आप यहाँ है :

मोदीजी विपक्ष में थे तो जीएम फुड ज़हर था, अब अमृत हो गया

प्रधानमंत्री को लिखी गई चिट्ठी की एक प्रति फ़र्स्टपोस्ट को हासिल हुई है. इस चिट्ठी में स्वदेशी जागरण मंच के संयोजक डा अश्विनी महाजन ने कहा है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्राइजल कमिटी (जीईएसी) की जीन प्रवर्धित सरसों को स्वदेशी जीएम सरसों बताने की सिफारिश दरअसल आंकड़े की बाजीगरी पर आधारित है, समिति ने गलत निष्कर्ष निकाले हैं और समिति की सिफारिश अपने स्वार्थों को आगे बढ़ाने के लिए की गई लॉबिंग का नतीजा है.

स्वदेशी नहीं है जीएम सरसों
डा.अश्विनी महाजन ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, ‘जीएम सरसों के बारे में यह कहना कि इसका विकास भारत में हुआ है और यह स्वदेशी है, पूरी तरह से गलत है. जीएम सरसों के उपयोग को सुरक्षित बताने की जीईएसी की सिफारिश पर हमें भारी आपत्ति है.’

‘इस बीज के उपभोग के पोषक-तत्वों का विकास दिल्ली विश्वविद्यालय के विवादास्पद रिसर्चर प्रोफेसर दीपक पेंटल ने किया है. वे ही जीएम सरसों को एचटी मस्टर्ड डीएमएच 11 नाम देकर उसको बढ़ावा देने के लिए प्रचार कर रहे हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के मौका मुआयना (फील्ड ट्रायल) से भी यह साबित नहीं होता कि जीएम सरसों की उपज बेहतर है.’

बेयर की सहयोगी प्रोएग्रो सीड कंपनी का हवाला देते हुए स्वदेशी जागरण मंच ने अपनी चिट्ठी में सवालिया अंदाज में लिखा है कि बेयर स्वदेशी कंपनी नहीं है. बार-बारस्ट्रार-बारनेज के आधार पर हायब्रिड के जरिए जीन प्रवर्धित सरसों तैयार किया गया है. इसका पेटेंट बेयर के नाम है, फिर इसे स्वदेशी कैसे कहा जा सकता है?”

बीटी बैंगन: इस पर भी ध्यान देना जरूरी

जीन प्रवर्धित एक अन्य बीज का नाम बीटी ब्रिन्जल (बैंगन) है. इस बीज का हवाला देते हुए महाजन ने कहा कि दूसरी बार ऐसा हुआ है जब एक जीन प्रवर्धित बीज से ली जाने वाली फसल के व्यावसायिक उत्पादन की अनुमति के बारे में विचार किया जा रहा है.

पहली बार जब ऐसी स्थिति पेश आयी उस वक्त यूपीए का शासन था और तब बीटी ब्रिंजल (बैंगन) के मामले में हमने विरोध किया था. तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जन-सुनवाई की अनुमति दी.

बीज के उपयोग से संबंधित आंकड़े सार्वजनिक किए गए और इन आंकड़ों की जांच-परख हो सकी. इस वजह से बीटी ब्रिन्जल के उपयोग पर अनियत काल के लिए रोक लगायी जा सकी.

वैज्ञानिकों ने साबित किया कि बीटी ब्रिन्जल के उपयोग से लोगों की सेहत, जैव विविधता और एक हद तक खेती-बाड़ी के काम को नुकसान पहुंचेगा.

डा महाजन के मुताबिक, ‘प्रोफेसर पेंटल का जीएम सरसों ना तो स्वेदशी है और ना ही संकरण (हायब्रिड) के जरिए बनाए स्वेदशी बीजों की तुलना में इससे ज्यादा उपज हासिल होती है. यह बीज लोगों की सेहत, पर्यावरण और जैव विविधता के लिए भी ठीक नहीं है. अधिकारी-वर्ग इस बीज के उपयोग को हरी झंडी देने के लिए बहुत ज्यादा हड़बड़ी दिखा रहा है और इससे उनकी मंशा पर सवाल उठते हैं.”

