Saturday, July 20, 2024
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नवरात्रों या नौ इन्द्रियों पर नियंत्रण में उपवास और निराहार का महत्व

प्राय: उपवास से सब यही निष्कर्ष निकालते हैं की भोजन ग्रहण न करना अथवा भुखा रहना। मगर क्या उपवास का अर्थ वाकई में निराहार रहना है?

उपवास का अर्थ :- शतपथ ब्राह्मण १/१/१/७ के अनुसार “उपवास” का अर्थ गृहस्थ के लिए प्रयोग हुआ हैं जिसमें गृहस्थ के यज्ञ विशेष अथवा व्रत विशेष करने पर विद्वान लोग उनके घरों में आते हैं अर्थात उनके समीप (उप) रुकते (वास) हैं। इसलिए विद्वानों का सत्संग करना उपवास कहलाता था।

निराहार का अर्थ :- उपवास के समय भूखा रहना अर्थात निराहार रहने का तात्पर्य शतपथ ब्राह्मण १/१/१/८ के अनुसार विद्वान के घर पर आने पर उनके भोजन ग्रहण करने के पश्चात ही गृहस्थी को भोजन ग्रहण करना चाहिए अर्थात तब तक निराहार रहना चाहिए।

उपवास और निराहार का मूल उद्देश्य विद्वानों का सत्संग, उनसे उपदेशों का श्रवण एवं उनकी सेवा शुश्रुता था। कालांतर में मूल उद्देश्य गौण हो गया और सत्संग, स्वाध्याय का स्थान भूखे रहने ने ले लिया हैं। केवल भूखे रहने से कुछ भी प्राप्ति नहीं होती। वेदों के स्वाध्याय एवं वैदिक विद्वानों के सत्संग से ही ज्ञान की प्राप्ति होती हैं। आशा हैं पाठक उपवास के सत्य अर्थ को समझ कर उसके अनुसार विद्वानों का सान्निध्य ग्रहण कर अपने जीवन में नौ इन्द्रियों पर संयम रखते हुए ज्ञान का प्रकाश करेंगे।

नौ इन्द्रियों के निग्रह का स्मरण करवाते नवरात्र
सर्दी जब आने को होती है और गर्मी भाग रही होती है तो वह आश्विन के नवरात्र होते हैं। और सर्दी के जाने तथा गर्मी शुरु होने के दिनों में आती है। चैत्र की या वासंती नवरात्र कहलाती है, दो प्रधान ऋतुओं का मिलन काल इस तरह अतिमहत्वपूर्ण है।

नवरात्र या ऋतुओं का संघिकाल स्थूल और सूक्ष्म जगत में चल रहे प्रवाहों का संधिकाल है।जैसे दिन व रात जब मिलते हैं तो वह भी संधिकाल कहलाता है।वैदिक काल से इस समय की ईश्वर उपासना को संध्या कहा जाता है।उसी तरह जब दो ऋतुएँ मिलती है तो वह ऋतुओं का संधिकाल कहलाता है और यह काल ईश्वर उपासना और आत्म निरीक्षण के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

इन दिनो सूक्ष्म जगत में अनेक प्रकार की हलचलें होती है। शरीर से लेकर पूरे चेतन जगत में ज्वार भाटा जैसी हलचलें पैदा होती है। जीवनी शक्ति शरीर में जमी हुई विकृतियों को बहार निकालने का प्रयास करती है। अंतरिक्ष में व्याप्त सूक्ष्म शक्तियां साधक के शरीर, मन, अंतकरण का कायाकल्प करने का प्रयास करती है।

वैदिक साहित्य में नवरात्रों का विस्तृत वर्णन है। इनकी व्याख्या करते हुए कहा है कि इसका शाब्दिक अर्थ तो नौ राते ही है पर इनका गूढार्थ कुछ और है। नवरात्र का एक अर्थ यह है कि मानवी कायारूपी अयोध्या में नौ द्वार अर्थात् नौ इन्द्रियां है।

एक मुख, दो नेत्र, दो कान, नासिका के दोनों छिद्र और दो गुप्त गुप्तेंद्रिय जैसे नौ द्वारों के विषय में जो जागरूक रहता है, वह उनमें लिप्त नहीं होता और न ही उनका दुरूपयोग करके अपना तेज, ओज और वर्चस्व को बिगाड़ता है, वही योगी यति है। नवरात्र के इन नौ दिनों में साधक अपने-अपने ढंग से संयम, साधना और संकल्पित अनुष्ठान करते है और उन प्रत्येक क्षणों में साधक अपनी चेतना को शुद्ध करता हुआ आगे बढ़ने का प्रयास करता है।नौ दिन और रात्रि में नौ इन्द्रियों पर संयम या नियंत्रण रखने के अभ्यास का वर्तमान नाम नवरात्र बन गया।

(लेखक अध्यात्मिक व ऐतिहासिक विषयों पर लिखते हैं)

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