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नानाजी देशमुख : ‘समाजशिल्पी दंपत्ति’ के समर्थ सर्जक

मानस के राजहंस डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र हिंदी की वह विरल विभूति हैं जिनकी वाणी ग्राम्य-कुटीर से लेकर राष्ट्रपति भवन तक गूंजी। उनका एक मुक्तक है –

निश्चय समझो जो कभी तुम्हारा बाधक था
वह देख तुम्हारा तेज स्वयं साधक होगा
तुम अपने आदर्शों के आराधक हो लो
पथ स्वयं तुम्हारे पथ का आराधक होगा

इस वर्ष को दो महान विभूतियों के जन्म शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। दोनों का जन्म 1916 में हुआ था। दोनों परम राष्ट्र भक्त हुए। दोनों पर पूरे राष्ट्र को गर्व है। दोनों विभूतियों के संदेशों में राष्ट्रोदय का अद्भुत मर्म हैं। ये विभूतियाँ हैं – एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय और निश्च्छल-निर्मल समाज सचेतक नानाजी देखमुख, जिनके जीवन और दर्शन पर मिश्र जी की उक्त पंक्तियाँ अक्षरशः सटीक प्रतीत होती हैं।
साल 2005 में भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम चित्रकूट आए थे। यहां पर उनका समाजसेवी नानाजी देशमुख आश्रम में आना हुआ, तो वे प्रोटोकॉल तोड़कर सामान्य नागरिकों के साथ पंगत में बैठकर भोजन करने लगे. इस दौरान डॉ. कलाम काफी भावुक हो गए थे क्योंकि उन्हें अपने बचपन की याद आ गई थी। दरअसल चित्रकूट आने पर डॉ. कलाम ने जमीन पर पंगत में ही बैठकर महिला सरपंचों के साथ भोजन किया था। जबकि राष्ट्रपति होने के नाते उनकी भोजन व्यवस्था अलग थी। तत्कालीन राष्ट्रपति कलाम ने आश्रम के आसपास के गांवों की मुकदमेबाजी से मुक्त व्यवस्था देखी तो कहा कि मुझे रामेश्वरम् में बिताए अपने बचपन की याद आ जाती है।

उन्होंने बताया कि जब हर दिन नमाज के बाद मेरे पिताजी के पास 10-20 परिवार अपने घर और जमीन की समस्याएं लेकर आते थे। दो-तीन दिन में उन सबको मेरे पिताजी उनकी समस्याओं के बारे में सुझाव व निदान बताया करते थे। हर शुक्रवार को मेरी मां भी मुस्लिम महिलाओं की समस्याएं सुनती थीं औऱ उन्हें निपटाने में मदद करती थीं। मेरे बड़े भाई पंचायती अदालत के प्रमुख थे, लेकिन 70 के दशक के बाद मानवीय स्पर्श से गुंथी ये व्यवस्थाएं खत्म हो गईं और अब ज्यादातर झगड़े अदालतों में जाते हैं. इस परिदृश्य में चित्रकूट के आस-पास के 80 गांवों का झगड़े-मुकदमेबाजी से मुक्त होना एक आदर्श उदाहरण है। दरअसल नाना जी ऐसे ही विराट व्यक्तित्व थे। उन्हें किसी पहचान की दरकार नहीं है। उनकी विलक्षणता और समर्पित सामाजिक सरोकारों ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी है। जन-मन में एक अमिट छाप छोड़ी है।

एक प्रखर संगठक, लोकप्रिय नेता और ग्रामोदय के प्रति समर्पित समाजसेवी के नाते नानाजी देशमुख अगाध प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं। राजनीति से संन्यास लेने के बाद उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सुदूर ग्रामीण इलाकों और ग्रामीणों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। भोले भले ग्राम्य जनों में नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का संचार करने का बीड़ा उठाया। ग्रामोदय से भारत के भाग्योदय का सपना देखा। उसे धरातल पर उतार लेन का अभियान चलाया। अधिक उम्र को मार्ग की बढ़ा नहीं बनने दी। सेवा निवृत्त होने की उम्र में अपने जीवन के क्षण-क्षण को सेवा समृद्ध बनाने में जुटे रहे।

