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मोदी राज में तो हि्न्दी की और दुर्गति कर दी सरकारी बाबुओं ने

जब नवभारत टाइम्स में एक सरकारी विज्ञापन देखा तो अचानक पाक्षिक पत्रिका सरिता की याद आ गई। तब मैं उसी संस्थान में था। एक बार रिपोर्टिंग के लिए इलाहाबाद गया था। वहां एक अधिकारी ने मेरी काफी आवभगत की और बातों ही बातों में कहने लगा कि भई मान गए। सरिता तो एकदम लाइफब्वाय साबुन की तरह से है। पिछले 30-35 सालों में कुछ भी नहीं बदला है। वही कलेवर, वही सामग्री, वैसा ही स्तंभ। ठीक जैसा कि इस साबुन के साथ है कि वही पुराना लाल रंग, वही पुरानी महक और तो और वही पुराना फुटबाल खेलते हुए खिलाड़ियों वाला विज्ञापन।  तब सरिता में एक स्तंभ छपता था कि यह किस देश, प्रदेश की भाषा है? इसमें हिंदी की ऐसी तैसी करने वाली रचनाओं, अनुवादों, कृतियों को छापा जाता था। आज इसका जिक्र करना इसलिए जरुरी हो गया क्योंकि जब अच्छे दिनों का सपना दिखाने वाले व हिंदी भाषा पर गर्व करने वाले नरेंद्र मोदी सत्ता में आएं तो लगा कि कम से कम हमारी मातृभाषा के दिन तो जरुर बहुरेंगे।

जहां एक ओर वे नियम-कानूनों को सरल बनाने की बात कर रहे हैं तो कम से कम हिंदी के साथ होने वाले अन्याय को तो जरुर रोकेंगे, पर इस विज्ञापन में जिस तरह से अंग्रेजी के मूल का हिंदी में अनुवाद हुआ है उसे देखकर लगता है कि जो कुकर्म चंद अपराधियों ने 16 दिसंबर की रात निर्भया के साथ किया था, वही काम यह सरकारी बाबू हिंदी के साथ करने पर आमादा है।

लगभग आधे पेज के इस विज्ञापन का शीर्षक है कि विश्व पुस्तक तथा प्रतिलिप्याधिकार दिवस। नीचे लिखा है कि प्रतिलिप्याधिकार (कॉपीराइट) का सम्मान …। विज्ञापन के इसी पैरे में कहा गया है प्रतिलिप्याधिकार प्राप्त कृति के रचयिता अथवा स्वामी की कृतियों से संबंधित कतिपय विशिष्ट आर्थिक अधिकार होंगे। लेखक की सेवा संविदा के अधीन रोजगार के दौरान किए गए किसी कृति के मामले में किसी विपरीत करार की अनुपस्थिति में नियोजनकर्ता ही प्रतिलिप्याअधिकार का प्रथम स्वामी होगा…. लेखकत्व का आरोपन का अधिकार तथा सत्यनिष्ठा और सम्मान का अधिकार इस अधिनियम के तहत मान्य नैतिक अधिकार है। … आगे सृजनशीलता को संबंधित करने तथा प्रकाशित कृतियों के व्यवहार्य सुलभता हेतु उचित उपयेाग में सार्वजनिक हित के संरक्षण हेतु, संविधि में स्वामी के प्राधिकृत किए जाने बिना ही प्रतिलिप्याधिकृत कार्यों के अनेक प्रकार से उपयोग के लिए तथा सर्वाधिक अथवा अनिवार्य लाइसेंस जारी करने के लिए प्रावधान है। ….. यह सब पढ़कर लगा कि मैं अपना सिर पीट लूं। हिंदी मेरी मातृभाषा है।  पिछले 45 साल से मैं हिंदी में लिख रहा हूं, छप रहा हूं। कम से कम मेरी समझ में तो यह नहीं आया कि जो कुछ हिंदी में लिखा गया है उसका मतलब क्या हैं! मामला यहीं तक सीमित नहीं आगे कहा गया है कि प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम में संशोधन किया गया है जिसके द्वारा नेत्रहीन, दृष्टिबाधित और देख न पाने वालों के लिए रुपांतरित, पुर्नत्पादन करने… मेरी समझ से परे है कि नेत्रहीन, दृष्टिबाधित और देख न पाने वाले में क्या अंतर होता है?

