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मेरे नाम के साथ स्वर्गीय नहीं लगे, इसलिए लिखता हूँ: श्री महावीर प्रसाद नेवटिया

मुंबई में सफल जीवन के कई आयाम हैं, यहाँ सफलता का मतलब है उद्योग, व्यापार और कारोबार में सफलता लेकिन कोई व्यक्ति व्यापार में सफल होने के साथ ही साहित्य अनुरागी हो और अनुरागी भी ऐसा कि साहित्य से होने वाली कमाई देश के सुदुर आदिवासी क्षेत्रों में रह रहे लोगों के लिए दान कर दे तो हैरानी होती है। श्री महावीर प्रसाद नेवटिया मुंबई की ऐसी शख्सियत हैं जिनके संकल्प, विनम्रता और साहित्य प्रेम को देखें तो उनके प्रति श्रध्दा उमड़ती है। साहित्य उनका संस्कार है तो अर्थदान देना उनका सामान्य व्यवहार है। वो जिसे दान देते हैं उसे माँगना नहीं पड़ता, खुद ही आगे होकर दे देते हैं। ‘यत्र-तत्र-सर्वत्र’ और‘देखन में छोटे लागे’ उनकी चर्चित कृतियाँ हैं, जिसके माध्यम से उन्होंने जिंदगी के उन सब रंगों को पिरोया है और उन तमाम समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया है जिनसे एक आम आदमी जीवनभर जूझता है। टाईम्स ऑफ इंडिया में बरसों काम करने के बाद अपनी खुद की विज्ञापन एजेंसी शुरू कर मुंबई में एक सफल व्यवसायी के रूप में महावीरजी नेवटिया ने अपनी खास पहचान तो बनाई ही, साथ ही साहित्य सेवा में भी उसी शिद्दत से लगे रहे।

महावीर प्रसाद जी का 80 वाँ जन्म दिन मुंबई में ही उनके इष्ट मित्रों और परिवारजनों की उपस्थिति में मनाया गया तो उनके जीवन के एक से एक रोचक, प्रेरक और आत्मीय पहलू सामने आए। वे अपने माता-पिता के आज्ञाकारी पुत्र रहे तो विवाह के बाद एक आदर्श पति का दायित्व निभाया, अपने बच्चों के लिए आदर्श पिता रहे तो घर की बहुओं के लिए पिता समान हो गए। पारिवारिक और व्यावसायिक जिम्मेदारियों के साथ साहित्य सृजन में भी उसी निष्ठा से लगे रहे। परिवार के हर सदस्य को भरपूर समय और प्यार दिया तो साहित्य की सेवा में भी लगे रहे। यही महावीर जी की खासियत रही।

उनके बेटे मयंक और मुकुल ने कहा कि बचपन में पिताजी हमसे सब काम करवाते थे, दूध लाने से लेकर बाजार से सामान लाने तक। हमको पास बिठाकर अखबार भी पढ़वाते थे। उनकी इस आदत की वजह से हमको पढ़ाई के अलावा दुनियादारी की उन बातों को समझने में आसानी रही जो हम स्कूल व कॉलेज की किताबें पढ़कर कभी नहीं सीख सकते थे। इन्होंने पूरे परिवार को एकजुट बनाकर रखा। हमारी माताजी जब बीमार हुई तो पूरा समय उनकी सेवा में लगे रहे। डॉक्टरों के मना करने के बावजूद उनकी पसंद की हर चीज उन्हें लाकर देते थे, क्यों इन्हें पता था कि उनका जीवन अब ज्यादा दिन का नहीं है।

उनके बेटे मुकुल की पत्नी आस्था ने कहा कि मैं बचपन में अपने पिता को खो चुकी थी। जब यहाँ बहू बनकर आई तो बाबूजी के रूप में मुझे अपने पिता मिल गए।

मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष श्री करुणाशंकर उपाध्याय ने कहा कि लेखक संत स्वरूप होता है जो दूसरे के दुःख से पिघलता है। महावीर जी ने जीवन के हर पक्ष पर लिखा और इतनी सहज व सरल भाषा से लिखा कि पाठक उनके लेखन से सहज तादात्म्य स्थापित कर लेता है।

गुरूजी श्री विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि जीवन की गंभीर से गंभीर बात को भी वे चुटीले और अंदाज में लिखकर उसे सरस-सरल अंदाज़ में पेश कर देते है। उन्होंने अपने लेखन में आत्मवेदना को समाधान के रूप में अभिव्यक्त किया है।

