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आधुनिक धन्वंतरी डॉ. श्री बालाजी तांबे नहीं रहे

देश के महान आयुर्वेदाचार्य और पूरी दुनिया में आयुर्वेद, पंचकर्म और भारतीय संस्कृति, को स्थापित करने वाले महान आयुर्वेदाचार्य डॉ. श्री बालाजी तांबे का आज कार्ला स्थित उनके आत्म संतुलन ग्राम में निधन हो गया। वे अपने पीछे पत्नी, दो पुत्र और भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। बालाजी तांबे का जाना एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई होना मुश्किल है। उन्होंने अकेले ने आयुर्वेद, जड़ी-बूटियों से लेकर भारतीय जीवन मूल्यों के संरक्षण व संवर्धन के लिए जो काम किया वो कई व्यक्ति और कई संस्थाएँ मिलकर भी नहीं कर सकते थे।

30 जून को डॉ. श्री बालाजी तांबे अपने जीवन के 81 वसंत पूर्ण कर 82 वाँ जन्म दिन तुला दान के भव्य शास्त्रीय कार्यक्रम के साथ मनाया था।

अपनी इस 81 वर्ष की जीवन यात्रा में डॉ. श्री बालाजी ने अकेले वो काम कर दिखाया है जो बड़े बड़े कॉर्पोरेट घराने या केंद्र व राज्य की सरकारें मिलकर भी नहीं कर पाती है। पेशे से इंजीनियर मगर पूरा जीवन आयुर्वेद को संमर्पित ही नहीं कर दिया बल्कि आयुर्वेद में छुपे कई रहस्यों और गुणों को सर्वसाधारण के लिए सुलभ कर दिया।

30 जून को 82 वें जन्म दिन पर प्रतिष्ठित वैदिक पंडितों द्वारा शुध्द शास्त्रीय पध्दति से वैदिक ऋचाओँ की प्रस्तुति। संगीत, अध्यात्म व सनातन परंपरा का ये एक ऐसा अभिनव आयोजन किया जिसमें भारतीय संस्कृति वो पहलू सामने आया कि जीवन में जो भी पाया है उसके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए समाज को उसका हिस्सेदार बनाने का भाव पैदा करता है। बाला जी ने इस मौके पर उपस्थित अपने प्रिय व स्नेही जनों के उपहार देकर अपनी कृडतज्ञता व्यक्त की थी।

बाला जी ने आयुर्वेद को कमाई का जरिया नहीं बनाया बल्कि आयुर्वेद के माध्यम से पूरी दुनिया में भारत की इस महान परंपरा को पूरे सम्मान और गौरव के साथ प्रतिष्ठित किया। डॉ. श्री बालाजी तांबे से मिलना ऐसा ही था जैसे आप अपनी सनातन संस्कृति की प्राचीन धाराओं में डुबकी लगाकर तरोताज़ा हो रहे हैं। आयुर्वेद और संगीत से लेकर उन्होंने कई गंभीर बीमारियों पर शोध कर कई असाध्य रोगियों को स्वस्थ कर उन्हें नया जीवनदान दिया। उनकी लिखी गर्भ संस्कार पुस्तक नवविवाहित जोड़ों के लिए एक वरदान बनकर आई है और इस पुस्तक की वजह से देश को एक ऐसी नई पीढ़ी मिल रही है जो सनातन संस्कारों को अंगीकार करते हुए अपनी जीवनयात्रा आगे बढ़ाएगी। गर्भ संस्कार पुस्तक का विमोचन मुंबई में अमिताभ बच्चन, स्व. बाल ठाकरे और उध्दव ठाकरे ने किया था। मराठी भाषा में प्रकाशित ‘आयुर्वेदीय गर्भसंस्कार’ पुस्तक की ६ लाख प्रतियाँ बिक चुकी है।

