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काँटों के बीच नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी ने गंगटोक में जोरदार बात कही। भारत की हकीकत बताई। इस हकीकत में उनकी हकीकत भी है। बात कृषि मंत्रियों की कांफ्रेंस में फूलों की नई किस्म, और एक फूल का ‘नमो’ नाम रखते वक्त की है। सच्ची बात है कि नरेंद्र मोदी ने जीवन कांटों के बीच जीया। नरेंद्र मोदी ने कहा- मुझे फूलों की तरह न बनने दें नाजुक! मैं तो कांटों के बीच रहा हूं। और कांटों में ही लगातार रहूंगा। वे आगे बोले- लेकिन जहां जरूरत है वहां फूल जैसी कोमलता के साथ यह जिंदगी दुखी के आंसू पोंछने के काम यदि आ जाए तो इससे बड़ा क्या सौभाग्य होगा।

पता नहीं किस मूड में फूल और कांटे की बात नरेंद्र मोदी ने सोची। हकीकत है कि भारत का कोई दूसरा प्रधानमंत्री इतना कांटों में नहीं रहा जितना नरेंद्र मोदी रहे। बचपन और प्रचारक जीवन की बात छोड़ें उसके बाद का कांटों का योग उनकी सत्ता से अधिक बना। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के साथ से ही उनका सत्ता अनुभव ऐसा कांटों भरा बना कि उन्हें वे कांटे आज भी चुभते होंगे। कांटों के बीच ही नरेंद्र मोदी के राजकाज का संस्कार बना। कई मायनों में कांटों ने नरेंद्र मोदी को बनाया। 2002 के गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने तमाम प्रतिकूल स्थितियों के बीच गुजरात में राज किया था। उन्हें तब केंद्र सरकार, कांग्रेस और सेकुलर ब्रिगेड ने क्या कुछ नहीं कहा। उन्हें नरसंहारकर्ता बताया। मौत का सौदागर कहा। सफेद-काली दाढ़ी में फर्जी मुठभेड़ खोजी गई। देश-विदेश में उन्हें अछूत बनाने की हर संभव कोशिश हुई। कई जांच दल बने। एसआईटी बना और छोटी कोर्ट से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक में उन्हें घेरा गया।

इन कांटों ने ही नरेंद्र मोदी में यह जिद्द बनवाई कि उन्हें सफल होना है। गुजरात से ऐसा कुछ करके दिखाना है जिससे पूरे देश में तूतड़ी बजे। एक मुख्यमंत्री का अखिल भारतीय ब्रांड बने। ऐसा हुआ और यह मामूली बात नहीं थी। आज भी कई मुख्यमंत्री हैं जो दो-दो तीन टर्म मुख्यमंत्री रहे हैं लेकिन न जयललिता का ब्रांड देश में चला हुआ है और न भाजपा के नए या पुराने मुख्यमंत्री यह हवा बनाए हुए हैं कि उनका मॉडल लाजवाब!

वैसे अपना मानना रहा है कि भारत में राज करना कांटों के बीच सांस लेना है। सत्ता और हाकिम को ले कर आम आदमी भले सोचे कि मजे होते हैं। सत्तावान ठसके में रहता है लेकिन हकीकत में भारत में सर्वाधिक टफ कोई काम है तो वह नेतागिरी है। उसे हर तरह की चिंताओं, अनिश्चितताओं और खौफ में जीना होता है। अंग्रेज भारत में ऐसा सिस्टम छोड़ गए हैं जो न खुद सफल होता है और न सवारी करने वाले को सफल बनने देता है। सत्ता के कांटों ने सभी प्रधानमंत्रियों को सत्ता के बावजूद दिन में तारे दिखाए हैं। यह भी तथ्य है कि केंद्र की याकि दिल्ली की सत्ता में प्रदेश से आए नेता फेल हुए हैं। वीपीसिंह और एचडी देवगौड़ा दोनों मुख्यमंत्री का अनुभव लिए प्रधानमंत्री (मोरारजी देसाई का मामला अलग था) थे। इनके बाद तीसरे मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हैं जिनके लिए कांटे दिल्ली में इसलिए भी ज्यादा हैं क्योंकि वे दिल्ली वालों के न चाहने के बावजूद प्रधानमंत्री बने। नेहरू के आईडिया आफ इंडिया में रंगी दिल्ली की सत्ता में एक प्रचारक प्रधानमंत्री के लिए पूरा तख्त ही कांटों भरा है।

तभी अपना मानना है कि नरेंद्र मोदी चाहते हुए भी फूल नहीं बन सकते और न ही गुलदस्तों वाली राजनीति का उनका प्रयोग सफल होगा। वे कितने ही गुलदस्ते भेजें, उन्हें पत्थर मिलेंगे। पिछले पौने दो वर्षों में उन्होंने फूल नवाज शरीफ को भी भेजे तो सोनिया गांधी और सेकुलर मीडिया से भी फूल भरे रिश्ते चाहे। इस चक्कर में उन्होंने यह खतरा बना डाला है जो न वे इधर के हैं और न उधर के। पर शायद नरेंद्र मोदी में गुजरात के कांटों के अनुभव के चलते आत्मविश्वास है कि दुनिया उनकी मुट्टी में होगी। जैसे गुजरात में अकेले उन्होंने अपनी अलग बगिया बनाई थी वैसे दिल्ली के राज से पूरे भारत में भी बना लेंगे। उनका काम बोलेगा। उनका काम मुगल गार्डन को मोदी गार्डन बना डालेगा!

पर बन कुछ और रहा है। वे नहीं सुन रहे हैं, न समझ रहे हैं जबकि असहिष्णुता, सांप्रदायिकता, हत्या से ले कर आतंकी हमले का भूतहा शौर लगातार पसरा हुआ है। कभी दादरी के कांटों का शोर तो कभी दलित आत्महत्या की बात व कभी आतंकी हमले और साथ-साथ माफी का शोर। नरेंद्र मोदी को गुजरात के वक्त भी माफी मांगने के लिए कहा जाता था तो दिल्ली में प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वही राग है। लालू यादव से ले कर केजरीवाल तक की जो अंटशंट उन्होंने सुनी है, माफी मंगवाने की साहित्यकारों से ले कर प्रगतिशीलों की जिस जिद्द में वे लगातार हैं वह कुल मिला कर कांटों का जंजाल है।

नरेंद्र मोदी अपने सिस्टम, अपनी सोच में खोए हुए हैं हालांकि दिल्ली की सत्ता ऐसे औजार लिए होती है जिनसे कांटों की छंटनी हो। नई बगिया बनाई जा सके।

सो यह अजीब बात है कि नरेंद्र मोदी तमाम तरह के कांटों का अंदाज लिए हुए हैं। फिर भी उन्हें भरोसा है कि वे इससे अपने को निखार लेंगे। और बना लेंगे। उन्हें यह ख्याल नहीं है कि यथास्थिति, सिस्टम पर चाबुक चलाए बिना, कांटों को काटे बिना फूलों की पौध तैयार नहीं हुआ करती।

साभार-http://www.nayaindia.com/

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