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‘मिस्टर मीडिया: पत्रकारों को पहले क़ाबिल पेशेवर तो बनाइए’

बहार है। नए-नए चैनलों की भरमार है। तस्वीर चमकदार है। प्रोफेशनल्स की दरकार है। फिर भी नहीं मिलता रोज़गार है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

जी हां, यही हाल है इन दिनों चैनल संचालकों का। हर मालिक अच्छे पत्रकारों का रोना रो रहा है। चैनल के कंटेंट पर सवाल उठाओ तो यही उत्तर मिलता है, कहते हैं-हम पैसा ख़र्च करने के लिए तैयार हैं, मगर टैलेंट तो मिले। कहां है आपकी इंडस्ट्री में नया टैलेंट। मीडिया पढ़ाने वाले अपना डिप्लोमा दे देते हैं, डिग्री दे देते हैं और हमारे यहां भेज देते हैं। जब उन्हें न्यूज़रूम में बिठाते हैं तो माथा पीट लेते हैं। रिपोर्टिंग में भेजते हैं तो गहराई वाली, धार वाली, अच्छे संदर्भों वाली नहीं मिलती। फिर हम सोचते हैं कि अगर यही टैलेंट मिलना है तो ज़्यादा पैसा क्यों ख़र्च करें? ऐसे में अच्छे पत्रकारों और एंकर्स का नुकसान हो जाता है। बात सौ टके सही है। चैनल मालिक और संपादक ठीक कहते हैं। उनसे बात करने के बाद मैंने क़रीब बीस यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम का गहराई से अध्ययन किया। वाकई! उन पाठ्यक्रमों से 2018 का मीडिया, तकनीक और उसके टूल्स ग़ायब हैं।

चंद मिसालें देता हूं। सवा सौ करोड़ की आबादी के देश में आज भी हम विशेषीकृत यानी स्पेशलाइज़्ड रिपोर्टिंग और चैनल नहीं निकाल पा रहे हैं। कुछ दिन बाद देश में एक विज्ञान चैनल दस्तक देने वाला है। मगर ढंग के विज्ञान पत्रकार नहीं मिल रहे हैं। हमारे विश्वविद्यालयों के मीडिया शिक्षण संस्थानों में विज्ञान पत्रकारिता के लिए कोई स्थान नहीं है। इक्का दुक्का अपवाद हों तो हों। हम कहते हैं-यह विज्ञान का युग है। यह कैसा युग है, जो विज्ञान का है, लेकिन समझ और सोच से विज्ञान अनुपस्थित है। हम कहते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन देश में कुछ साल पहले किसान चैनल आया था। लड़खड़ाता-डगमगाता सा लुढ़क-लुढ़ककर चल रहा है। ढंग के खेती-किसानी के जानकार पत्रकार नहीं मिल रहे हैं। अफसरों के सहारे चैनल परदे पर दिख तो रहा है, मगर वह धड़कता नहीं है। ठीक उसी तरह जैसे किसी बेहद खूबसूरत मुर्दा देह पर ज़ेवर और क़ीमती कपड़े पहना दिए जाएं, लेकिन प्राणों के बिना उनका क्या मतलब है। हर चुनाव में इन दिनों किसान और उनकी आत्महत्या बहस का विषय बन रहा है, लेकिन हमारे प्रोफेशनल फसलों की बारीक समझ नहीं रखते। कौन सा मीडिया संस्थान है, जो कृषि पत्रकारिता पढ़ा रहा है। आज हमारे बीच लाखों लोग ऐसे हैं, जो क्रिकेट का खेल परदे पर देख-देखकर क्रिकेट के जानकार बन बैठे हैं।

विदेशों में कहा जाता है कि भारत का नया धर्म क्रिकेट बन गया है। क्रिकेट ही नहीं, हाल के वर्षों में तो हॉकी, कबड्डी, फुटबॉल, एथलेटिक्स, वॉलीबॉल, बैडमिंटन, तीरंदाज़ी, तैराकी और अनेक खेल भी विदेशी स्पोर्ट्स चैनलों पर छाए रहते हैं। सौ करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले देश में एक देसी खेल चैनल है-डीडी स्पोर्ट्स। देखने में किसी विदेशी स्पोर्ट्स चैनल का प्रेत संस्करण नज़र आता है। क्या कोई बता सकता है कि अलग-अलग खेल के कवरेज की बारीकियां सिखाने वाला पत्रकारिता पाठ्यक्रम किस यूनिवर्सिटी में है? हमारी सेना दुनिया की श्रेष्ठतम और ताक़तवर सेनाओं में से एक है, लेकिन डिफेन्स पर केंद्रित कोई चैनल आज तक नहीं पैदा हो पाया। मेरे एक मित्र रक्षा चैनल के लिए हथेली पर भरपूर बजट लिए बैठे हैं। कहते हैं-मुझे रक्षा कवरेज के जानकार दस पत्रकार नहीं मिल रहे हैं। मैं इतना पैसा फंसाकर सतही और मसालेदार डिफेन्स चैनल नहीं निकालना चाहता। बताइए किसी यूनिवर्सिटी में डिफेन्स पत्रकारिता पढ़ाई जाती है? यही हाल पर्यावरण और वाइल्ड लाइफ का है। यहां तक कि ढंग से डॉक्यूमेंट्री चैनल भी हम नहीं निकाल पा रहे हैं। डॉक्यूमेंट्री, पर्यावरण, वन्य जीव जैसे विषयों पर पत्रकारिता करनी हो तो कौन सा संस्थान इनके विशेषज्ञ पत्रकारों की फसल तैयार करता है? और तो और हम अपनी संस्कृति पर बड़ा नाज़ करते हैं और बाबा चैनल दिखाते हैं। यह कैसी धर्म आधारित पत्रकारिता है जो प्रवचन और भजनों पर नाचना सिखाती है। यह कौन सी पत्रकारिता है जो ताबीज़ बांटकर मनोकामना पूरी करना दिखा रही है। भारतीय संस्कृति, आध्यात्म और उसके सिद्धांत कौन सा विश्वविद्यालय आधुनिक अवधारणा के साथ पढ़ा रहा है? भारत की दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी सीमाएं समंदर से घिरी हैं। करोड़ों लोगों की ज़िंदगी समंदर संस्कृति पर आधारित है, पर कहीं भी मौसम विज्ञान और कोस्टल कल्चर पर आधारित पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाई जाते। क्यों?

तस्वीर बेहद निराशाजनक है। भारी भरकम फीस लेने के बाद आप उन्हें दूसरे-तीसरे या चौथे दर्ज़े का प्रोफेशनल बना रहे हैं। इतना ज़ुल्म तो न करें मिस्टर प्रोफेसर!

साभार- http://www.samachar4media.com से



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