यू ट्यूब पर उनके लाखों फॉलोअर्स हैं और इसके माध्यम से छोटी मोटी बीमारियों से लेकर गंभीर बीमारियों को लेकर उनके आयुर्वेदिक नुस्खे भारत के साथ ही विदेशों में भी लोकप्रिय थे।

निस्तब्धता, शांति, सुकून, अध्यात्म और संतुलन जैसे शब्द पढ़ने और सुनने में तो बहुत अच्छे लगते हैं लेकिन जब आप खुद इन शब्दों को नहीं बल्कि इनके मौन अस्तित्व को गहराई से अनुभूत करते हैं तो आप किसी दैवीय रोमांच से भर जाते हैं। आपको लगता है जैसे जीवन की आपाधापी में, चिलचिलाती धूप में तेजी से भाग रहे हों और अचानक चाँदनी रात का सौंदर्य आपके अंदर उतर आया हो। कुछ ऐसा ही अध्यात्मिक अनुभव होता है, कार्ला के आत्म संतुलन ग्राम में। यहाँ आकर आपको ऐसा लगता है मानों आप बीच समुद्र में खड़े हैं और तूफानी लहरें एकदम शांत होकर आपसे एकाकार हो गई है।

आज बालाजी के बगैर पूरा आत्मसंतुलन ग्राम खामोशी की चादर ओढ़े हुए है।

बालाजी तांबे ने मुंबई से मात्र 200 किलोमीटर दूर लोनावाला आत्म संतुलन विलेज नामका एक ऐसा आरोग्य तीर्थ विकसित किया जहाँ 5 हजार साल से ज्यादा पुरानी आयुर्वेदिक व वैदिक जीवनशैली देश और दुनिया के लोगों का आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। आधुनिक कॉटेजों, प्राकृतिक सौंदर्य और हजारों पेड़ पौधों व आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की खुशबू में रचा-बसा ये परिसर आपको अतीत के गौरवशाली भारत के किसा वैदिक ग्राम या ऋषि मुनि के आश्रम का एहसास कराता है। जहाँ आपको भारतीयों से ज्यादा विदेशी दिखाई देते हैं।

स्व. डॉ. श्री बालाजी तांबे का बचपन एक आम ब्राह्मण परिवार के बच्चे के बचपन जैसा था। तब उनके परिवार के लोग घर घर जाकर पूजा पाठ करते थे और कबी दो रुपये तो कभी पाँच रुपये मिल जाते थे। तब देश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई का बड़ा आकर्षण था। उनके एक रिश्तेदार ने कहा कि तुम ये पंडिताई का काम छोड़ो और इंजीनियर बनो, तुम्हारी पढ़ाई का खर्च मैं उठाउंगा। तब बालाजी के लिए एक पेंसिल खरीदना भी मुश्किल था।

खैर, बालाजी ने गोल्ड मैडल के साथ इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और 110 रुपये महीने की नौकरी से अपने कैरियर की शुरुआत की।

बालाजी 1980 में बड़ौदा से पूना आए। यहाँ टाटा समूह में नौकरी करते हुए वे लोगों को आयुर्वेदिक दवाईयाँ खुद बनाकर देते थे, क्योंकि उनका परिवार बड़ौदा के राजपरिवार में राजवैद्य के रूप में जुड़ा रहा था। उनको लगता था कि मैने अपने मेरे परिवार से आयुर्वेद का जो ज्ञान और संपदा हासिल की है, उसका लाभ हर व्यक्ति को मिलना चाहिए। अपने इसी संकल्प के साथ वे हर किसी का ईलाज करने लगे।

