आप यहाँ है :

सक्रिय राजनीति में मोदीजी के शानदार बीस साल

राजनीति भी व्यापक मानवीय संस्कृति का एक प्रमुख आयाम है। भारतीय जनमानस के लिए राजनीति कभी अस्पृश्य या अरुचिकर नहीं रही। स्वतंत्रता-आंदोलन के दौर से ही राजनीति जनसेवा एवं सरोकारों के निर्वाह का सशक्त माध्यम रही। स्वतंत्रता के बाद के प्रारंभिक दशकों में भी राजनीति जनसरोकारों को लेकर चली। बाद के दिनों में एक ऐसा कालखंड अवश्य आया जब जातिवाद, क्षेत्रवाद, वंशवाद एवं क्षद्म धर्मनिरपेक्षता की घोल पिलाकर मतदाताओं को लामबंद कर सत्ता बनाए रखने के कुचक्र रचे गए और उसमें कुछ दशकों तक राजनीतिज्ञ सफ़ल होते भी दिखे। परंतु जैसे काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ाई जा सकती वैसे ही सफ़लता की गारंटी माने जाने वाले ये सूत्र भी विफ़ल हुए। भारतीय जनमानस का इससे मोहभंग हुआ। जातिवाद एवं सूडो सेकुलरिज़्म का झुनझुना लोगों को दो वक्त की रोटी नहीं दिला सकती, इसलिए लोग इससे विमुख होकर विकास और सेवा की राजनीति की आकांक्षा और स्वप्न संजोने लगे।

आम मतदाताओं के मन और मिज़ाज को बख़ूबी पढ़ते और समझते हुए एक राजनेता इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम वर्ष यानी 7 अक्तूबर, 2001 को सत्तासीन हुआ। सत्ता सँभालते ही उसने विकास को राजनीति के केंद्र में स्थापित करना शुरू कर दिया।गुजरात में विकास की रफ़्तार को देखकर धीरे-धीरे बाक़ी राज्यों को भी लगने लगा कि यदि दिशा, दृष्टि और इच्छाशक्ति हो तो जनभावनाओं एवं जनाकांक्षाओं को पूरा किया जा सकता है। विकास के चिर-प्रतीक्षित सपनों को सचमुच साकार किया जा सकता है। जी हाँ, बात हो रही है आज के लोकप्रिय राजनेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की। कल उन्होंने सरकार के प्रमुख के रूप में 20वें वर्ष में प्रवेश किया। इस अवसर पर उनके अब तक के राजनीतिक सफर का आकलन-मूल्यांकन उचित ही होगा।

मुख्यमंत्री रहते हुए भी नरेंद्र मोदी की एक राष्ट्रीय अपील थी। राज्येतर जनाधार था। वे भारत की राजनीति में एक उम्मीद बनकर उभरे। यदि हम तटस्थ एवं ईमानदार विश्लेषण करें तो यह दावा अतिरेकी नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के स्वाभाविक उम्मीदवार घोषणा से पूर्व ही मान लिए गए थे। वे केवल अपने दल के नहीं, अपितु सही अर्थों में जनता के नेता और प्रधानमंत्री हैं। और यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अपने व्यापक अपील एवं लोकप्रियता के बल पर उन्होंने राजनीति को विकास एवं सेवा का माध्यम ही नहीं, पर्याय बना डाला।उन्होंने नए भारत की संकल्पना को ज़मीन पर साकार करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ एवं ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ उनके लिए केवल नारा नहीं, शासन चलाने का मूल मंत्र है।

अपने इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए राजनीति में उन्होंने कई साहसिक प्रयोग किए जिसे जनता का अपार समर्थन मिला। वे एक ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में सामने आए जो केवल शासन-प्रशासन के विभिन्न मोर्चों पर ही चाक-चौबंद नहीं रखता, अपितु जनसरोकारों से जुड़े लोकहित के छोटे-बड़े मुद्दों पर भी खुलकर अपनी राय बेबाक़ी से रखता है और सरकार की भागीदारी सुनिश्चित कर दुर्लभ-से-दुर्लभ लक्ष्यों को भी न्यूनाधिक अनुपात में हासिल करता है। नरेंद्र मोदी से पूर्व शायद ही किसी ने सोचा हो कि कोई प्रधानमंत्री स्वच्छता-अभियान को जन-आंदोलन में परिणत कर सकता है, एक ऐसा जन-आंदोलन छोटे-छोटे बच्चे भी जिसमें शिरकत करने लगें और उसके सेवा-सैनिक एवं दूत बनकर अपने बड़ों को भी राह दिखाने लगें।