स्वदेशी जागरण मंच का सवाल
बहुराष्ट्रीय कंपनी बेयर को उसके पेटेंट कराए जीन उत्पाद के लिए दी जाने वाली रॉयल्टी पर स्वदेशी जागरण मंच ने सवाल उठाए हैं. स्वदेशी जागरण मंच ने फसल को नुकसान पहुंचाने वाले खर-पतवार को नष्ट करने वाली दवा (हर्बिसाइड) ग्लूफोसिनेट को बढ़ाना दिए जाने पर भी आपत्ति जताई है.
डॉ. महाजन का कहना है कि बेयर को दी जाने वाली रॉयल्टी की शर्तें भी गुप्त रखी गईं. बेयर को उसके पेटेंट कराए जीन पर रॉयल्टी तो दी ही जा रही है साथ ही एक खर-पतवार नाशक (हर्बिसाइड) ग्लूफोसिनेट को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. इससे कंपनी को फायदा होगा. साफ जाहिर है कि पेटेंट के इस्तेमाल के मामले में देश एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के भरोसे हो जायेगा और खर-पतवार नाशक (हर्बिसाइड) के लिए भी आयात के भरोसे रहना होगा. इससे देश को ढेर सारी विदेशी मुद्रा का नुकसान होगा”

जीएम सरसों के उपयोग पर अफवाह का खंडन
आरएसएस के एक कार्यकर्ता तथा मोदी सरकार में वन और पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी माधव दवे सरसों के स्वदेशी जीएम बीज से फसल उगाने की अर्जी के बारे में आखिरी फैसला लेने वाले थे. दवे की 18 मई को मृत्यु हो गई.

इस बात की भी अटकलें लगायी जा रही थीं कि माधव दवे जीन प्रवर्धित (जीएम) बीज को बढ़ावा देना चाहते हैं. डा महाजन के अनुसार, ‘जीएम सरसों के उपयोग की अनुमति को लेकर दवेजी ने कोई बयान जारी नहीं किया है और ना ही उनसे इस बारे में कोई संदेशा हासिल हुआ है. इस बात की भी अफवाह उड़ायी जा रही है कि प्रधानमंत्री कार्यालय जीएम सरसों के उपयोग को बढ़ावा देना चाहता है, लेकिन यह बात भी पूरी तरह गलत है.’

डॉ अश्विनी महाजन ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री जीएम बीज को अनुमति देना चाहते तो इस सिलसिले में मंजूरी देने में तीन साल का वक्त क्यों लगाते.
मामला अदालत में है

जीएम सरसों के उपयोग से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है.

डा. महाजन का कहना है, ‘चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और एटर्नी जेनरल ने आश्वासन दिया है कि डीएमएच 11 को सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बगैर मंजूरी नहीं दी जायेगी, इसलिए हमने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी है कि मामले को अभी अपनी हरी झंडी ना दें.’

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
जीन प्रवर्धित बीजों के मशहूर वैज्ञानिक तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रोफेसर पी पार्थसारथि का कहना है कि मौजूदा बीजों की तुलना में जीएम बीजों से खेती-बाड़ी में कोई फायदा होगा, ऐसा अभी तक सामने नहीं आया है.

ऐसे में भारतीय कृषि, लोगों की सेहत तथा भोजन तथा जैव-विविधता को खतरे में डालने का कोई तुक नहीं है क्योंकि सरसों की संकर प्रजाति एचटी और डीएमएच-11 के उपयोग से इन सबको स्थायी नुकसान हो सकता है और इसकी भरपाई नहीं हो सकती. एचटी सरसों और इसके जीन प्रवर्धित प्रजातियों पर निश्चित ही प्रतिबंध लगना चाहिए.

पर्यावरणवादी वंदना शिवा का कहना है कि संकर प्रजाति का डीएमएच-11 जीएम फसल के उपयोग के जोखिम के आकलन के लिए बनी कसौटी पर खरा नहीं उतरा.
पहला सवाल तो यही है कि क्या जीएम फसल की जरुरत है? इसका उत्तर है- नहीं! फिर भी, नियमों की भुलभुलैया में उलझाकर इन बीजों की जांच को अगले दस सालों से ज्यादा समय से जारी रखा गया है.

ये बीज अपने परीक्षण की लंबी अवधि में एक चरण से दूसरे चरण की तरफ बढ़ते रहे हैं और उनका जीवन लगातार बनाये रखा गया. यह सब हुआ क्योंकि निगरानी के नियम ही ढीले-ढाले बनाये गये. यह एक फर्जीवाड़ा है और इसका सीधा रिश्ता नियमों के कागजी पुलिन्दे से है. कागज पर नियम तो खूब बने हैं लेकिन दरअसल पालन उनका ना के बराबर होता

आरएसएस
जेनेटिक मॉडिफाइड



सम्बंधित लेख
 

ईमेल सबस्क्रिप्शन

PHOTOS

VIDEOS

Back to Top