपनी सहूलियत के हिसाब से वीडियो ऐप पर कभी भी सामग्री देख सकते हैं और इस वजह से सामग्री निर्माताओं पर सबकी पसंद का कार्यक्रम बनाने का दबाव नहीं रह गया है। इस उद्योग में अधिकांश वीडियो ऐप अलग-अलग सोच और पसंद वाले लोगों के लिए अलग सामग्री पेश करने की रणनीति का पालन कर रहे हैं। लेकिन विज्ञापनों के वर्चस्व के मामले में वीडियो प्लेटफॉर्म भी परंपरागत टेलीविजन बाजार की ही तरह संचालित हो रहे हैं। फर्क बस इतना है कि टीवी विज्ञापनों की तुलना में ऑनलाइन विज्ञापन की दरें सस्ती हैं। इसके अलावा दर्शक ऑनलाइन वीडियो प्लेटफॉर्म को शुल्क देकर कार्यक्रम देखना पसंद नहीं करते हैं जिससे कई वीडियो ऐप को आखिरकार मुफ्त सेवाएं देनी पड़ी हैं। ऐप फर्म को आर्थिक स्तर पर निजी इक्विटी फंड, वेंचर कैपिटल या अन्य कारोबार से मदद मिल रही है। मनोरंजन के इस नए माध्यम की आर्थिक सक्षमता की असली परख तो तब होगी जब विज्ञापनदाता या दर्शक अधिक शुल्क देने के लिए तैयार होंगे।

साभार- http://hindi.business-standard.com/ से

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