इतना ही नहीं उनके द्वारा प्रारंभ की गई ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ठोस क़दम साबित हुआ। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना ने गिरते शिशु लिंगानुपात पर रोक लगाई और कन्या भ्रूण हत्या जैसे नृशंस एवं अमानवीय कुकृत्य पर अंकुश लगाने में थोड़ी सफलता पाई। ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ ने बेटियों को लक्ष्मी एवं शक्ति स्वरूपा मानने की दिशा में समाज को प्रेरित किया। ” प्रधानमंत्री आवास योजना, स्टार्ट अप इंडिया, प्रधानमंत्री मुद्रा बैंक योजना, प्रधानमंत्री जनधन योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, प्रधानमंत्री फसल योजना” जैसी जन कल्याणकारी योजनाओं ने प्रधानमंत्री की सरोकरधर्मिता को स्पष्ट एवं उजागर किया है। आयुष्मान भारत योजना स्वास्थ्य-सेवा के क्षेत्र में आम जन के लिए एक बड़ी सौगात एवं सहूलियत है। जीएसटी कर-सुधार की दिशा में एक निर्णायक क़दम है। आर्थिक दृष्टि से पिछड़े सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर मोदी सरकार ने यह संदेश दिया कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ उनके लिए महज़ चुनावी नारा नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी का अब तक का द्वितीय कार्यकाल भी कई मायनों में ऐतिहासिक एवं उपलब्धिपूर्ण रहा। उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले साल में ही जम्मू-कश्मीर से धारा 370 समाप्त कर तथा राज्य को दो हिस्सों में बाँटकर लगभग सात दशकों से उलझी-अटकी समस्याओं का सहज समाधान प्रस्तुत किया। बल्कि लोग तो यह मानने और कहने लगे थे कि जम्मू-कश्मीर से कभी धारा 370 समाप्त ही नहीं किया जा सकता। तीन तलाक के ख़िलाफ़ क़ानून और नागरिकता संशोधन विधेयक पारित कर उन्होंने साफ़ संदेश दिया कि तमाम विरोधों एवं दबावों के बावजूद राष्ट्रहित के मुद्दों पर वे किसी प्रकार का समझौता नहीं करेंगें।

विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी की सफलता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि आज भारत के साथ रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इजरायल, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश जहाँ खुलकर खड़े हैं वहीं चीन व पाकिस्तान पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ा है। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में मध्य एशिया के इस्लामिक देशों के साथ भी भारत के संबंध पहले से काफ़ी बेहतर एवं मज़बूत हुए हैं। कश्मीर एवं चीन के मसले पर दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों का साथ भारत की सफल विदेश नीति का जीवंत प्रमाण है। प्रधानमंत्री के ही शब्दों में ”मैं विदेश नीति के मामले में दिमाग़ से नहीं, दिल से काम लेता हूँ।” गौरतलब है कि दिल से काम लेते हुए भी वे भारत के हितों से कहीं लेशमात्र भी समझौता नहीं करते। ”भारत प्रथम, राष्ट्र प्रथम” की नीति उनके प्रत्येक निर्णय और नीति में स्पष्ट परिलक्षित होती है। प्रधानमंत्री की विश्वव्यापी अपील का परिचय तब भी देखने को मिला जब संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिवर्ष 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाने की स्वीकृति दी।