तब पूना में रजनीश (ओशो) का कोरोगाँव स्थित आश्रम देशी औरो विदेशी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुका था। रजनीश के आश्रम में लोग अध्यात्मिक ज्ञान और ध्यान के लिए आते थे, लेकिन उनके मन में भारतीय आयुर्वेद और योग के प्रति भी आकर्षण था। इस आश्रम में कोई विदेशी बीमार हो जाता तो वो आयुर्वेदिक पध्दति से ईलाज करवाने को उत्सुक रहता था। उसकी ये चाहत उसे बालाजी के पास खींच ले जाती थी। धीरे-धीरे बालाजी का परिचय रजनीश के उन शिष्यों से हो गया जो अध्यात्म और आयुर्वेद को जानने व समझने के उत्सुक रहते थे। इस तरह रजनीश के आश्रम में लोग मौज मस्ती और ध्यान के लिए जाते थे तो बीमार होने पर आयुर्वेदिक ईलाज के लिए बालाजी तांबे के पास। बालाजी द्वारा खुद बनाई जाने वाली आयुर्वेदिक दवाओँ का लोगों पर चमत्कारिक असर होने लगा। एक तो बालाजी किसी से दवाई का पैसा नहीं लेते थे, और ऊपर से वे खुद ही दवाईयाँ बनाते थे।

पुणे के शिवाजीनगर के जिस छोटे से घर में बालाजी लोगों को दवाई देते थे वहाँ मरीजों के बैठने तक की जगह नहीं थी। एक बार भयंकर बारिश हो रही थी और घर के बाहर कंपाउंड में 200 लोग छतरी लगाकर दवा लेने के लिए बैठे थे। ये दृश्य ओशो के विदेशी शिष्यों के लिए चौंकाने वाला था, ये बात उनकी कल्पना से भी बाहर थी कि एक इंजीनियर प्राचीन भारतीय आयुर्वेद की दवाईयाँ इतनी प्रमाणिकता के साथ देता है कि गंभीर से गंभीर मरीज भी ठीक हो जाता है।

बालाजी की ये निःस्वार्थ सेवा देखकर ओशो के कुछ जिज्ञासु शिष्यों ने उनसे आग्रह किया कि वे कोई आयुर्वेदिक केंद्र शुरु करे ताकि आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार बड़े स्तर पर हो। लेकिन बालाजी के पास इतना पैसा ही नहीं था और न उनके पास काम करने वाले कोई लोग थे, जिनकी मदद से वे ऐसा केंद्र चला सके। लेकिन जर्मनी से आए कुछ युवाओँ ने बालाजी से कहा कि हम आपके साथ काम करेंगे, हम आयुर्वेद को सीखेंगे भी और आपके साथ आप जब तक चाहे रहेंगे भी। उनके इस हौसले को देखकर बालाजी ने भी इस दिशा में सोचना शुरु कर दिया। बालाजी ने कहा कि मुझे कम से कम 6 लोग चाहिए ताकि मैं इस दिशा में कार्य कर सकूँ। सबने तत्काल स्वीकृति दे दी। फिर बालाजी ने इन विदेशी युवाओँ के माता-पिता से बात की कि आपके बेटे -बेटियाँ मेरे साथ काम करना चाहते हैं, अगर आपको इसमें कोई आपत्ति हो तो मुझे बताएँ। लेकिन सबके माता-पिता इस पर राजी हो गए।

उन्होंने मुंबई और पूना के बीच लोनावाला में केंद्र शुरु करने का संकल्प लिया, क्योंकि वे चाहते थे कि ये केंद्र ऐसी जगह हो जो रोड़ से लगा हो और कोई भी आसानी से यहाँ पहुँच सके, साथ ही पूरा वातावरण प्राकृतिक भी हो। इस तरह कुछ विदेशी युवाओँ के संकल्प और आयुर्वेद प्रेम की वजह से बालाजी ने आयुर्वेद पधद्ति से एक केंद्र शुरुआत की। लोनावाला के पास ही महाराष्ट्र राज्य पर्यटन विकास निगम (एमटीटीसी रिज़ॉर्ट)के की कॉटेज बने हुए है, जो थे तो पर्यटकों के लिए मगर वहाँ कोई आता ही नहीं था। ये कॉटेज एक गुजराती परिवार ने दमा के मरीजों को रहने के लिए बनाए थे और बाद में इसे पर्यटन विकास निगम को सौंप दिया था।