नवभारत टाईम्स के संपादक श्री सुंदर चंद ठाकुर ने कहा कि व्यवसाय करते हुए लेखक या साहित्यकार बनकर जीना इतना आसान नहीं है।

गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब के अध्यक्ष श्री सुनील सिंघानिया ने कहा कि जब ये सुंदर नगर मालाड में रहते थे तो मैं नया नया सीए बना था और रोज एक घंटा बाबूजी के साथ बिताता था। मैं इनकी हर बात से हर बार कोई न नई बात सीखता था, और आज महसूस कर रहा हूँ कि इनकी कही गई छोटी छोटी बातें जीवन में मेरे कितनी काम में आई। इनकी कविताएँ, मजेदार संस्मरण आज भी याद हैं।

गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब के पूर्व सचिव श्री सुनील देवली ने कहा कि मेरी दोस्ती तो इनके बेटे मुकुल से है लेकिन महावीरजी ने भी मेरे साथ हमेशा दोस्ती का रिश्ता रखा। अब मुकुल से हमारी इतनी मुलाकात नहीं हो पाती इसलिए एक शेर याद आ रहा है- सोचता हूँ दोस्तों पर मुकदमा कर दूँ, कम से कम तारीख पर तो मिलते रहेंगे।

परिवार, समाज और साहित्य जगत से एक साथ जुड़े रहना और सबसे सम्मान पाना नेवटिया जी की विशेषता है।

गुजरात से आए वात्सल्य धाम के संचालक श्री अजीत सोलंकी न बताया कि हमने 27 आदिवासी बच्चियों के लिए आश्रम शुरु किया था ताकि वे वहाँ पढ़ाई कर सकें, तब से लेकर आज तक आदरणीय नेवटिया जी इसके लिए मदद करते आ रहे हैं। आज यहाँ 70 बच्चियाँ रह रह है।

श्रीहरि सत्संग समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सत्यनारायण काबरा ने महावीरजी की उदारता का उल्लेख करते हुए कहा कि औरंगाबाद में हम डॉ. हेडगेवार अस्पताल देखने के लिए महावीरजी को साथ लेकर गए थे। वहाँ एक मशीन की ज़रुरत थी जिसकी लागत लगभग 75 लाख रुपये थी। औरंगाबाद से आते ही महावीरजी ने उस मशीन की व्यवस्था अपनी ओर से करने के लिए चैक दे दिया।

श्री भागवत परिवार के समन्वयक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने कहा कि महावीर जी ने अपने व्यवसाय के माध्यम से एक नई ऊँचाई को छुआ मगर वे शब्द साधक बने रहे। कारोबार की जटिलताएँ और विवशताएँ उनकी साहित्या साधना में कहीं आड़े नहीं आ पाई।

टिबड़ेवाला विश्वविद्यालय झुँझुनू के श्री विनोद टिबड़ेवाल ने कहा कि नेवटिया जी जैसा लिखते हैं वैसा ही जीवन जीते हैं। उनके जीवन में किसी तरह का कोई आडंबर या कृत्रिमता नहीं है।

 

 

अपने जन्म दिन पर विभिन्न वक्ताओं द्वारा प्रस्तुत अहोभाव के प्रत्युत्तर में महावीर जी ने कहा-ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे ऐसे बेटे और बहू मिले जिन्होंने मेर साहित्य साधना में कभी कोई बाधा नहीं आने दी। उन्होंने कहा, अकेले चलने के जिनमें हौसले होते हैं उनके पीछे ही काफिले हजार होते हैं

 

 

नेवटियाजी ने कहा, मैने अपनी पुस्तकें बिकने के लिए नहीं लिखी। मैने अपनी पुस्तकों की कोई कीमत ही नहीं रखी, बल्कि पुस्तकों में लिखवा दिया कि जो कोई भी इनकी कीमत देना चाहे वो श्रीहरि सत्संग समिति को चैक भेज दे। इस अपील का असर ये हुआ कि श्रीहरि सत्संग समिति को 2 लाख 32 हजार की राशि मेरे पाठकों ने भेज दी।

उन्होंने बताया कि चित्रकूट में कथा थी। वहाँ मैने मेरी दो पुस्तकें बँटवाई। वहाँ दिल्ली से एक सज्जन आए थे श्री रामचन्द्र मोदी, उन्होंने खुद मेरी 500 किताबें छपवाई। मैं एक बार दिल्ली गया तो उन्होंने मुझे अपने बेटों से मिलवाया और कहा कि इनको समझाओ कि एक आदमी को कितना कमाना, कबतक कमाना चाहिए, इसकी कोई सीमा भी तो होनी चाहिए।

