Saturday, March 2, 2024
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Homeपुस्तक चर्चा"मेरा भारत, अमर भारत " विवेकानंद के विचारों का विस्तार है

“मेरा भारत, अमर भारत ” विवेकानंद के विचारों का विस्तार है

भारत के आदर्श एवँ मूल मंत्र ‘ त्याग और सेवा ‘ की धाराओं की तीव्रता के प्रबल अग्रणी स्वामी विवेकानन्द के भारत-विषयक सन्देशों पर आधारित पुस्तक “मेरा भारत, अमर भारत ” में आस्था,विश्वास,आशा,बल और साहस को आत्मसात् कर नई ऊँचाइयों तक उन्नत करने वाले सन्दर्भों और उद्धरणों का संकलन किया गया है।
आरम्भ में स्वामी लोकेश्वरानंद के आलेख ‘स्वामी विवेकानन्द का सन्देश’ में मनुष्य निर्माण-उनका जीवनोद्देश्य,आम जनता की उन्नति,शिक्षा द्वारा चरित्र- निर्माण,आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा उद्धार, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के द्वारा विकास,भारतीय जीवन पद्धति,स्वामी विवेकानन्द की कार्ययोजना,जिओ और जीने दो,श्रमिक का बुद्धिजीवी वर्गों में समता,इत्यादि का सारगर्भित विवेचन किया है।

‘मेरा भारत,अमर भारत’ के अन्तर्गत भारत का इतिहास,संस्कृति तथा आदर्श; विश्व सभ्यता को भारत का अवदान; भारतीय जीवन में धर्म का स्थान; चिरन्तन भारत; हे भारत मत भूलना! जैसे शीर्षकों में स्वामी जी के सामयिक उद्धरणों का विवरण है।

‘हमारे राष्ट्रीय पतन के कारण’ में विषयानुरूप पतन के कारणों को उद्धरित किया है । यथा-आम जनता की उपेक्षा राष्ट्रीय महापाप है; जनता पर अत्याचार – इतिहास के साक्ष्य; धर्म के नाम पर जन-शोषण; शिक्षा पर एकाधिकार; लोगों को कहा गया कि वे कुछ भी नहीं है; आलस्य और नीचता; संकीर्णता; संगठन का आभाव; नारी की अवहेलना।

‘भारत के पुनरुत्थान के उपाय’ में विषयानुकूल सार्थक सन्देश हैं जिनमें-कुछ भी नष्ट मत करो; आम जनता- शक्ति की स्रोत; हे भारत के श्रम जीवियों; आम जनता का उत्थान; दोष धर्म का नहीं; अपने इतिहास को जानो; राष्ट्रीय महापुरषों के प्रति श्रद्धा; धर्म पर आघात मत करो; भूखे भजन न होत गोपाला; नारी जागरण; आत्मनिर्भरता के लिए शिक्षा; विदेशों के साथ आदान-प्रदान; भारतीय परम्पराओं में ही नये भारत का गठन; चाहिए सच्चे देश भक्तों की टोली; राष्ट्र निर्माण के अग्रदूतों से; हमारा मूलमंत्र-त्याग और सेवा; आत्म- विश्वास और आत्मश्रद्धा; नया भारत; इस युग का केन्द्र होगा-भारत सन्दर्भित गहन विवेचन उभर कर आया है।

इनके अतिरिक्त ‘शिक्षा : एकमात्र समाधान’ ; नारी- शक्ति और उसका जागरण’ ; ‘स्वयं पर विश्वास’ ; ‘राष्ट्रीय एकता’ ; ‘विश्व के पथ-प्रदर्शक’ के सन्दर्भ में स्वामी विवेकानन्द के विचारों का सारगर्भित विवेचन उभर कर सामने आया है।

‘सच्चे धर्म का स्वरूप’ में धर्म की परिभाषा और सच्चा धर्म; ईश्वर प्राप्ति के मार्ग; ज्ञान योग-विचार का मार्ग; राजयोग-मन:संयम का मार्ग; भक्ति योग-प्रेम का मार्ग; कर्मयोग-कर्म का अनासक्ति मार्ग; धर्म-समन्वय; धार्मिक व्यक्ति के लक्षण; और जीवन्त ईश्वर की पूजा के बारे में विश्लेषणात्मक सन्दर्भों को उद्धरित किया गया है। वहीं ‘अग्निमयी उक्तियाँ ‘ के अन्तर्गत स्वामी विवेकानन्द की लगभग चौरासी पथ-प्रदर्शक उक्तियाँ दी गई हैं। यही नहीं इस पुस्तक में ‘ स्वामी विवेकानन्द के जीवन की स्मरणीय घटनाएँ ‘ भी उल्लेखित की गई हैं ।

अन्त में ‘कुछ मनीषियों की दृष्टि में स्वामी विवेकानन्द’ के अन्तर्गत उन्नीस मनीषियों के प्रेरक और दिशाबोधक विचार उद्घाटित किये गए हैं।

अन्ततः यही कि – ” …वे जानते थे कि भारत को साहस तथा आत्मविश्वास की जरूरत है।… उसे न तो दूसरों का अनुकरण करना है, और न ही दूसरों पर निर्भर रहना है। उसे अपने स्वयं के प्रयासों से अपनी वर्तमान तथा भविष्य में भी आने वाली समस्याओं का हल निकालना होगा। ” – स्वामी लोकेश्वरानंद जी की इस विवेचना में स्वामी विवेकानन्द के विचार और उनकी दृष्टी से वर्तमान के विकसित और कर्मरत भारत तथा भविष्य के साहसी भारत के दिग्दर्शन होते हैं।

ऐसे में स्वामी विवेकानन्द की यह भविष्यवाणी प्रासंगिक हो जाती है , जब उन्होंने कहा था कि – ” भारत एक बार फिर समृद्ध तथा शक्ति की महान् ऊँचाइयों तक उठेगा और अपने समस्त प्राचीन गौरव को पीछे छोड़ जाएगा। ” साररूप में यही कि स्वामी विवेकानन्द के ये संकलित सन्देश और विचार वर्तमान और भविष्य के लिए पथ-प्रदर्शक तो है हीं प्रासंगिक भी हैं।
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