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‘नेहरू नीति’ से मोदी ला रहे हैं समान नागरिक संहिता

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की मांग उतनी ही पुरानी है जितना की भारत का लोकतंत्र और गणतंत्र। इसकी शुरुआत ब्रिटिश राज के उपरांत हुए सत्ता परिवर्तन के साथ ही शुरू हो गई थी।

यह समझना आवश्यक है कि समान नागरिक संहिता का एकमात्र ध्येय धार्मिक समानता हेतु कानूनी प्रावधान ही नहीं है बल्कि इसका एक बड़ा व्यवहारिक पक्ष यह भी है वर्षों की तुष्टिकरण की नीति से मुस्लिम समुदाय में उतपन्न हुए विशिष्टता के बोध को नष्ट कर सामान्य भारतीय होने का बोध करवाना।

भारत के प्रथम अंतरिम सरकार के मनोनीत प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हिन्दू कोड बिल के माध्यम से संवैधानिक रूप से देश में विभिन्न धर्मों के बीच वैमनस्यता की व्यवस्था कर दी थी। तुष्टिकरण की नीति पर चलते हुए नेहरू मुस्लिमों के बीच भारतीयता से ज्याया इस्लामिक अस्मिता का बोध जागृत रखना चाहते थे। इन्हीं कारणों से नेहरू 1950 में ही हिन्दू कोड बिल लेकर आएं। एक धर्मनिरपेक्ष देश में एक धर्म विशेष के लिए कानून का विरोध होना स्वभाविक था। नेहरू तीनों ही मोर्चों पर घिर गए। एक तरफ जहाँ हिन्दू धर्माचार्यों यथा स्वामी करपात्री महाराज इस कोड का विरोध कर रहे थे वहीं दूसरी तरफ राजेन्द्र प्रसाद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे बुद्धिजीवी इस आधार पर विरोध कर रहे थे कि एज धर्मनिरपेक्ष राज्य में सिर्फ एक धर्म के लिए कानून कैसे बनाया जा सकता है? तीसरा मोर्चा नेहरू सरकार के ही मंत्रिमंडल के सदस्य और संसद ने खोल दिया था। तर्क था कि जब मुस्लिम समाज अन्य धर्म/पंथों की अपेक्षा ज्यादा पिछड़ा है तो इसकी जड़ता को खत्म करने हेतु भी कानून लाए जाएं?

1952 में पहली बार देश में चुनाव होने थे और नेहरू का विरोध जोर पकड़ने लगा था। नेहरू को अपनी हार का डर सताने लगा। वामपंथी विचारधारा से ओतप्रोत नेहरू एक तरफ अपने भारतीयता के मूल स्रोत हिन्दू परंपरा विरोधी एजेंडे को न तो छोड़ना चाहते थे और न ही सत्ता। यधपि नेहरू कई बार अपनी जिद को थोपने के लिए सत्ता छोड़ने की बात कह चुके थे किंतु यह कभी मूर्त रूप नहीं ले पाया। नेहरू जानते थे कि हिंदू कोड बिल को पास करवाना संभव नहीं होगा। अतः उन्होंने बड़ा दाव चला। हिंदू कोड बिल को संसद से वापस ले लिया गया किन्तु नेहरू अपने एजेंडे में लगे रहे।

1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में कॉंग्रेस पार्टी की जीत हुई और अब तक गांधी जी की अनुकंपा पर मनोनीत प्रधानमंत्री नेहरू अब चयनित प्रधानमंत्री बन चुके थे। वो हिंदू कोड बिल का विरोध देख चुके थे। अतः उन्होंने इसे उसी स्वरूप में न पेश करते हुए चार विभक्त रूप में संसद में पेश किया जो पारित भी हो गए। ये चार बिल हैं हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम एवं हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम। इन चारों कानूनों के प्रावधान हिंदू कोड बिल के समीप थे। जवाहर लाल नेहरू की इसी नीति का प्रयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समान नागरिक संहिता के प्रावधानों को लागू करने के लिए कर रहे हैं।