सामाज योद्धा नानाजी ने पहले उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े जिले गोंडा में काम शुरू किया। फिर, सूखा पीडि़त और गरीबी से त्रस्त महाराष्ट्र के बीड जिले को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। अंत में वे उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में करीब 500 गांवों में नैतिक मूल्यों के साथ व्यापक सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए वहीं जम गए। चित्रकूट परियोजना संस्थागत विकास और ग्रामीण विकास के एक मॉडल के रूप में अनोखा प्रयास है। इसमें ऐसे विकास पर जोर दिया गया है, जो भारत के लिए सबसे उपयुक्त है। वह जनता की शक्ति पर आश्रित है। उन्होंने सिखाया कि शोषितों और उपेक्षितों के साथ एक रूप होकर ही प्रशासन और राजकाज का गुर सीखा जा सकता है। यह भी कि युवा पीढ़ी में सामाज निर्माण की चेतना जगाना अनिवार्य है।

चित्रकूट परियोजना चित्रकूट के आसपास के पांच गांवों के समूह बनाकर सौ गांव समूहों को विकसित करने के लिए तैयार की गई। चित्रकूट परियोजना आत्मनिर्भरता की मिसाल है। इसके तहत गांव के हर व्यक्ति, परिवार और समाज के जीवन के हर पहलू पर गौर किया जाता है। इस मुहिम की कुंजी है समाज शिल्पी दंपती। ये दंपती गांव के ही होते हैं और पांच गांवों के समूह में प्ररेणा देने की जिम्मेदारी निभाते हैं। सबसे पहले इनकी आय वृद्घि पर विचार किया जाता है। इसके लिए जरूरत के मुताबिक जल संचयन और मृदा प्रबंधन की तकनीक अपनाई जाती है। साथ-साथ उद्यम कौशल और स्व-सहायता समूह के जरिए आय बढ़ाने के उपाय अलग होते हैं और ये सभी उपक्रम जुड़े होते हैं। (1) कोई बेकार न रहे (2) कोई गरीब न रहे (3) कोई बीमार न रहे (4) कोई अशिक्षित न रहे (5) हरा-भरा और विवादमुक्त गांव हो। ग्राम विकास की इस नवरचना का आधार है समाजशिल्पी दम्पत्ति, जो पांच वर्ष तक गांव में रहकर इस पांच सूत्रीय लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम करते हैं।

ग्रामोदय से राष्ट्रोदय के अभिनव प्रयोग के लिए नानाजी ने 1996 में स्नातक युवा दम्पत्तियों से पांच वर्ष का समय देने का आह्वान किया। पति-पत्नी दोनों कम से कम स्नातक हों, आयु 35 वर्ष से कम हो तथा दो से अधिक बच्चे न हों। इस आह्वान पर दूर-दूर के प्रदेशों से प्रतिवर्ष ऐसे दम्पत्ति चित्रकूट पहुंचने लगे। चयनित दम्पत्तियों को 15-20 दिन का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान नानाजी का मार्गदर्शन मिलता है। नानाजी उनसे कहते हैं- “राजा की बेटी सीता उस समय की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में 11 वर्ष तक रह सकती है, तो आज इतने प्रकार के संसाधनों के सहारे तुम पांच वर्ष क्यों नहीं रह सकतीं?” ये शब्द सुनकर नवदाम्पत्य में बंधी युवतियों में सेवा भाव और गहरा होता है तो कदम अपने सुनहरे शहर एवं घर की तरफ नहीं, सीता की तरह अपने पति के साथ जंगलों- पहाड़ों बीच बसे गांवों की ओर बढ़ते हैं। तब इनको नाम दिया जाता है- समाजशिल्पी दम्पत्ति। वर्तमान में 40 समाजशिल्पी दम्पत्ति यहां कार्यरत हैं।

अपनी मातृभूमि के गौरव और उसकी सेवा के लिए नानाजी ने पूरा जीवन होम कर दिया। उन्हें गाँवों की मिट्टी की सोंधी महक में सदा महसूस किया जाएगा। लोगों के हृदयों में उनका राज रहेगा। हमेशा आबाद उनका ग्रामीण समाज रहेगा।
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लेखक हिंदी विभाग, दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव में प्राध्यापक हैं।
मो. 93010 54300



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