कोरोना-काल में भी शासन-प्रशासन के हर मोर्चे पर वे और उनकी सरकार पूरी चुस्ती से मुस्तैद एवं सक्रिय नज़र आती है। यही कारण है कि इस दौरान हुए तमाम सर्वेक्षणों में भी वे दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक एवं प्रमुख हैं। इस अवधि में उन्होंने अपने कार्यों की गति में कहीं शिथिलता नहीं आने दी। ऐसा कभी नहीं लगा कि इस महामारी के कारण देश ठहर-सा गया है। लॉकडाउन के दौरान भी वे और उनके सिपहसालार लगातार आम जन के बीच उनकी समस्याओं के समाधान हेतु तैयार, तत्पर एवं उपलब्ध दिखे। जिस कुशलता से लोकसभा के मानसून सत्र का सरकार ने संचालन किया वह अत्यंत प्रशंसनीय रहा। इस अवधि में न केवल सामान्य सत्रों से बहुत अधिक कार्य संपन्न हुए, अपितु अनेक अत्यावश्यक विधेयकों को भी पारित कराया गया।

इस कोरोना-काल में नीति और निर्णय के स्तर पर सरकार एवं सरकारी तंत्र की सक्रियता एवं सचेष्टता का ही परिणाम है कि जनसाधारण का धैर्य एवं उत्साह कभी-कहीं चुका हुआ नहीं दिखा। जन-भावनाओं का सम्मान करते हुए इसी अवधि में राम-मंदिर के शिलान्यास एवं भूमि-पूजन कार्यक्रम में जाकर उन्होंने उसका विरोध कर रहे तमाम दलों एवं नेताओं को साफ़-साफ़ संदेश दिया कि राम-मंदिर उनकी पार्टी के लिए केवल एक चुनावी नहीं, अपितु सुदीर्ध-सुविचारित चिंतन से निःसृत सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय मुद्दा रहा है और उसे लेकर वे या उनकी सरकार किसी भ्रम या द्वंद्व के शिकार नहीं है। उनकी सरकार विचारधारा से जुड़े मुद्दों पर प्रतिबद्धता से काम करने के साथ-साथ महात्मा गाँधी और संघ समर्थित स्वदेशी आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में भी तत्परता से काम करती दिख रही है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ एवं ‘लोकल के लिए वोकल’ का उनका विचार केवल नारों तक सीमित नहीं दिखकर धरातल पर साकार होता दिख रहा है। वे इस दिशा में बड़े सधे हुए क़दम बढ़ा रहे हैं।

तमाम चीनी ऐप पर प्रतिबंध और चीन के साथ किए गए विभिन्न व्यापारिक समझौतों की समीक्षा एवं उनमें से कुछ का रद्दीकरण उसी दिशा में उठाया गया एक ठोस एवं सकारात्मक क़दम है। इतना ही नहीं, विभिन्न स्रोतों से छन-छनकर आ रही खबरों के अनुसार लद्दाख में पहली बार भारत सीमा पर मज़बूती से सीना ताने खड़ा है और चीनी सेना से आँखें मिलाकर बात कर रहा है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक गलवान घाटी में लगभग 60 चीनी सैनिकों के हताहत होने की पुष्टि हुई है। इतना ही नहीं कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि भारतीय सेना ने पिछले कुछ दिनों में सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण चोटियों एवं बिंदुओं पर अपनी स्थिति मज़बूत कर ली है। राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता से उनकी सरकार किसी प्रकार का समझौता करती हुई दिखाई नहीं देती। इस कोरोना-काल में विभिन्न मोर्चों पर वे और उनकी सरकार जिस दृढ़ता से खड़ी और लड़ती हुई दिखाई देती है, वह उम्मीद की रोशनी बनकर जनता का हौसला बढ़ाती है। वह हताशा और निराशा के बादल को चीरकर एक नए सूर्योदय का संकेत करती है।

उनकी बातों, कार्यों एवं योजनाओं में गाँव, गरीब, किसान, वंचित, शोषित जनों का ज़िक्र बार-बार आना अकारण नहीं है। बल्कि वे उनके हितों के लिए प्राणार्पण से प्रयास करते हुए प्रतीत हो रहे हैं। किसानों की आय को दो गुना करने के संकल्प को साकार करने के उद्देश्य से उन्होंने कृषि अवसंरचना फंड हेतु एक लाख करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की तथा दस हजार कृषक उत्पादक समूहों के निर्माण का कार्य प्रारंभ किया। तीन-तीन कृषि विधेयक पारित कराकर कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार के लिए ठोस पहल एवं प्रयास किए तथा तमाम विरोधों के बावजूद वे इसे लेकर आशान्वित हैं।

