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मुंबई में अंतर्राष्ट्रीय वैश्य फेडरेशन का गठन

दुनिया भर में फैले वैश्य समाज के लोगों को एक मंच पर लाने की दिशा सार्थक पहल करते हुए मुंबई में विभिन्न व्यवसायों से जुड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों व कॉर्पोरेट जगत से जुडे लोगों ने इंटरनेशनल वैश्य फेडरेनशन का गठन किया है। यह संगठन देश भर में फैले वैश्य समाज जिनमें जैन, माहेश्वरी, अग्रवाल, खंडेलवाल से लेकर वैश्य समाज से जुड़े सभी लोग शामिल होंगे,  को एक राजनीतिक शक्ति बनाने के साथ ही उनके हितों के लिए संघर्ष करेगा।

मुंबई के इंडियन मर्चेंट चेबर मे आयोजित एक शानदार समारोह में इसका पहला समारोह योजित किया गया जिसमें बड़ी संख्या में कारोबारी, उद्योगपति आदि शामिल हुए।

इंटरनेशनल वैश्य फेडरेशन के गठन में मुंबई के जाने माने उद्योगपति और दानदाता श्री राकेश झुनझुनवाला को अध्यक्ष, श्री आर. के मित्तल को कार्यकारी अध्यक्ष व श्री डीसी गुप्ता को महासचिव बनाया गया। श्री गुप्ता देश की कई प्रमुख कंपनियों में अध्यक्ष व प्रबंध संचालक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं।

कार्यक्रम का संचालन वैश्य फेडरेशन के पीआरओ श्री कन्हैयालाल खंडेलवाल ने किया। इस अवसर पर श्री राकेश मेहता ने कहा कि वैश्य समाज के तीन प्रमुख एजेंडे हैं – वैश्य समाज को संगठछित कर राजनीतिक दलों को इस बात के लिए मजबूर करना कि वे चुनावों में वैश्य समाज की उपेक्षा न करें, आएएस व आपीएस जैसी परीक्षाओं में शामनल होने वाले वैश्य समाज के छात्र-छात्राओं को एक लाख रु. की सहायता प्रदान करना और देश भर में फैली वैश्य समाज की विभिन्न प्रतिभाओं को एक मंच प्रदान करना ताकि समाज के सभी लोगों को उनके बारे में जानकारी हो और उन्हें बेहतर कुछ करने के लिए सहायता मिल सके।

इस अवसर पर आयोजित कवि गोष्ठी में मध्य प्रदेश के सतना से आए अशोक संदेरिया और अकोदिया के श्री गोविंद राठी ने अपनी हास्य रचनाओं स सबका मनोरंजन किया, लेकिन दोनों समय पूरे कवि कविताए सुनाने की बजाय तालियाँ बजवाने की भोंडी मांग करते रहे जिससे लोगों का कविता सुनने का मजा किरकिरा हो गया। हर एक लाईन सुनाने के बाद दोनों कविश्रोताओं को मजबूर करते थे कि वे ताली बजाएँ, ऐसा लगता था मानो ये कविता सुनाने नहीं बल्कि तालियाँ बजवाने आए हैं, जब कई श्रोताओं ने उनकी बार बार की माँग पर तालियाँ नहीं बजाई तो ये उन पर छींटा-कशी करने लगे। पूरे हाल में उन लोगों को जानबूझकर निशाना बनाने लगे जो उनकी कविताओं पर तालियाँ नहीं बजा रहे थे। कार्यक्रम के बाद में कई श्रोताओं ने कवियों की इस छींटाकशी पर अफसोस जाहिर किया।

इन दिनों हर कवि सम्मेलन में ये दृश्य आम होता जा रहा है कि कोई भी कवि कैसी भी दो कौड़ी की रचना सुनाए वह हर एक लाईन पर तालियाँ बजाने का आग्रह इस अधिकार से करता है मानो श्रोताओं को तालियाँ बजाने के लिए ही इकठ्ठा किया गया है। एक आम सुधी श्रोता इन कवियों की इस बेहूदगी पर मन मसोस कर रह जाता है।

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