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हिंदी पत्रकारिता को नए तेवर देने वाले नंदकिशोर नौटियाल नहीं रहे

वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल का देहरादून में निधन हो गया है। वह 89 वर्ष के थे। नंदकिशोर नौटियाल ने मुंबई से प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक हिंदी ‘ब्लिट्ज’ के संपादक रहे और महानगर के हिंदीभाषी समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों का नेतृत्व किया। मुंबई में नौटियाल जी ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से भारतीय समाज में जगह-जगह बिखरी असमानता की खाई को भरने का भरपूर काम किया। ब्लिट्ज़ बंद होने के बाद उन्होंने मुंबई से साप्ताहिक नूनत सवेरा का प्रकाशन किया जिसके तेवर ब्लिट्ज़ जैसे ही थे।

वे मुंबई के हिंदी साहित्य जगत के पितृ पुरुष थे। मुंबई में होने वाले हिंदी के किसी भी कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति अनिवार्य होती थी। वे जीवन के अंतिम समय तक सक्रिय रहे और कंप्यूटर पर टायपिंग सीखकर अपना पूरा उपन्यास अलकनंदा टाईप किया। मुंबई में हिंदी पत्रकारिता करने वाले नए पत्रकारों को नौटियालजी हर तरह से मार्गदर्शन, हौसला और आर्थिक मदद भी देते थे। हिंदी भाषी समाज का कोई भी जरुरतमंद व्यक्ति बेहिचक नौटियालजी के पास जाकर मदद मांग लेते था और नौटियाल जी बगैर किसी लागलपेट के उसकी मदद कर देते थे।

वे ‘महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी’ के कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे और अपने कार्यकाल में उन्होंने सर्वभाषा सम्मेलन का आयोजन कर देश भर की सभी भाषाओं के साहित्यकारों और कवियों को एक मंच पर स्थान दिया।

वे बद्रीनाथ-केदारनाथ की मंदिर समिति के वे अध्यक्ष भी रहे। बता दें कि मुंबई के श्रीमंत समाज में ‘पंडितजी’ और पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य जगत में ‘बाबूजी’ के नाम से प्रख्यात नंदकिशोर नौटियाल का जन्म 15 जून 1931 को उत्तराखंड राज्य में पौड़ी गढ़वाल जिले के एक छोटे से पहाड़ी गांव में पंडित ठाकुर प्रसाद नौटियाल के घर हुआ। उनकी शिक्षा-दीक्षा गांव में और दिल्ली में हुई। देश-दुनिया के प्रति जागरूक नंदकिशोर नौटियाल छात्र जीवन के दिनों में ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। दिल्ली की छात्र कांग्रेस की कार्यकारिणी के सदस्य के तौर पर उन्होंने 1946 में बंगलोर (अब बेंगलुरु) में हुए छात्र कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशन में भाग लिया। 1946 में ही नौसेना विद्रोह के समर्थन में जेल भरो आंदोलन में भी शिरकत की।

 

 

नंदकिशोर नौटियाल ने पत्रकारिता की शुरुआत 1948 में की। उन्होंने नवभारत साप्ताहिक (मुंबई), दैनिक लोकमान्य (मुंबई) और लोकमत (नागपुर) में 1948 से 1951 तक काम किया। 1951 में दिल्ली प्रेस समूह की `सरिता’ पत्रिका से जुड़े। दिल्ली में `मजदूर जनता’, `हिमालय टाइम्स’, `नयी कहानियां’ और `हिंदी टाइम्स’ के लिए कई साल कार्य किया। इसके बाद नंदकिशोर नौटियाल धीरे-धीरे मजदूर आंदोलन की तरफ अग्रसर होते गये। 1954 से 57 तक दिल्ली में सीपीडब्ल्यूडी वर्कर्स यूनियन के सचिव रहे और अनेक बार आंदोलन किये। उन्होंने कई मजदूर संगठन बनाये और पत्रकार यूनियनों में सक्रिय रहे। गोवा मुक्ति संग्राम में भी भाग लिया।

नंदकिशोर नौटियाल ने पृथक हिमालयी राज्य तथा उत्तराखंड राज्य आंदोलन में 1952-53 में सक्रिय हिस्सा लिया तथा बाद में 1990-99 में भी उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े। सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में संलग्न रहते हुए भी उन्होंने पत्रकारिता और लेखन को अपना व्यवसाय बनाया। अनेक साप्ताहिक पत्रों और पत्रिकाओं के लिए काम करते हुए 1962 में उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब मुंबई से साप्ताहिक हिंदी `ब्लिट्ज़’ निकालने के लिए उसके प्रथम संपादक मुनीश सक्सेना और प्रधान संपादक आरके करंजिया ने उन्हें चुना। 10 साल सहायक संपादक रहने के बाद 1973 में नंदकिशोर नौटियाल हिंदी `ब्लिट्ज़’ के संपादक बने।

 