कोरोना के संकट-काल में गरीब कल्याण अन्न योजना के माध्यम से देश के लगभग 80 करोड़ लोगों तक 8 माह का निःशुल्क राशन पहुँचाने का निर्णय गरीबों-मजदूरों-वंचितों के प्रति उनकी सच्ची संवेदनशीलता को दर्शाता है। वे एक ऐसे नेता हैं जो संघर्षों की रपटीली राहों पर चलकर और अनुभव की आँच में तपकर केंद्रीय सत्ता के शिखर-पुरुष बने हैं। अच्छी बात यह है कि ग़रीबी की पीड़ा उन्होंने न केवल देखी और सुनी है, अपितु भोगी भी है। इसलिए उन्होंने अपने जीवन का कण-कण और आयु का क्षण-क्षण देश-सेवा के लिए अर्पित कर रखा है। जब वे कहते हैं कि राजनीति उनके लिए सत्ता व सुविधा की मंजिल नहीं, सेवा का माध्यम रही है तो उनका यह वक्तव्य अतिरेकी या अविश्वसनीय नहीं लगता। लोगों को भी लगता है कि उन्होंने लिया बहुत कम है और दिया बहुत ज़्यादा है। ऐसा कौन राजनेता होगा जिसने मानवता एवं राष्ट्र की सेवा हेतु अपने निजी उपहारों की नीलामी से जुटाए 103 करोड़ रुपए की विपुल धनराशि विभिन्न संस्थाओं-संगठनों-जरूरतमंदों को दान कर दी हो? भारत के सार्वजनिक जीवन में त्याग का ऐसा उदाहरण दुर्लभ है।

राजनीति में परिश्रम, पुरुषार्थ, सेवा और कर्त्तव्यपरायणता का जैसा आदर्श दृष्टांत उन्होंने स्थापित किया है, वह उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं और अधिकांश देशवासियों के लिए जीवित-जाग्रत प्रेरणास्रोत है। क्या आज से पूर्व किसी ने सोचा होगा कि भारत के सभी सांसद विषम एवं संकटकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए अपने वेतन-भत्ते-सुविधाओं में कटौती का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करेंगें? क्या ऐसे प्रस्तावों को पारित और स्वीकृत कराने की पहल और परिकल्पना राजनीति में आए परिवर्तन की परिचायक नहीं? नकारात्मक सोच वाले प्रलय के भविष्यवक्ताओं की प्रतिक्रियाओं को यदि कुछ पल के लिए भूल जाएँ तो ऐसा कौन होगा जो यह कहे कि प्रधानमंत्री ने कोरोना से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने एवं उसकी रोकथाम में कोई कोर-कसर बाक़ी रखी है? ऐसा कौन होगा जो कहे कि प्रधानमंत्री अपने परिश्रम एवं प्रयासों में कोई कोताही बरत रहे हैं?

निःसंदेह इस संकट-काल में उन्होंने अपनी स्वतःस्फूर्त सक्रियता, सजगता, सतर्कता, लोक हितकारी नीति, त्वरित निर्णय एवं प्रत्युत्पन्नमति से शासन-व्यवस्था को अतुलनीय गति दी, नौकरशाही एवं सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अहर्निश कर्मरत रहने हेतु प्रेरित-प्रोत्साहित किया, यहाँ तक कि विभिन्न मुख्यमंत्रियों से भी ताल-मेल बिठाए रखकर उन्हें भी सार्थक एवं सम्यक दिशा देने का प्रयास किया। क्या इसमें भी कोई दो राय होगी कि इस कोरोना-काल में पुलिस-प्रशासन से लेकर चिकित्सकों-स्वास्थ्यकर्मियों एवं तमाम सरकारी, ग़ैर-सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों-संस्थाओं ने सेवा की अद्भुत मिसाल पेश की है?

