आप यहाँ है :

राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है स्टैच्यू ऑफ यूनिटी

हमारे देश में अनेक धर्म, अनेक भाषाएं भी हैं, लेकिन हमारी संस्कृति एक ही है। हर भारतीय का प्रथम कर्त्यव्य है की वह अपने देश की आजादी का अनुभव करे कि उसका देश स्वतंत्र है और इस आजादी की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। जनशक्ति ही राष्ट्र की एकता शक्ति है। ये विचार देश को राष्ट्रीय एकता सूत्र में पिरोने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल के हैं, जो आज भी बेहद प्रासंगिक हैं. 31 अक्टूबर, 1875 गुजरात के नाडियाद में जन्मे सरदार पटेल को भारत का लौह पुरुष भी कहा जाता है। उन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई और देश के प्रथम गृहमंत्री बने। यह विडम्बना ही है कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में केवल 15 भागों को एकत्र करके जर्मनी राष्ट्र खड़ा करने वाले बिस्मार्क नाम के जर्मन राजनीतिज्ञ को विश्व में अभूतपूर्व राजनेता मान लिया गया, परंतु साढ़े 32 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में बसे 565 राज्यों को मिलाकर एक महान भारत का निर्माण करने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल के योगदान को भुला दिया गया। वास्तव में देश के दुर्भाग्य और राजनीतिक कुचक्र के कारण सरदार वल्लभ भाई पटेल को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे।

वर्ष 2009 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल को उनकी गरिमा के अनुरूप सम्मानित करने के लिए विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा बनवाने के बारे में विचार किया। गुजरात विधानसभा में 182 सदस्य चुने जाते हैं, अतएव 182 मीटर ऊंची प्रतिमा बनवाने का निर्णय गुजरात सरकार ने लिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अक्टूबर, 2013 को सरदार पटेल की 138वीं वर्षगांठ के अवसर पर गुजरात में नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के समीप केवड़िया नामक स्थान पर प्रतिमा का शिलान्यास किया। उस समय भारतीय जनता पार्टी ने प्रतिमा के लिए लोहा एकत्रित करने के लिए देशव्यापी अभियान चलाया था। विशेष बात यह है कि नरेंद्र मोदी अब प्रधानमंत्री के रूप में कल इस प्रतिमा का अनावरण करेंगे। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नामक सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 237.35 मीटर है। लगभग 2,989 करोड़ रुपये की लागत से बनी इस प्रतिमा के भीतर एक लिफ्ट लगाई गई है, जिससे पर्यटक सरदार पटेल के हृदय तक जा सकेंगे। यहां से प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य को देखा जा सकेगा। प्रतिमा के निर्माण में इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि प्राकृतिक आपदाएं इसे हानि न पहुंचा पाएं। इसमें चार प्रकार की धातुओं का उपयोग किया गया है, जिससे इसे जंग न लग पाए। प्रतिमा का निर्माण भूकंपरोधी तकनीक से किया गया है। इस पर 6.5 तीव्रता के भूकंप का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके अतिरिक्त 220 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलने वाली वायु पर इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत रविवार को आकाशवाणी से प्रसारित अपने मासिक कार्यक्रम ‘मन की बात‘ के 49वें संस्करण में कहा था कि इस बार सरदार पटेल की जयंती विशेष होगी, क्योंकि उस दिन गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर स्थापित उनकी दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा। यह प्रतिमा अमेरिका के स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दो गुनी ऊंची है। यह विश्व की सबसे ऊंची गगनचुम्बी प्रतिमा है। हर भारतीय इस बात पर अब गर्व कर पाएगा कि दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा भारत की धरती पर है। यह उन सरदार पटेल की मूर्ति है जो जमीन से जुड़े थे और अब आसमान की भी शोभा बढ़ाएंगे। मुझे आशा है कि देश का हर नागरिक ‘मां-भारती’ की इस महान उपलब्धि को लेकर विश्व के सामने गर्व के साथ सीना तानकर, सर ऊंचा करके इसका गौरवगान करेगा। मुझे विश्वास है हिन्दुस्तान के हर कोने से लोग, अब इसे भी अपने एक बहुत ही प्रिय गंतव्य स्थल के रूप में पसंद करेंगे। उन्होंने कहा कि जब देश आजाद हुआ था, उस समय हमारे सामने एक ऐसे भारत का नक्शा था जो कई भागों में बंटा हुआ था। भारत को लेकर अंग्रेजों की रुचि खत्म हो चुकी थी, लेकिन वो इस देश को छिन्न-भिन्न करके छोड़ना चाहते थे। देश के लिए उनकी ईमानदारी और प्रतिबद्धता ऐसी थी कि किसान, मजदूर से लेकर उद्योगपति तक, सब उन पर भरोसा करते थे। गांधी जी ने सरदार पटेल से कहा कि राज्यों की समस्याएं इतनी विकट हैं कि केवल आप ही इनका हल निकाल सकते हैं और सरदार पटेल ने एक-एक कर समाधान निकाला और देश को एकता के सूत्र में पिरोने के असंभव कार्य को पूरा कर दिखाया। उन्होंने सभी रियासतों का भारत में विलय कराया। चाहे जूनागढ़ हो या हैदराबाद, त्रावणकोर हो या फिर राजस्थान की रियासतें, वे सरदार पटेल ही थे जिनकी सूझबूझ और रणनीतिक कौशल से आज हम एक हिन्दुस्तान देख पा रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि सरदार पटेल ने माहात्मा गांधी से प्रेरित होकर देश स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया।
जब खेड़ा क्षेत्र में सूखा पड़ा और लोग भूखमरी के शिकार हो गए, तो वहां के किसानों ने ब्रिटिश सरकार से कर में छूट देने की मांग की। परंतु सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया। सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की अगुवाई में अन्य लोगों के साथ मिलकर किसानों के पक्ष में आंदोलन चलाया। अंत में आंदोलन सफल रहा और सरकार को झुकना पड़ा। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिए उन्हें सरदार कहा गया। बाद में ’सरदार’ शब्द उनके नाम के साथ जुड़ गया।

सरदार पटेल की यह प्रतिमा भारत की एकता का प्रतीक है, जो भारतीय गौरव को आने वाली पीढ़ियों से परिचित कराती रहेगी। यह प्रतिमा हमें सरदार पटेल के विचारों से अवगत कराती रहेगी। उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहेगी। सरदार पटेल वे कहा करते थे-हमारे देश की मिट्टी में कुछ अनूठा है तभी तो कठिन बाधाओं के बावजूद हमेशा महान आत्माओ का निवास स्थान रहा है। वे यह भी कहते थे कि जब तक हमारा अंतिम ध्येय प्राप्त न हो तब तक हमें कष्ट सहने की शक्ति हमारे अंदर आती रहे यही हमारी सच्ची विजय है। त्याग के बारे में उनका कथन था- त्याग के सच्चे मूल्य का पता तभी चलता है, जब हमें अपनी सबसे कीमती चीज को भी त्यागना पड़ता है। जिसने अपने जीवन में कभी त्याग ही नहीं किया हो, उसे त्याग के मूल्य का क्या पता।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय एकता दिवस पहले नहीं था। नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल के जन्मदिवस 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाना प्रारंभ किया।

लेखक- सहायक प्राध्यापक,माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय,नोएडा परिसर



Leave a Reply
 

Your email address will not be published. Required fields are marked (*)

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

सम्बंधित लेख
 

Back to Top