नेहरू के मुस्लिमों तुष्टिकरण की नीति जो कालांतर में अधोषित संवैधानिक व्यवस्था बन गई का प्रभाव है कि इस देश में धार्मिक समानता की बात करना ही कट्टरता की सबसे बड़ी पहचान है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण पर चुप्पी साधने वाला बौद्धिक वर्ग, पत्रकार धार्मिक समानता को मुस्लिम विरोधी घोषित करने में तनिक भी पीछे नहीं रहेंगे। मदरसों की अशिक्षा, धर्म की कट्टरता एवं तुष्टिकरण से उतपन्न हुए विशिष्टता के भाव के अहंकार से पीड़ित मुस्लिम समाज इन साहित्यकारों पत्रकारों की बातों पर यकीन कर गृह युद्ध जैसे हालात पैदा कर सकते हैं जैसा नागरिकता संसोधन कानून (CAA) के समय बंगाल, दिल्ली में हुई हिंसा के रूप में देश ने देखा है। अतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में धार्मिक रूप से समानता संबंधित कानूनों को लागू करने हेतु नेहरू की नीति का सहारा ले रहे हैं।

जिस प्रकार प्रधानमंत्री नेहरू ने हिंदू कोड बिल को विभक्त चार भिन्न स्वरूपों में इसके प्रावधानों को लागू करवाया उसी प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समान नागरिक संहिता बिल नाम का बिल न प्रस्तुत करते हुए इसे छोटे छोटे स्वरूपों में कानूनी दर्जा दिलवा रहे हैं। इसमे सबसे पहला कानून है तीन तलाक संबंधित कानून। इसके माध्यम से मुस्लिम समुदाय को मिले विवाह एवं तलाक संबंधित विशेष अधिकार को नष्ट किया गया। दूसरा कदम है लड़कियों के विवाह की उम्र सीमा को बढ़ाया जाना। जब से सरकार ने विवाह की न्यूनतम उम्र सीमा बढाने का प्रस्ताव किया है चहुओर इस बात पर चर्चा हो रही है कि न्यूनतम उम्र सीमा 18 से 21 करने का क्या फायदा होगा जबकि इससे बड़ी बात तो यह है कि यह उम्र सीमा अब सभी धर्मों पर लागू होगा। चर्चा का मूल विषय यह होना चाहिए किन्तु इस विषय पर चर्चा कम हो रही है। इस कानून के माध्यम से भी मुस्लिमों को विशेषाधिकार का लोप कर समानता का बोध उतपन्न किया जा रहा है।

इन दोनों ही कानूनों के माध्यम से बिना किसी बड़ी अराजकता के सरकार ने मुस्लिम समुदाय में उपन्न हुए विधिष्टता के बोध को कम कर दिया है। यदा कदा सरकार के विभिन्न तंत्र द्वारा जनसंख्या नियंत्रण कानून की बात कही जा रही है। जनसंख्या नियंत्रण द्वारा जनसांख्यिकी पर पड़ने वाले प्रभाव पर चर्चा होना स्वभाविक है। किंतु जनसांख्यिकी के प्रभाव से इतर मुस्लिम समुदाय में व्याप्त विशिष्टता के अहंकार पर अंकुश लगाने के लिए पर्याप्त है। जनसंख्या नियंत्रण कानून के उपरांत सरकार बिना तलाक बहुविवाह निषेध कानून ला सकती है या इसे जनसंख्या नियंत्रण कानून के एक भाग के रूप में भी प्रस्तुत कर सकती है। इस कानून के माध्यम से भी इस्लामिक समाज के विशिष्ट होने के अभिमान को कम किया जा सकता है।

जैसा कि पूर्व में बताया गया है समान नागरिक संहिता का सबसे बड़ा ध्येय तुष्टिकरण की नीति से उतपन्न हुए विशिष्टता के बोध को नष्ट कर सामान्य भारतीय होने का बोध करवाना है। अतः अब तक पारित हो चुके दो कानूनों तीन तलाक संबंधित कानून एवं विवाह की उम्र सीमा संबंधित कानून के उपरांत दो अन्य कानूनों यथा जनसंख्या नियंत्रण एवं बहुविवाह संबंधित कानून के बाद समान नागरिक संहिता के परम ध्येय की पूर्ति भी हो जाएगी और समान नागरिक संहिता की आवश्यकता भी नहीं रहेगी।
जिस प्रकार नेहरू हिंदू कोड बिल को चार हिस्सों में बांट कर हिंदू कोड बिल के प्रावधानों को लागू करवाने में सफल हुए उसी नीति के अनुरूप नरेंद्र मोदी समान नागरिक संहिता को चार हिस्सों में बांट कर इसके प्रावधानों को लागू करवाने की योजना पर कार्य कर रहे हैं। जिसके वो आंशिक सफल भी हो चुके हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि नेहरू नीति पर चल कर मोदी ला रहे हैं समान नागरिक संहिता।

(लेखक लोकवाणी के संपादक हैं व राजनीतिक व सामाजिक विषयों पर लिखते हैं)

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