सच तो यह है कि कोरोना महामारी से उपजी इन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री ने सेवा को राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र में लाकर एक मिसाल पेश की है। सेवा जिसे आज तक सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, जनकल्याणकारी समितियों का कार्य समझा जाता था, उसे जनतांत्रिक कार्यकर्त्ताओं के गले उतारना इतना आसान नहीं था। इसके लिए दिशा और दृष्टि, प्रेरणा और पाथेय दोनों की आवश्यकता होती है। सौभाग्य से प्रधानमंत्री जिस विचार-परिवार से आते हैं वहाँ ऐसे सेवाव्रती तपोनिष्ठों की कमी नहीं जिनके जीवन का ध्येय ही राष्ट्र-देव की सेवा में स्वयं का अर्पण है। स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी जैसे दृष्टिसंपन्न महापुरूषों से लेकर संघ-परिवार से जुड़े हजारों सेवाव्रती प्रचारकों ने सेवा-कार्य को अत्यधिक महत्ता प्रदान की है।

‘सेवा भारती’ के माध्यम से संघ ने सदैव प्राकृतिक आपदाओं में पीड़ितों की निःस्वार्थ सेवा की है, सामान्य अवस्था में भी ‘संघ’ एवं ‘सेवा भारती’ के कार्यकर्त्ता वंचितों-शोषितों की सेवा में निरंतर सक्रिय एवं सचेष्ट रहते हैं। स्वाभाविक है कि अपने मातृ संगठन की प्रेरणा से इस कोरोना-काल में भाजपा के भी हजारों-लाखों कार्यकर्त्ताओं ने अपनी जान की परवाह न करते हुए दुःखियों-पीड़ितों, प्रवासी मज़दूरों की निःस्वार्थ सेवा की है। स्वयं प्रधानमंत्री ने अपनी वाणी एवं आचरण से सेवा-कार्यों के लिए अपने दल के हजारों-लाखों कार्यकर्त्ताओं को पल-पल प्रेरित-प्रोत्साहित किया और कर रहे हैं। ध्येयनिष्ठा संघ-भाजपा संगठन की परंपरा रही है। वहाँ आज भी ऐसे समर्पित कार्यकर्त्ताओं की कमी नहीं जो ध्येयनिष्ठा पर सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहते हों। प्रधानमंत्री इसके सर्वोत्तम आदर्श हैं। एक आँकड़े के अनुसार लॉकडाउन के दौरान भाजपा कार्यकर्त्ताओं ने लगभग 22 करोड़ से अधिक फूड पैकेट्स एवं 5 करोड़ से अधिक राशन किट्स का वितरण किया। इसके अलावा पार्टी कार्यकर्ताओं ने 5 करोड़ से अधिक फेसकवर्स भी जरूरतमंदों तक पहुँचाए।

अपने जन्म-दिवस को सेवा-सप्ताह के रूप में मनाने की प्रधानमंत्री की पहल एवं सोच भी अनूठी एवं अनुकरणीय है। पार्टी-कार्यकर्त्ताओं ने इसके अंतर्गत प्रत्येक जिले में कम-से-कम 70 स्थानों पर वृक्षारोपण, ब्लड डोनेशन एवं स्वच्छता-कार्यक्रम आयोजित की। यदि सभी राजनीतिक दल ऐसी पहल एवं प्रयासों को गति प्रदान करें तो इससे निश्चित ही देश और राजनीति दोनों की तस्वीर बदल सकती है। राजनीति केवल स्वार्थ साधने का साधन नहीं, अपितु सेवा एवं परिवर्तन का अवसर व माध्यम बने, इससे शुभ, सुंदर एवं सार्थक बदलाव भला देश के लिए और क्या हो सकता है! और प्रधानमंत्री मोदी का अब तक का राजनीतिक सफ़र परिवर्तन का वाहक रहा है। 20 वें वर्ष में प्रवेश करते हुए भी उनका उत्साह 2001 की तरह बरक़रार है। वे प्रयोग एवं साहस की राजनीति के सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं।

प्रणय कुमार
9588225950

image_pdfimage_print


Leave a Reply
 

Your email address will not be published. Required fields are marked (*)

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

सम्बंधित लेख
 

Back to Top