1982 में बालाजी ने एमटीडीसी रिज़ॉर्ट को किराये पर लेकर केंद्र शुरु कर लोगों का ईलाज करना शुरु कर दिया। यहाँ पाँच हजार साल पुरानी आयुर्वेदिक पध्दति से पंचकर्म किए जाने का लोगों पर चमत्कारिक लाभ होने लगा। बालाजी के विदेशी शिष्य भी पूरी निष्ठा और संकल्प के साथ उनसे जुड़े रहे और आज भी जुड़े हुए हैं।

एमटीडीसी रिज़ॉर्ट के पास ही खाली जमीन थी जहाँ बालाजी केंद्र शुरु करना चाहते थे, लेकिन जमीन खरीदने के लिए पैसे तो थे ही नहीं। ऐसे में उनकी सहधर्मिणी वीनाजी तांबे आगे आई और उनके पास जो मामूली रकम थी उसे गिरवी रखकर जमीन लेने का हौसला दिया। खाली जमीन पर चारों तरफ कैक्टस उगे हुए थे। जमीन लेकर बालाजी ने इस पर वृक्षारोपण का काम शुरु किया ताकि ईलाज करवाने आने वाले लोगों को पेड़ों की छाया मिल सके। बालाजी ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर पूरे क्षेत्र में ढाई हजार पेड़ लगा दिए। लेकिन इस क्षेत्र में केकड़े इतने थे कि सब पेड़ों को फलने फूलने के पहले ही खा जाते थे। इसके बावजूद बालाजी ने अपना ये अभियान जारी रखा। वे यहाँ लगातार आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के पौधे लगाते रहे। फिर यहाँ 25 गायों से गौशाला शुरु कर की। गायों के लिए यहीँ पर मक्का की खेती भी शुरु की। इस तरह इस जंगल में एक ऐसा केंद्र आकार ले रहा था जो आज आत्मसंतुलन ग्राम के रूप में पूरी दुनिया में भारतीय, योग, संगीत और ध्यान का परचम फहरा रहा है। जो विदेशी युवा बालाजी से 1982 में जुड़े थे वे आज भी बालाजी के साथ पूरे समर्पण भाव से अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। उन्होंने अपनी जर्मन नागरिकता छोड़कर भारतीय नागरिकता ले ली और आज वे भारतीय पासपोर्ट धारी हैं।

इसी बीच एक मजेदार घटना हुई। जब जर्मन नागरिकों ने भारतीय पासपोर्ट नागरिकता व पासपोर्ट के लिए आवेदन किया तो तत्कालीन गृह मंत्री श्री एसबी चव्हाण ने बालाजी से कहा कि भारत के लोग तो विदेशों में जाकर वहाँ की नागरिकता और पासपोर्ट हासिल करना चाहते हैं, लेकिन आप ऐसा क्या चमत्कार कर रहे हैं कि विदेशी लोग भारतीय पासपोर्ट लेने को उत्सुक हैं। ये 25 विदेशी आज भी बालाजी के पास योग आयुर्वेद, संगीत आदि सीख रहे हैं, और उनके पूरे केंद्र को व्यवस्थित रूप से चलाने में सहयोग भी कर रहे हैं। जो युवा 25 की उम्र में बालाजी के साथ काम करने आए आज वे 50-55 से ऊपर के हो चुके हैं और उनकी निष्ठा में कोई कमी नहीं आई है।

इस केंद्र में आज 2 लाख से ज्यादा लोगों का उपचार किया जा चुका है, जिसमें कई गंभीर व वंशानुगत बीमारियों से पीड़ित लोग भी है। इस केंद्र पर इन सभी मरीजों की बीमारी से लेकर इनको दिए गए उपचार का विस्तृत ब्यौरा है जिस पर शोध किया जाए तो आयुर्वेद, योग, ध्यान और संगीत से मानव शरीर पर होने वाले प्रभाव के चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

विनम्र श्रध्दांजलि … ॐ शांति …

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