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मोदीजी के राज में हिंदी के लिए भी याचिका लगना पड़ती है

मैंने कुछ दिन पहले *चेंज डॉट ओआरजी* (www.change.org)वेबसाइट पर एक बहुत
ही *महत्वपूर्ण विषय* पर एक याचिका शुरू की है। मैं आप सभी से अनुरोध करती हूं, कि आप सभी
मुझे इस विषय पर अपना समर्थन दें।

दोस्तो! *भारत सरकार* ने हाल ही में *विमुद्रीकरण** की घोषणा की थी और उसके
बाद भारत की अर्थव्यवस्था को *कम नकदी वाली *अर्थव्यवस्था* *बनाने के लिए
सरकार *डिजिटल लेनदेन* को बढ़ावा दे रही है।

जैसा की आप सभी जानते हैं, कुछ अपवाद छोड़कर, भारत के *सभी बैंक एवं डिजिटल
सेवाएं* प्रदान करने वाली *कंपनियां* अपनी सभी सेवाएं केवल *एकमात्र
भाषा* अंग्रेजी में* *उपलब्ध करवाती है, हम और आप लोग *अंग्रेजी* जानते हैं इसलिए इनका
इस्तेमाल कर पाते हैं, पर देश के लगभग *नब्बे प्रतिशत* लोग ऐसे हैं जो *अंग्रेजी* ना तो समझ सकते हैं और ना ही *अंग्रेजी में उपलब्ध* सेवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि यह लोगों के साथ *भाषाई आधार* पर एक तरह का *भेदभाव* है जिस पर हमने पहले कभी ध्यान नहीं दिया!

हम सरकार से मांग करें कि वह सभी *सरकारी एवं निजी बैंकों* *एवं *डिजिटल सेवाएं* प्रदान करने वाली कंपनियों के लिए यह अनिवार्य करें कि वह अपनी सभी बैंकिंग सेवाएं, जैसे नेटबैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग एप, मोबाइल सन्देश (एस एम एस अलर्ट) एवं *ई-बटुआ *आदि भारत की * *सभी प्रमुख भाषाओं** में उपलब्ध करवाएं और *भारत** में कार्यरत *सभी बैंकों के लिए अनिवार्य होना चाहिए* कि वह खाता खोलते समय ग्राहकों से पूछें कि वे *बैंक की सेवाएं* किस *भारतीय भाषा* में प्राप्त करना चाहते हैं? उसके बाद ग्राहक बैंक के लिए बैंकिंग की सभी सेवाएं ग्राहक द्वारा *चुनी गई भाषा * में उपलब्ध करवाना अनिवार्य हो।

हमें इसके लिए एक लाख हस्ताक्षरों की आवश्यकता है, लक्ष्य कठिन अवश्य है पर असंभव नहीं।

सबसे पहले इस लिंक पर जाकर मेरी याचिका पर हस्ताक्षर करें:

*हिंदी में याचिका*

*अंग्रेजी में याचिका:*

धन्यवाद
विधि जैन, मुंबई



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