मध्यकाल में योरोपीय समाज में सभ्यता का एक नया मापदंड स्थापित हुआ और वो यह कि सभ्य वही है जो शक्तिशाली है, शासक है जबकि अन्य बर्बर या दस्यु हैं जिन्हें दास बनाकर रखना चाहिए। इससे सभ्यता का विकास और सुव्यवस्था संपन्न होती है। बर्बर और अन्धकारग्रस्त लोगों को अपने अधीन लाकर उन्हें सभ्यता का पाठ पढ़ाना चाहिए। योरोपीय समाज की यह विचारधारा साम्राज्यवाद का वायस बनी। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। कालांतर में जागरण काल और फिर पुनर्जागरण काल में हुए अनेक आंदोलनों ने इस विचारधारा को नकारना शुरू किया परिणाम हुआ साम्राजयवाद का खात्मा। इन आंदोलनों में राजनीतिक और सामाजिक के साथ-साथ जो आंदोलन सबसे अधिक सफल हुआ वह था भाषाई आंदोलन। इस भाषाई आंदोलन में हिंदी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान था। आज़ादी के बाद की हिंदी पत्रकारिता ने भारतीय जीवन में एक नया संतुलन स्थापित करने का बीड़ा उठाया। उस काल खंड पर नजर डालें तो सबसे प्रमुख नाम जो उभरकर आता है वह है ”ब्लिट्ज” और नंदकिशोर नौटियाल का नाम।

मुंबई के श्रीमंत समाज में ‘पंडितजी’ और पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य जगत में ‘बाबूजी’ के नाम से प्रख्यात नौटियालजी ने यूं तो अपनी पत्रकारिता का श्रीगणेश 1948 में दिल्ली से किया लेकिन हालात कुछ ऐसे हुए कि दिल्ली छोड़कर बम्बई (अब मुंबई) आना पड़ा। मुंबई में नौटियाल जी ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से भारतीय समाज में जगह-जगह बिखरी असमानता की खाई को भरने का भरपूर काम किया। असमानता की यह खाई सभ्यता के उस मापदंड से उपजी थी जो योरोपीय विचारों की देन थी। यही कारण था कि हिंदी ”ब्लिट्ज,” जिसके संपादक नौटियालजी थे, ने पत्रकारिता के उस नए क्षितिज को छुआ जहाँ अभी तक कोई नहीं पहुँचा था। नौटियालजी का जुझारूपन और पत्रकारिता के प्रति समर्पण ने उन्हें विशेष की श्रेणी में स्थापित कर दिया। उनकी यह कार्यप्रणाली आज की पीढ़ी के पत्रकारों के लिए एक आदर्श भी है।

 

असमानता के खड्डों को भरने के लिए नौटियाल जी ने मजदूर आंदोलनों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अपनी पेशेवर जिम्मेदारी को निभाते हुए वह हर उस शख्स के साथ पूरी निष्ठा से खड़े होते जो तथाकथित सभ्य समाज की सभ्यता के औजार थे। यह नौटियालजी का मानवीय पहलू था, आज भी है। बड़ा दिल, ऊँचा हौसला और परोपकार की उदात्त भावना। श्रेय लेने पूरी तरह इंकार कर देने वाले एक श्रेष्ठ इंसान।

मुंबई के सहित्य जगत के अलावा धनिक वर्ग के बहुत सारे लोगों के लिए संकटमोचक भी थे नौटियालजी। कैसी भी दुरूह परिस्थिति या संकट आसन्न हो नौटियालजी के अनुभवों की थाती से एक समस्या के कई निदान निकलकर बाहर आ जाते। अपने परोपकारी स्वभाव के चलते उन कठिन कार्यों में भी नौटियाल जी हाथ डाल देते हैं जिन्हें दूसरे अक्सर असंभव कहकर टाल देते हैं लेकिन नौटियालजी के शब्दकोष में यह शब्द है ही नहीं।

नौटियाल जी की 70 वर्षीय पत्रकारिता 20 वीं शती के आधे से अधिक हिंदी पत्रकारिता के पन्नों पर लेखों, समाचारों, रिपोर्टों, और सम्पादकीय आदि के विभिन्न रूपों में दर्ज है जो किसी ऐतिहासिक दस्तावेज से कम नहीं है।

नौटियालजी सकारात्मक ऊर्जा के अजस्र स्रोत रहे। उन्हें पढ़ना और सुनना सकारात्मकता से भर देता है। उनकी पत्रकारिता भी सकारात्मक थी।

1992 में हिंदी `ब्लिट्ज़’ से अवकाश प्राप्त करने के बाद उन्होंने वर्ष 1993 में `नूतन सवेरा’ साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। साहित्यिक और पत्रकारिता प्रतिनिधिमंडलों के सदस्य के तौर पर वह अमेरिका कनाडा, उत्तर कोरिया, लीबिया, इटली, रूस, फिनलैंड, नेपाल, सूरीनाम आदि देशों की यात्रा कर चुके थे। उन्होंने विश्व हिंदी सम्मेलनों में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था। नौटियालजी को हिंदी साहित्य सम्मेलन का साहित्य वाचस्पति सम्मान, आचार्य तुलसी सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का पत्रकार भूषण सम्मान, लोहिया मधुलिमये सम्मान समेत राष्ट्रीय स्तर के कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है।

मुंबई भाजपा के महामंत्री व राज्यमंत्री अमरजीत मिश्र ने वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।  वे 89 वर्ष के थे। श्री मिश्र ने कहा कि नौटियाल जी साहित्य व पत्रकारिता के साथ साथ हिंदीभाषी समाज से भी सीधे जुड़े थे।

मुंबई से प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक हिंदी ब्लिट्ज की उन्होंने लंबे समय तक कमान संभाली और महानगर के हिंदी भाषी समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों का नेतृत्व किया। ‘महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी’ के सचिव और कार्याध्यक्ष के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्री केदारनाथ की मंदिर समिति के वे अध्यक्ष रहे।

श्री मिश्र ने बताया कि अकादमी के कार्यक्रम के संदर्भ मे मेरी 14 अगस्त को उनसे बात हुई थी।अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होने पूरे जोश से बात की थी।

 

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