जरा और देखिए प्रतिलिप्याधिकार का अतिलंघन…तब होता है…. किसी कृति के अनाधिकृत वाणिज्यिक शोषण से…। इंसान का शोषण तो सुना था पर यहां तो कृति का भी शोषण हो रहा है। … कृति की यथार्थ प्रतियों… आप जिसके द्वारा सृजनात्मक वातावरण के संवर्धन में सहायता मिलती है। वगैरह-वगैरह! यह विज्ञापन साबित करता है कि अभी तक न तो हमने हिंदी में मौलिक लेखन शुरु किया है और न ही हम इस भाषा में सोच रहे हैं। अफसरशाही, विज्ञापन का मसौदा तैयार करने वाले बाबू सब अंग्रेजी से टीप रहे हैं। हिंदी का इससे ज्यादा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। बीमा कंपनियों द्वारा एक नारे का इस्तेमाल किया जा रहा है कि ‘बीमा आग्रह की विषय वस्तु है’। मैंने तमाम बीमा कंपनियों के अफसरों से पूछा कि भई इसका मतलब क्या होता है पर आज तक कोई नहीं बता सका। आज भी संसद में जो दस्तावेज हिंदी में उपलब्ध कराए जाते हैं उन्हें समझ पाना बहुत मुश्किल होता है। उन्हें समझने के लिए हिंदी के साथ अंग्रेजी की भी प्रति लेनी पड़ती है। ऐसा लगता है कि अनुवादकर्ता डिक्शनरी खोलता है और संबंधित शब्द के जितने अर्थ दिए होते हैं, उसमें से जो उसको अच्छा लगता है वह चुन लेता है।  मैंने भी एक बार यही किया था पर जान बूझकर, हंगामा खड़ा करने के लिए। तब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे। कांग्रेस पार्टी ने अपनी चुनावी संभावनाओं और अपने बारे में एक सर्वेक्षण करवाया। सर्वे करने वाली कंपनी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि ‘पार्टी लीडरशिप इज एजेड एंड जेडेड’।

यह रिपोर्ट मेरे हाथ लग गई। मैंने डिक्शनरी खोली। उसमें ‘जैडेड’ शब्द के अर्थ देखे। तीन चार मायने दिए गए थे। एक था ‘मरियल घोड़ा’। बस फिर क्या था। मैंने खबर बनाई कि कांग्रेस का अपना सर्वे मानता है कि उसका नेतृत्व बूढ़ा और मरियल घोड़े जैसा है। खबर छपी नहीं कि हंगामा खडा हो गया। सबसे पहले चचा केसरी ने मुझे फोन करके जमकर कोसा। मैंने करीब दो दशकों तक कांग्रेस कवर की पर कभी वहां हिंदी में प्रेस रिलीज नहीं मिली। अब कमोबेश यही स्थिति भाजपा की भी है। पायनियर की लक्ष्मी अय्यर मेरे साथ ही हर जगह जाती थीं। उनके साथ रहने से मुझे फायदा होता था। जो नेता अपना नाम भी अंग्रेजी में नहीं लिख पाते थे वे भी चाहते थे कि उनकी खबर अंग्रेजी में छपे। जिस देश का प्रधानमंत्री विदेश जाकर भी हिंदी में बोलता हो उसकी सरकार में भाषा की इतनी दुर्गति कैसे सहन की जा सकती है?

कांग्रेस की बात तो समझ में आती थी। उसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यालय तक में हिंदी अनुवाद की व्यवस्था नहीं थी। एक बार जब पंकज पचौरी से इस बारे में बात की तो वे कहने लगे कि आप हमारी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यालय से न करें। जिस प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर ही करोड़ों खर्च हो जाते हो वहां एक हिंदी अधिकारी या अनुवादकर्ता तक की नियुक्ति नहीं की जा सकती है। खैर कांग्रेस को इसकी सजा मिली। हिंदी भाषी राज्यों में जिस तरह से उसका सूपड़ा साफ हुआ व सबके सामने हैं पर अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न से सम्मानित करने वाली राजग सरकार को तो हिंदी की अस्मत लुटने से बचाना चाहिए। –

 

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विनम्र उनका लेखन नाम है।)

 

साभार- http://www.nayaindia.com/ से 

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