इसी तरह दिल्ली से एक बहन ने फोन किया कि उसने मेरी किताब के 600 रुपये श्रीहरि सत्संग समिति को भेजे हैं। मैने कहा 600 रुपये किस हिसाब से तो उसने बताया कि ये किताब मैने तीन बार पढ़ी इसलिए एक किताब के 200 रुपये के हिसाब से मैने तीन गुना पैसे भेज दिये। उसने कहा कि जैसे ही मैने आपकी किताब खोली तो ऐसा लगा जैसे फ्रिज खोल दिया है और इसमें जीवन से जुड़ी हर बात कही गई थी।

इसी तरह एक प्रोफेसर ने लिखा कि मैं ज्यादा हिंदी नहीं समझता मगर इसको पढ़ने में मजा आया और मैने इसका कन्नड़ में अनुवाद करवा दिया।

एक महिला ने लिखा कि मैने ये किताब पूजा घर में ही रख दी है।

कार्यक्रम में उनके पुत्र मयंक की पत्नी श्रीमती रेखा नेवटिया ने कहा कि घर में बहू बनकर आई तो सबकुछ नया नया और अनजाना सा था मगर बाबूजी ने इतनी आत्मीयता से मुझे इस परिवार का सदस्य बना लिया कि कभी महसूस ही नहीं हुआ कि मैं यहाँ बहू बनकर आई हूँ।

महावीर जी के एक –एक शब्द से उनकी पुस्तकों का सार टपक रहा था।

उन्होंने कहा कि पुस्तक लिखना एक साधना है और पुस्तक को लेकर पाठकों की प्रतिक्रिया च्यवनप्राश का काम करती है।

कभी-कभी सदमें दे जाती है ज़िंदगी,

ज़िंदगी से शिकायत करें भी तो कैसे

कभी कभी आप जैसे लोगों से मिलवाती है ज़िंदगी

उन्होंने कहा कि जब मेरे मित्र मुझसे पूछते हैं कि आप तो अपना कारोबार सफलता के साथ चला रहे हो तो किताबें लिखने की क्या ज़रुरत। इस पर मैं सबको यही कहता हूँ कि गोस्वामी तुलसीदास, कबीर जैसे लोगों के साथ कभी स्वर्गीय नहीं लिखा जाता, क्यों कि वो अपनी लेखनी से अजर अमर हो गए हैं। मेरे नाम के साथ भी स्वर्गीय नहीं लगे, इसलिए मैं किताब लिखता हूँ।

उन्होंने लेखक की शक्ति क्या होती है इसका उदाहरण देते हुए बताया कि राजस्थान के राजा मानसिंह जब काबुल जीतकर आए और आशीर्वाद लेने उनकी माँ के पास गए तो माँ न कहा कि काबुल क्या है लंका जीतकर आओ तो कुछ बात बने। माँ की बात सुनकर राजा परेशान हो गए मगर माँ की बात को टाल नहीं सकते थे।

राजा ने सेनापति को आदेश दिया कि हमें लंका विजय की तैयारी करना है। लेकिन सेनापति जानता था कि लंका विजय इतनी आसान नहीं और राजाज्ञा को टाला भी नहीं जा सकता था। सेनापति रातभर सोचते रहे और सुबह उन्होंने राजा को कुछ लाईनें लिखकर दी। उसमें लिखा था-राजा मानसिंह सूर्यवंशी हैं। लंका को सूर्यवंशी राम ने जीतकर इसे विभीषण को दान में दे दिया था। किसी सूर्यवंशी को ये शोभा नहीं देता कि दान की हुई चीज वापस लेने के लिए युध्द करे। राजा को ये बात समझ में आ गई और उन्होंने अपनी माँ को भी समझाकर युध्द की इस चुनौती से पार पा लिया।

इस अवसर पर नेवटिया जी के जीवन पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई गई, जिसमें उनके परिवारजनों ने उनके व्यक्तित्व के विविध पहलुओं पर अपने आत्मीय अनुभव प्रस्तुत किए।

श्रीहरि सत्संग समिति की ओर से श्री स्वरुपचंद गोयल, श्री सत्यनारायण काबरा और श्रीभागवत परिवार की ओर से श्री वीरेन्द्र याज्ञिक व श्री सुभाष चौधरी ने शाल ओढ़ाकर श्री नेवटिया जी का सम्मान किया।

कार्यक्रम में नेवटियाजी के पारिवारिक सदस्य, इष्ट मित्र आदि बड़ी संख्या में उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन श्री सुरेन्द्र विकल ने किया।



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