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लोकतंत्र में संकीर्ण सोच व कुंठित विचार से परहेज़ करना चाहिए

सुबह-सुबह समाचार पत्र,रेलगाड़ी(किसी भी यान में),साइबर कैफ़े, सार्वजनिक स्थान(स्वास्थ्य वर्धक पार्क),जलपान गृह एवं बौद्धिक संस्थानों(अपवाद स्वरूप) वाद-प्रति वाद, विचार-विमर्श का विषय कुंठित सोच/संकीर्ण संप्रत्यय होता है।।स्पष्ठ शब्दों में कहा जाए तो यह घटना जातीय,नस्लीय हमला कुंठित सोच/संकीर्ण विचार का वाहक है।भारत गणतंत्र का संविधान(देश की सर्वोच्च विधि/कानून) प्रत्येक नागरिक एवं व्यक्ति को समानता(सामाजिक,राजनीतिक/राजनैतिक एवं आर्थिक)प्रदान करता है;अर्थात किसी भी नागरिक एवं व्यक्ति को उसके धर्म,मुलवंश, नस्ल,जाति, रंग एवं समुदाय के आधार पर विभेद/निषेध करता है;इसके अतिरिक्त छुआछुत को भी नागरिक अपराध घोषित किया है। 

संविधान प्रत्येक नागरिक एवं व्यक्ति के व्यक्त्वि के विकास के लिए चतुर्दिश प्रयास करता है;एवं ऐसा वातावरण का निर्माण किया है,जिसमें भयविहीन स्वंत्रत अभिव्यक्ति, स्वतंत्र चयन एवं सुख की साधना का उपभोग कर सकते है।संविधान पंथनिरपेक्ष/धर्मनिरपेक्ष भावना का भी समादर करता है।वैश्विक परिदृश्य में भी देखा जाए तो सदियों तक रंगभेद, नस्लीय उत्कृष्टता और दुनिया के बड़े भूभाग पर शासन -शोषण ,औपनिवेशिक दासता/गुलामी का प्रतीक ग्रेट ब्रिटेन(अब इंग्लैंड) का समाज/व्यवस्था स्वयं को इन कुंठित सोच/कुंठित कारकों से पार्थक्य कर रहा है।इस उदारवादी सोच का परिणाम है कि ‘भूरी चमड़ी(अश्वेत का वैकासिक अवस्था) वाले हिन्दू को सरकार का मुखिया/शाशकाध्यक्ष(संबैधानिक राजतन्त्र) में ताजपोशी करा रहा है।

दुनिया के लगभग -लगभग 30 सभ्य राष्ट्र(लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करने वाले देश,संयुक्त राष्ट्र के मौलिक सिद्धांत में आस्था रखने वाले देश) है,जहा पर भारतवंशी/भारतीय मूल के व्यक्ति राष्ट्राध्यक्ष/शाशकाध्यक्ष है।हम सभी भारतीय संविधान के मौलिक संप्रत्यय(मौलिक अधिकार,मौलिक कर्त्तव्य, राज्य के निति-निदेशक तत्त्वों) को आत्मीय स्तर,भाषायी भावनाओ एवं आध्यात्मिक परिवेश एवं नैतिक मूल्य के रूप आत्मसात करना चाहिए।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली में सहायक आचार्य हैं) 

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